फीफा का यह फैसला शक पैदा करा रहा है कि फीफा ने लिया बडा फैसला, 2026 से विश्व कप में होंगी 48 टीमें

fifaसलमान खान, नई दिल्ली, N.I.T : क्या किसी भी चीज की अति कभी अच्छी हो सकती है? ऐसा लगता है कि फुटबॉल को चलाने वाली अंतराष्ट्रीय संस्था फीफा के लिए इस सवाल का जवाब हां है. इसने एकराय से इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है कि 2026 से विश्व कप में 48 टीमें हों.

लेकिन इस फैसले का स्वागत नहीं हो रहा तो इसके भी कारण हैं. हाल के समय में सेप ब्लाटर के अध्यक्ष रहते हुए यह संस्था भ्रष्टाचार और घोटालों को लेकर सुर्खियों में रही है. ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि फीफा का कोई भी फैसला लोगों को फुटबाल से ज्यादा उसके अपने हितों की पूर्ति करने वाला लगता है. बीते साल कुख्यात ब्लाटर से फीफा अध्यक्ष की कुर्सी लेने वाले और 2019 में फिर चुने जाने का सपना देखने वाले जियानी इनफैंटिनो अड़े हुए हैं कि टूर्नामेंट के दायरे का विस्तार हो जिसके एवज में उन्हें फुटबॉल की दुनिया में कमजोर देशों के वोट मिलें. ये देश भी चाहते हैं कि विश्व कप नाम के केक का कुछ हिस्सा उन्हें भी मिले. इनफैंटिनो ने भी कहा है कि फीफा सदस्य संघों को और ज्यादा पैसा देगा. ऐसा करने के लिए उन्हें दायरे का विस्तार करना पड़ेगा. कहा जा रहा है कि इस विस्तार से संस्था को एक अरब डॉलर की अतिरिक्त आमदनी होगी जिसका एक बड़ा हिस्सा प्रायोजकों और प्रसारण अधिकारों से आएगा.

पूरी तरह से मुमकिन है कि इस कवायद से खेल को नाम मात्र का फायदा हो और पैसा उन लोगों की जेब में पहुंच जाए जो खेल को चलाते तो हैं लेकिन इसकी परवाह नहीं करते. टीमों की संख्या ज्यादा करने से एकतरफा मैच भी ज्यादा होने लगेंगे. यह डर भी है कि तीन टीमों के 16 ग्रुप वाला यह नया फॉर्मेट ग्रुप फाइनल्स जैसे छल-कपट की तरफ भी जा सकता है जिसमें टीमों को पता होगा कि कौन सा नतीजा क्वालिफाई करने में उन दोनों मदद कर सकता है. इससे खेल की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी मुश्किल होगा और क्वालीफाई करने का आनंद भी जा सकता है. (मौजूदा फीफा रैंकिंग के हिसाब से देखें तो दायरा बढ़ाने की इस कवायद के बाद भी हो सकता है भारत क्वालीफाई न कर पाए.)

हालांकि इस फैसले के कुछ सकारात्मक पक्ष भी हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती. इस टूर्नामेंट के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जब किसी कमजोर टीम ने अपने से कहीं मजबूत टीम को पटखनी दे दी. अल्जीरिया ने 1982 में पश्चिमी जर्मनी को हराया था. सेनेगल ने 2002 में फ्रांस को हराया और 1990 के विश्व कप के पहले ही मैच में तब विश्व कप चैंपियन रहे अर्जेंटीना पर कैमरून की वह जीत भला कौन भूल सकता है. अगर नए फॉर्मेट में पहले चोटी की टीमें खेलती हैं तो शायद ही कोई मुकाबला होगा जो रोमांचक न हो और अहम भी. शायद इस कवायद से सबसे बड़ा बदलाव यह आएगा कि मैचों को सिर्फ टीवी पर देखने से संतोष करने वाले देशों को प्रतिनिधित्व का मौका देकर विश्व कप सही मायनों में वैश्विक आयोजन बनने के और करीब आएगा. फीफा के इरादे कुछ भी हों, लेकिन ऐसा लगता है कि उसके इस फैसले ने आखिरकार फुटबाल को वास्तव में एक अंतरराष्ट्रीय खेल बना दिया है. (स्रोत)

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