आतंकी हमले के दोषियों को सजा, लेकिन बड़ा सवाल जर्मनी क्यों परेशान

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कुछ संयोग तो कुछ गुप्तचर सेवाओं की सजगता से जर्मनी में अप्रैल 2016 तक कोई ऐसा आतंकवादी हमला नहीं हो पाया था जिसमें इस्लामिक स्टेट (आईएस), अल कायदा या किसी दूसरे जिहादी संगठन का हाथ रहा हो. लेकिन, बीते साल 16 अप्रैल को यह स्थिति बदल गई. उस दिन जर्मनी के एसन शहर में सिखों के एक विवाह समारोह के दौरान उनके छोटे-से गुरुद्वारे के दरवाज़े पर एक बम धमाका हुआ. एसन, राइन नदी पर बसे प्रसिद्ध नगर ड्युसलडोर्फ़ से सटा हुआ उसका पड़ोसी शहर है. अब इस मामले में 17-17 साल के तीन मुख्य अभियुक्तों को स्थानीय अदालत ने छह से सात साल के बीच की सजाएं सुनाई हैं.

सौभाग्य से इस हमले में किसी की जान नहीं गई. जो तीन लोग घायल हुए, उनमें गुरुद्वारे के 60 वर्षीय ग्रंथी की स्थिति उस समय बहुत नाज़ुक थी. उनकी जान तो बच गई, पर वे अब भी ठीक से चल नहीं पाते. दोषियों का पता लगाने के लिए 70 सदस्यों का एक विशेष कार्यदल गठित किया गया था. वीडियो कैमरे से मिली तस्वीरों की सहायता से दो संदिग्धों को पांच ही दिन बाद पकड़ लिया गया. दोनों उस समय 16-16 साल के स्कूली लड़के थे. बाद में एक तीसरे लडके को भी गिरफ्तार किया गया. तीनों का लक्ष्य शायद भारी खून-खराबा करना था. शाम लगभग सात बजे गुरुद्वारे के दरवाज़े पर जब बम फूटा, तब तक वहां हो रहे एक विवाह समारोह में आए लगभग 200 लोगों में से अधिकांश जा चुके थे.

प्रवासी पृष्ठभूमि वाले जर्मन नागरिक

मुस्लिम परिवारों के ये तीनों लड़के प्रवासी पृष्ठभूमि वाले जर्मन नागरिक हैं. पुलिस यूसुफ को उग्र इस्लामवादी सलाफी विचारधारा की चपेट में आए एक किशोर के तौर पर पहले से जानती थी. वह जर्मनी की आंतरिक गुप्तचर सेवा ‘संविधान-रक्षा कार्यालय’ की निगरानी में भी था. स्कूल में उसके शिक्षक और दोस्त भी इसे जानते थे. किंतु, प्रत्यक्षतः किसी ने भी उसे उस गंभीरता से नहीं लिया. यही नहीं, यूसुफ मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथ की तरफ़ फिसलने से रोकने के एक सरकारी ‘मार्गदर्शन’ कार्यक्रम में हिस्सा भी ले रहा था और साथ में बम बनाने के प्रयोग भी कर रहा था.

गुरुद्वारे के दरवाज़े पर जिस बम का विस्फोट हुआ, उसे यूसुफ और उसके साथियों ने आग बुझाने के काम आने वाले एक सिलिंडर में विस्फोटक सामग्री भर कर खुद बनाया था. बम कैसे बनाया जाता है और इसके लिए क्या सामग्री चाहिये, यह इन लड़कों ने आईएस (इस्लामिक स्टेट) की ‘दाबिक’ नाम की पत्रिका से सीखा जो जर्मन भाषा में भी उपलब्ध थी. बम के लिए आवश्यक सामग्री उन्होंने इंटरनेट विक्रेताओं से ख़रीदी और उसके डेटोनेटर के लिए आवश्यक हिस्से-पुर्जे बिजली के सामान बेचने वाली दुकानों से जुटाए.

अपने पहले बम का परीक्षण भी किया

एसन शहर की एक बंद पड़ी कोयले की खान वाली जगह पर, जो अब घास का एक मैदान बन गई है, जनवरी 2016 में इन लड़कों ने अपने पहले बम का परीक्षण भी किया था. स्कूल के अपने दोस्तों को इसकी तस्वीरें और वीडियो दिखा कर उन्होंने इसकी डींग भी हांकी. यूसुफ की दसवीं क्लास की शिक्षिका गीज़ेला बार्थेल्मेस ने एक टेलीविज़न चैनल से कहा कि गुरुद्वारे पर हमले से चार महीने पहले उसकी क्लास के बच्चों ने उन्हें इस बारे में बताया था. पुलिस ने उसके घर में उसके कमरे की तलाशी ली थी और उसका कंप्यूटर तथा मोबाइल फ़ोन उठा ले गई थी. लेकिन, लगता है कि बम-विस्फोट वाले परीक्षण का वीडियो या तो किसी ने देखा नहीं या उसे खिलवाड़ मान कर गंभीरता से नहीं लिया.

