‘अल्पसंख्यक समुदाय को अक्सर उस समुदाय के सबसे घटिया इंसान की वजह से पहचाना जाना त्रासदी है’

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माजिद मजीदी की फिल्म को कब मिलेगी देसी हीरोइन!

‘चिल्ड्रन ऑफ हैवन’ जैसी अद्भुत फिल्म बनाने वाले ईरानी फिल्मकार लंबे अरसे से हिंदुस्तान में अपनी अगली फिल्म के लिए हीरोइन ढूंढ़ रहे हैं. शाहिद कपूर के भाई ईशान खट्टर उनकी इस फिल्म ‘बियांड द क्लाउड्स’ के हीरो सुनिश्चित हो चुके हैं लेकिन हीरोइन जैसे अभी भी बादलों के बियांड लुका-छिपी खेल रही है. मजीदी तकरीबन चार टॉप देसी अभिनेत्रियों को अभी तक अपनी फिल्म के लिए कंसीडर कर चुके हैं और मुंबई के धोबी घाट पर लिया गया दीपिका पादुकोण का लुक टेस्ट तो जरूरत से ज्यादा वायरल भी हो चुका है.

इस लुक टेस्ट के बाद मजीदी ने दीपिका को किरदार के लिए सही नहीं माना था और सही हीरोइन की तलाश तब तक जारी रखी थी जब तक कंगना रनोट उन्हें नहीं मिल गई थीं. खबर है कि मजीदी ने कंगना को रोल के लिए इतना उपयुक्त माना कि न सिर्फ उन्हें अपनी फिल्म के लिए फाइनल कर लिया बल्कि उनके कपड़े भी सिलवाने के लिए भेज दिए और शूट शुरू होने के नियत समय पर कंगना को सेट पर ले आने के लिए वैनिटी वैन भी भेज दी.

लेकिन कंगना ने घर पहुंचे वैनिटी वैन वाले को ‘मैं यह फिल्म नहीं कर पाऊंगी…सॉरी!’ लिखा लिफाफा देकर वापस भेज दिया क्योंकि पूरी स्क्रिप्ट पढ़कर कंगना को समझ आया कि इस फिल्म में रोल उनके उस कद का नहीं है, जिस विशाल कद की आजकल वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हो गई हैं. फिल्म के लिए हां करते वक्त उन्होंने सिर्फ मजीदी से कहानी सुनी थी और कुछ दिन बाद बाउंड स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद ही समझ पाईं कि इस फिल्म में वे इतना दमदार काम नहीं कर पाएंगी कि जिससे इंटरनेशनल सर्किट में दीपिका और प्रियंका को टक्कर दे पाएं.

अपनी फिल्म फ्लोर पर ले जाने के लिए तैयार बैठे मजीदी अब हिंदी बोलने वाली किसी दूसरी नायिका की तलाश में हैं और खबर है कि खबर लिखे जाने तक वे, बादलों के बियांड लुका-छिपी खेल रहीं हीरोइनों में से किसी एक के बाहर आ जाने का इंतजार कर रहे थे!

‘सुल्तान’ बड़ा या ‘फैन’ बड़ा?

यशराज फिल्म्स के अंदर घमासान चलता रहता है. कभी सुशांत सिंह राजपूत नाराज होकर इस प्रोडक्शन हाउस को छोड़ देते हैं और अपने फिल्मी करियर को संवारने का काम किसी और को दे देते हैं तो कभी सिर्फ इसी निर्माण संस्था के लिए फिल्में बनाने वाले दो निर्देशकों के बीच के टकराव को यशराज फिल्म्स टाल नहीं पाता.

खबर है कि यशराज के लिए हमेशा बेहतरीन फिल्में बनाने वाले मनीष शर्मा की करियर ग्रोथ देखकर ‘सुल्तान’ जैसी सुपर-डुपर हिट फिल्म देने वाले अली अब्बास जफर नाराज हैं. ‘बैंड बाजा बारात’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ जैसी बढ़िया फिल्में बनाने वाले मनीष शर्मा की पिछली फिल्म ‘फैन’ जहां कम चली वहीं ‘गुंडे’ जैसी बेकार फिल्म बनाने वाले अली अब्बास जफर की न सिर्फ ‘सुल्तान’ ने रिकॉर्ड तोड़े बल्कि उनकी अगली फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ में भी उनके साथ सलमान खान ही काम कर रहे हैं.

