समाजवादि में क्या हुआ, क्यों हुआ और अब क्या हो सकता है?

लखनऊ, N.I.T.  : उत्तर प्रदेश में अब लड़ाई चाचा-भतीजा की नहीं, बाप-बेटे की बन गई है. अखिलेश यादव भी अड़े हैं और मुलायम सिंह भी मुलायम नहीं हो रहे. अखिलेश के पास सरकार है, युवा नेताओं की फौज है. परिवार के सभी जवान नेता भी उनके साथ हैं. चाचा रामगोपाल उनके सलाहकार हैं.

मुलायम के पास शिवपाल हैं, अमर सिंह हैं, अखिलेश को नहीं मुलायम को अब भी अपना सबसे बड़ा नेता मानने वाले कार्यकर्ता हैं और उनके फैसले पर पुराने समाजवादियों की अघोषित सहमति भी है.

मुलायम सिंह और शिवपाल यादव परिवार और सरकार में अकेले पड़ गए हैं. अखिलेश मुलायम के दरबार में अकेले हैं.

यह कहानी वैसी ही है जैसी एक आम परिवार में होती है. एक जवान बेटा नए नज़रिए से चलना और परिवार को चलाना चाहता है, लेकिन बुजुर्ग पिता को बेटे का इतना स्वतंत्र होना, उसकी अनदेखी करना पसंद नहीं. इसके अलावा मुलायम सिंह यादव अखिलेश को अपना इकलौता उत्तराधिकारी तो मानते हैं लेकिन सर्वाधिकारी नहीं मानते. वे दो पुत्रों के पिता हैं और शिवपाल के बड़े भाई भी. वह शिवपाल जो मुलायम का मन पढ़ते हैं, वे सच्चे अर्थ में मुलायमवादी हैं. इसलिए वे तीनों के साथ इंसाफ करना चाहते हैं.

अखिलेश मुलायमवादी नहीं, समाजवादी पार्टी को चुनाव जिताना चाहते हैं. जो हो रहा है वह वैसा ही है जैसे जवान पुत्र अपनी मर्यादा में रहकर कहे कि अब फैसले लेने का अधिकार उसे सौंप दिया जाए और पिता उसे बार-बार जताए कि अब भी घर का सर्वेसर्वा वह ही है, पुत्र नहीं.

मुलायम और अखिलेश में संबंध-विच्छेद कभी नहीं हुए, न कभी हो सकते हैं, हां, संवाद-विच्छेद अक्सर हो जाता है. किसी और पार्टी में बुजुर्ग नेता आसानी से मार्गदर्शकमंडल में पहुंचा दिए जाते हैं, लेकिन जब पार्टी एक परिवार की हो तो पार्टी के संस्थापक को हाशिये पर पहुंचाना इतना आसान नहीं होता.

इस बार भी पिता-पुत्र के बीच आमने-सामने की बातचीत बंद थी. पुत्र पिता को पत्र लिखकर अपनी बात कहता था, पिता की तरफ से पत्रों के जवाब की उम्मीद रखता था. लेकिन मुलायम ने अखिलेश यादव को सबक सिखाने के लिए, उनके करीबी नेताओं के शब्दों में कहें तो उन्हें लाइन पर लाने के लिए ऐसी लिस्ट जारी कर दी जिससे अखिलेश दुखी हो गए. जो मुलाकात कई दिनों से टल रही थी वह अगले ही दिन हो गई. अखिलेश और मुलायम मिले, पिता से नाखुशी जाहिर की. लेकिन पिता ने उनकी लिस्ट बदलने की मांग को ज्यादा तवज्जो नहीं दी.

अखिलेश पिछले करीब दस दिन इस बात की आशंका मे जी रहे थे कि मुलायम कुछ ऐसा कर सकते हैं. इसलिए उन्होंने अपनी लिस्ट पहले ही मुलायम सिंह के पास भिजवा दी थी. इसमें हर उम्मीदवार को जीत की कसौटी पर तौला गया था. मुलायम से भी उन्होंने यही कहा कि उनकी लिस्ट ज्यादा ताकतवर है. यहां तक समझाया कि इन उम्मीदवारों को जिताने की गारंटी वे लेते हैं. लेकिन मुलायम ने इसे कबूल नहीं किया. उल्टे पूछ लिया कि क्या उन्होंने हारने वाले उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है?

हालांकि एक पिता और अपनी पार्टी का भला-बुरा समझने वाला नेता बनकर मुलायम बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं. सुनी-सुनाई है कि उन्होंने कहा कि अभी 78 सीटें बची है, इन सीटों पर फैसला तुम्हारे मन के मुताबिक होगा.