अपनी चुस्ती-दुरुस्ती और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध जर्मन पुलिस और गुप्तचर सेवाओं की ऐसी लापरवाही के और भी कई अदाहरण हैं. बर्लिन में लगे 2016 के क्रिसमस मेले के समय दर्शकों पर भारी ट्रक चढ़ा कर एक दर्जन लोगों को कुचल कर मार डालने और 50 से अधिक को घायल कर देने वाली वीभत्स घटना भी एक ऐसी ही कहानी है. उस घटना के लिए ज़िम्मेदार 24 वर्षीय ट्यूनीशियाई शरणार्थी एक दर्जन अलग-अलग नामों के साथ जर्मनी के अलग-अलग शहरों में दर्ज था. वह हर जगह शरणार्थी-भत्ता वसूल रहा था. ट्रक चोरी कर और उसके द्वारा लोगों को कुचलने के बाद वह ट्रेन से नीदरलैंड और फ्रांस में घूमता हुआ जब इटली पहुंचा, तो अपनी ही एक ग़लती से वहां के अधिकारियों की गोली से मारा गया.

सलाफ़ियों की संगत

यूसुफ़ सेंधमारियों के कारण भी पहले से ही पुलिस के राडार पर था. गुरुद्वारे पर बम-हमले से एक ही दिन पहले उसे पुलिस के सामने हाज़िर होना था. वह कट्टरपंथी सलाफ़ियों की संगत में पड़ गया था. अरबी शब्द ‘सलाफ़’ का अर्थ है ‘अतीत की मांग,’ यानी अतीत की तरफ़ लौटना, पुरातनकालीन इस्लाम को पुनर्जीवित करना. अतीतगामी यह घोर अनुदारवादी विचारधारा सऊदी अरब की देन है, जिसे वहां ‘अस-सलफ़िय्या’ कहा जाता है. यूसुफ़ का साथी मुहम्मद भी एक साल से सलाफ़ियों की संगत में था. बताया जाता है कि उसने अपने स्कूल की एक यहूदी लड़की की ‘गर्दन तोड़ देने’ की धमकी दे रखी थी. इसलिए पुलिस उसे भी जानती थी.

यूसुफ़ को हत्या करने के इरादे से गंभीर रूप से घायल करने के आरोप में सात साल की, बमकांड के समय उसके साथ रहे मुहम्मद को भी इसी आरोप में छह साल नौ महीने की और तीसरे अभियुक्त तोलगा को इन दोनों को हत्या करने के लिए उकसाने के आरोप में छह साल की किशोरवय सज़ा सुनाई गई है. किशोरवय होने के कारण सारा मुकदमा पिछले चार महीनों से बंद दरवाज़ों के पीछे चला. 21 मार्च को सज़ा की घोषणा भी बंद दरवाज़ों के पीछे ही हुई.अभियुक्तों के वकील ने कहा है कि वह इस फैसले के विरुद्ध अपील करेगा. सिखों के वकील का कहना था कि वे घोषित सज़ाओं से संतुष्ट हैं. उन्होंने कहा, ‘मुझे और सिख बिरादरी को खुशी है कि इस मुकदमे का किसी तरह अंत हुआ.’

अन्य धर्मों से घृणा

एसन शहर के प्रदेशिक न्यायालय के प्रवक्ता ने पत्रकारों को बाद में बताया कि इस घटना के पीछे की मुख्य वजह धार्मिक उन्माद और अन्य धर्मावलंबियों के प्रति घृणा थी. उनका कहना था, ‘अभियुक्त अपने आप को धर्मभीरु मुसलमान समझते हैं. अपने कल्पना-लोक में रहते हुए उन्होंने मान लिया कि उन्हें विधर्मियों पर हमला करना और हो सके तो उन्हें मार डालना चाहिये.’ उन्होंने ने यह भी बताया कि मुकदमे की सुनवाई के समय यह आभास मिला कि अभियुक्त किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में भी थे जो खुद सीरिया में या मध्यपूर्व की किसी दूसरी जगह आतंकवादियों के संपर्क में था. सारी सुनवाई के बाद न्यायाधीशों का मानना था कि तीनों लड़के इस्लाम से भिन्न अन्य धर्मों से घृणा करते हैं. उनके विरुद्ध आरोपपत्र में भी कहा गया था कि वे ‘उग्रवादी मुसलमान’ हैं और जो कोई मुसलमान नहीं है, वह उनकी नज़र में ‘काफ़िर’ है, इसलिए उसे ‘मार डालना’ उनका कर्तव्य बन जाता है.