अब जिस इंडस्ट्री में पैसे की भाषा ही समझी-बोली जाती हो वहां ‘फैन’ जैसी औसत व्यवसाय करने वाली फिल्म के निर्देशक मनीष शर्मा को आदित्य चोपड़ा ने न सिर्फ प्रमोट करके निर्माता भी बना दिया, बल्कि अपने खुद का प्रोडक्शन का काम शुरू करने के लिए भी मंच मुहैया करा दिया. दूसरी तरफ अली अब्बास जफर को सिर्फ निर्देशक का ही पद मिला हुआ है और इसी कम करियर ग्रोथ की वजह से सलमान को पारस पत्थर समझ रहा यह निर्देशक नाराज है. अब या तो यह होगा कि ‘टाइगर जिंदा है’ सुपरहिट होने के बाद जफर को भी यशराज फिल्म्स में मनीष शर्मा बराबर ओहदा मिलेगा या फिर यशराज छोड़ने के बाद जफर, सुशांत सिंह राजपूत के साथ मिलकर इस टाइटल की फिल्म बनाएंगे, ‘अलग-अलग थे, अब साथ-साथ हैं हम’!


‘त्रासदी यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय को उस समुदाय के सबसे घटिया इंसान की वजह से पहचाना जाने लगता है जबकि बहुसंख्यक समुदाय को हमेशा उसकी सबसे अच्छी शख्सियतों से पहचान मिलती है. हम कभी हिंदुस्तान के बहुसंख्यक हिंदू संप्रदाय को नाथूराम गोडसे से नहीं पहचानेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से कभी-कभार हिंदुस्तान के 17-18 करोड़ मुसलमानों को दाऊद इब्राहिम से पहचाना जाने लगता है.’

— जावेद अख्तर, गीतकार


फ्लैशबैक : किस्सा उस हॉरर फिल्म का, जिसका निर्देशन आदतन बीच में छोड़कर गुरुदत्त ने ‘चौदहवीं का चांद’ बनाई

गुरुदत्त को फिल्में शुरू कर उन्हें बीच में ही छोड़ देने की आदत थी. ये उनकी अबूझ रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा भी था जिसकी वजह से कई फिल्में हमेशा के लिए डिब्बाबंद हो गईं, तो कुछ की बागडोर दूसरे निर्देशकों ने संभालकर उन्हें नई जिंदगी बख्शी. ऐसी ही एक फिल्म का नाम ‘राज’ (1960) था, जिसे शूटिंग शुरू हो जाने के बावजूद गुरुदत्त ने डिब्बाबंद कर दिया और कई साल बाद उसे उनके ही एक असिस्टेंट ने नयी पहचान देकर जिंदा किया.

‘राज’ एक ब्रिटिश प्ले ‘द वूमन इन वाइट’ पर आधारित फिल्म थी और इसमें गुरुदत्त के साथ वहीदा रहमान मुख्य भूमिका निभा रहीं थीं. संगीत आरडी बर्मन का था, जिन्होंने फिल्म के लिए कुछ गीत तैयार भी कर लिए थे. शूटिंग गुरुदत्त की एक दूसरी फिल्म, ‘कागज के फूल’ के समानांतर चल रही थी लेकिन अचानक एक दिन गुरुदत्त ने सेट पर फैसला सुना दिया कि इस फिल्म को वहीं का वहीं रोककर वे ‘चौदहवीं का चांद’ (1960) बनाएंगे. वजह वही थी, कि गुरुदत्त का मन इसकी कहानी से उचट गया था और एक नयी कहानी ने उन्हें अपनी तरफ आकर्षित कर लिया था. ठीक इसी तरह ‘चौदहवीं का चांद’ नामक एक अमर फिल्म का जन्म हुआ, और वह फिल्म जो आगे चलकर हिंदी की चर्चित हॉरर फिल्मों में से एक कहलाई, कुछ सालों के लिए भुला दी गई.

तकरीबन चार साल बाद उस स्क्रिप्ट पर गुरुदत्त के असिस्टेंट रह चुके राज खोसला ने फिल्म बनाई. नाम नया देने के साथ-साथ ट्रीटमेंट भी नया दिया, पटकथा में हीरो का महत्व बढ़ाया और अपनी इस म्यूजिकल थ्रिलर फिल्म में पुराने की जगह नए नायक-नायिका लिए. मनोज कुमार व साधना अभिनीत हॉरर फिल्म ‘वो कौन थी?’ (1964) इसी तरह अस्तित्व में आई, जिसके बेहद मशहूर हुए गानों में से एक को लता मंगेशकर,उनके द्वारा गाए सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक मानती हैं. मदन मोहन रचित ‘लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो’ को.

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