ऐसा नहीं है कि मुलायम की 325 उम्मीदवारों की पूरी लिस्ट अखिलेश को पसंद नहीं है. मामला फंसा उन बीस सीटों पर है जिनपर अखिलेश और शिवपाल के खासमखास लोगों का दावा है. इन बीस सीटों पर अखिलेश के सिपहसालारों का टिकट कट गया और शिवपाल के वफादारों को नेताजी ने टिकट थमा दिया. जो अखिलेश के घोर समर्थक थे वे इस लिस्ट से बाहर हैं, जो शिवपाल के नाम का नारा लगाते थे उन्हें चुनाव लड़ने का आदेश मिल गया.

जिस मंत्री ने अखिलेश के बंगले में शिवपाल समर्थक की पिटाई की उसे टिकट नहीं मिला. जिस अखिलेश समर्थक नेता ने शिवपाल के सामने पूछ लिया – वे पैदल नहीं सरकारी हेलीकॉप्टर से ही सरकारी दौरा करने जाते थे, उस नेता का टिकट कट गया. जिन बाहुबलियों को टिकट न देने की कसम अखिलेश ने खाई थी वे टिकट पाकर मस्त हैं और अखिलेश अपनी ही पार्टी में पस्त नज़र आ रहे हैं.

अखिलेश की शर्त थी – उनके वफादारों को टारगेट ना किया जाए और किसी क्रिमिनल को टिकट ना दिया जाए. इसलिए अब वे चाहते हैं कि पार्टी एक नई लिस्ट निकाले जिसमें अस्सी फीसदी नाम पुराने हों, बीस फीसदी नाम नए हों. इस नई लिस्ट में अखिलेश की सबसे ज्यादा चले. उनका तर्क है – इम्तिहान उनका है तो फैसला भी उनका होना चाहिए. पिता को उम्मीद थी कि उनका टीपू कभी बागी नहीं होगा, टीपू ने अपने साथियों को कहा था, चुनाव ज़रूर लड़ेंगे, लेकिन बगावत नहीं करेंगे, साइकिल पर ही चुनाव लड़ेंगे. अगर पिताजी ने टिकट नहीं दिया तो मुख्यमंत्री टिकट देंगे.

एक पार्टी की दो लिस्ट. एक पिता की, एक बेटे की. चुनाव से दो महीने पहले पार्टी टूटेगी इसकी उम्मीद न के बराबर है. अखिलेश पार्टी तोड़ना भी नहीं चाहते हैं. वे अपनी बात मनवाना चाहते हैं. उम्मीद है एक नया फॉर्मूला बनेगा. अखिलेश के करीबी लोगों को टिकट मिलेगा, शिवपाल के करीबी भी कुर्बान नहीं होंगे. दोनों ही पक्षों को समझौता करना होगा.

अगर समझौता नहीं हुआ तो जंग बहुत दूर तक जाएगी. अब भी चुनाव में पार्टी के सिंबल बांटने का अधिकार रामगोपाल यादव के पास है. वे अखिलेश यादव के करीबी हैं. रामगोपाल जिसे सिंबल देंगे, उसकी दावेदारी ज्यादा मजबूत मानी जाएगी. इसलिए मुलायम यह लड़ाई इतनी दूर तक नहीं ले जाएंगे. जहां तक नफा-नुकसान का सवाल है, इस पूरे दंगल में पहली बार मुलायम और शिवपाल के खिलाफ उन्हीं की पार्टी के नेता बोल रहे हैं. जो कल तक खुद को समाजवादी बताते थे वे अब खुद को अखिलेशवादी बताने लगे हैं.

उत्तर प्रदेश की राजनीति समझने वाले मानते हैं कि जो हो रहा है उससे तात्कालिक भले हो लेकिन लंबे वक्त में अखिलेश को इसका नुकसान नहीं होने वाला. इस पूरी कवायद में वे एक बात साबित करने में सफल रहे हैं कि अखिलेश दबता नहीं, लड़ता है. यह कि उत्तर प्रदेश में अब साढ़े चार नहीं एक ही मुख्यमंत्री है. जो पूरे साढ़े चार साल तक उत्तर प्रदेश और देश को दिखती रही वह कमजोर नेता की अपनी छवि उन्होंने एक झटके में तोड़ दी है.

अखिलेश का एक पसंदीदा डायलॉग है, हारकर जीतनेवाले को बाज़ीगर कहते हैं. इस 24 घंटे की हार में भी अखिलेश को अपनी जीत भी दिख रही है. एक कार्यकर्ता ने इस पर एक मजेदार बात कही – टीपू ने अब अपनी तलवार निकाल ली है. लेकिन डराने के लिए, चलाने के लिए नहीं.

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