शट अप : उलझकर ही सही लेकिन सुलझो, ताकि समझो कि आजादी का होना कितना जरूरी है

53122-bfigklqcbt-1488973253नई दिल्ली, N.I.T : बोल कि लब आजाद हैं तेरे’ की जरूरत आपको कब-कब पड़ती है? लघु फिल्म ‘शट अप’ कहती है कि सोशल डिस्कोर्स में हिस्सा लेने के अलावा और रैलियों में फैज की इस नज्म को ऊंचा स्वर देने के अलावा आपको अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता की जरूरत सबसे ज्यादा अपने नाते-रिश्तेदारों, यार-दोस्तों और हमउम्रों के सामने पड़ती है. क्योंकि इस असहिष्णु समय में समाज-सरकार-सिस्टम के अलावा आपका अपना आस-पड़ोस भी बोलने की आजादी का हनन करने में उग्रता से शामिल हो चुका है.

इस स्याह सच को ‘शट अप’ सलीके से धीरे-धीरे दिखाती है. ‘लंचबॉक्स’ व ‘मसान’ जैसी फिल्मों का निर्माण करने वालीं गुनीत मोंगा के प्रोडक्शन हाउस तले बनी शॉर्ट फिल्म अपने नायक अर्जुन (अर्जुन राधाकृष्णन) के बहाने क्रांति में शामिल होने की चाह रखने वाले युवाओं के उस तबके का चरित्र-चित्रण करती है जिनके भीतर सिस्टम की कारस्तानियों को लेकर रोष है, लेकिन क्रांति का रास्ता पकड़ने में झिझक भी. जो किसी मुस्लिम दोस्त द्वारा अन्यायों की दास्तान सुनाने पर हंसी-ठिठोली का सहारा ले लेते हैं लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडराते खतरों को समझते-बूझते हुए उनका विरोध भी करना चाहते हैं. जिनका सामना विरोध करते वक्त आंसू-गैस और लाठियों से अब तक नहीं हुआ है लेकिन जिनकी प्रेमिकाएं, घर के सदस्य और किसी ट्रोल की तरह हमेशा उग्र रहने वाले रिश्तेदारों की असंवेदनशीलताएं उन्हें सबसे ज्यादा हैरान-परेशान करती हैं.

और इस तबके के नौजवान किसी राजनीतिक विचारधारा से भी जुड़े नहीं होते, लेकिन अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने पर तुरंत अलां-फलां पार्टियों से जोड़ दिए जाते हैं.

‘शट अप’ का नायक अर्जुन ‘रैली में सभी जा रहे हैं तो मैं भी चला जाऊंगा’ से अपनी सुबह की शुरुआत करता है और प्रेमिका (अनुरिता झा) के व्यंग्यात्मक ताने सुनने से लेकर अपने खुद के भय से रूबरू होने के बाद अपनी ही दुनिया में खोए रहने वाली मध्यमवर्गीय मानसिकता से दो-चार होता है. रात होते-होते भय और झिझक से निजात पाकर सही रास्ता पहचान लेता है लेकिन इससे पहले एक ऐसे रिश्तेदार से दबता है जो ऑनलाइन ट्रोल के रियल लाइफ संस्करण सा हूबहू लगता है. ‘द अनटाइटल्ड कार्तिक कृष्णन’ प्रोजेक्ट नामक इंडी फिल्म वाले अभिनेता कार्तिक कृष्णन नीले रंग की कमीज पहने इस ट्रोल का किरदार निभाते हैं, और बहुत खूब निभाते हैं!

आशुतोष पाठक के निर्देशन में बनी इस लघु कहानी का ह्यूमर भी दिलचस्प है. ब्लैक ह्यूमर ऐसा कि प्रतिरोध करने से डरने के बाद नायक एक गरीब अम्मा को सब-वे खिलाकर अपना गिल्ट कम करना चाहता है. डर की वजह से रैली में शामिल न होने के बाद समंदर किनारे नारों को फोन पर सुनता है. ‘हंसी तो फंसी’ को नये अर्थ देने के अलावा झक सफेद जूतों को गमले की मिट्टी से गंदा करता है ताकि रैली में जाए तो आउट ऑफ प्लेस न लगे. साथ ही इक ऐसे ऐप का वर्णन भी बैकग्राउंड में गूंजता है जो बताता है कि गांधीजी होते तो इस-उस सिचुएशन में क्या करते!

एक दिन के जीवन में इतना कुछ दिखला देने वाली ‘शट अप’ का केंद्रीय पात्र अर्जुन, खुद से व अपने नाते-रिश्तेदारों से उलझने के बाद ही सुलझता है, और बिरयानी खाने बैठने से ठीक पहले समझता है कि आजादी का होना कितना जरूरी होता है. ठीक यही समझाइश ज्यादा रोचक और मनोरंजक न होने के बावजूद इस सामयिक लघु फिल्म की खासियत है.

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