जर्मनी के सार्वजनिक प्रसारण केंद्र ‘डब्ल्यूडीआर’ का दावा है कि उसके पास यूसुफ़ की लिखी उस के अन्य साथियों के नाम उस समय की कुछ ऐसी चिठ्ठियां हैं, जब वह जांच-हिरासत में था. उनमें से एक में उसने लिखा है, ‘जब तक हम मुकदमे की सुनवाई से निपट नहीं लेते, बागडोर मेरे हाथ में है. मैं चाहता हं कि तुम सब जल्द से जल्द यहां से बाहर पहुंचो.’ ‘डब्ल्यूडीआर’ के पत्रकार इसका अर्थ यह लगाते हैं कि यूसुफ़ इस गिरोह का सरदार है और जल्द ही नए आतंकवादी हमलों के बारे में सोच रहा है. इस प्रसारण केंद्र के पास यूसुफ़ वाले गिरोह में घुस कर जानकारी निकालने वाले एक भेदिये का एक लिखित बयान भी है. इसके मुताबिक तीसरे अभियुक्त तोलगा ने उससे कहा कि वह एसन शहर के केंद्र में एक थैले में छिपा कर बम-धमाका करना चाहता है. सरकारी अभियोजक इसी कारण उसे आगे भी बहुत ख़तरनाक़ मान कर चल रहे हैं. वे यह भी जानते हैं कि इन लड़कों के जर्मनी के भीतर के अन्य कट्टरपंथी इस्लामवादियों के साथ गहरे संबंध हैं, भले ही अल बगदादी के इस्लामिक स्टेट (आईएस) के साथ उनके सीधे संबंध प्रमाणित नहीं हो सके.

कट्टरपंथी उपदेशक के अनुयायी

गुप्तचर सेवाओं की जानकारी के अनुसार ये सभी लड़के एसन के पास के ही डुइसबुर्ग शहर के एक कट्टरपंथी इस्लामी उपदेशक के अनुयायी हैं. हो सकता है उसी ने उन्हें भड़का कर उग्र बना दिया है. जर्मनी के क़ानून के अनुसार किशोरवय अपराधों की सज़ा शारीरिक और मानसिक दृष्टि से उतनी कठोर नहीं हो सकती, जितनी किसी वयस्क अपराधी की हो सकती है. सज़ा का मुख्य बल इस बात पर होता है कि युवाओं की बाद में समाज और सामान्य जीवन में वापसी आसान बन सके. लेकिन, यूरोप के अन्य देशों के समान जर्मनी में भी ऐसे मामलों की कमी नहीं है, जब जेल जाने वालों ने जेल में ही उग्रवाद सीखा या वहां से और अधिक उग्रवादी बन कर लौटे.

देखना यह भी होगा कि क्या बचाव पक्ष वर्तमान फ़ैसले के विरुद्ध अपील करता है और यदि करता है, तो अगला फ़ैसला कब और कैसा होगा. यह भी कुछ कम चिंताजनक बात नहीं है कि अल बगदादी की वहशी ख़लीफ़त के बच्चों में ही नहीं, बल्कि सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं वाले यूरोपीय देशों में रह रहे अधकचरे बच्चों और युवाओं में भी यदि इस हद तक जानलेवा धार्मिक उन्माद भरा जा सकता है. सवाल उठ रहा है कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ कह कर इस्लाम और उसके अनुयायियों को भला कब तक माफ़ किया जाता रहेगा? जर्मनी सहित सभी यूरोपीय देशों के मतदाताओं को इस तरह के ज्वलंत प्रशन घोर दक्षिणपंथी पार्टियों की गोद में धकेल रहे हैं.

में अप्रैल 2016 तक कोई ऐसा आतंकवादी हमला नहीं हो पाया था जिसमें इस्लामिक स्टेट (आईएस), अल कायदा या किसी दूसरे जिहादी संगठन का हाथ रहा हो. लेकिन, बीते साल 16 अप्रैल को यह स्थिति बदल गई. उस दिन जर्मनी के एसन शहर में सिखों के एक विवाह समारोह के दौरान उनके छोटे-से गुरुद्वारे के दरवाज़े पर एक बम धमाका हुआ. एसन, राइन नदी पर बसे प्रसिद्ध नगर ड्युसलडोर्फ़ से सटा हुआ उसका पड़ोसी शहर है. अब इस मामले में 17-17 साल के तीन मुख्य अभियुक्तों को स्थानीय अदालत ने छह से सात साल के बीच की सजाएं सुनाई हैं.

सौभाग्य से इस हमले में किसी की जान नहीं गई. जो तीन लोग घायल हुए, उनमें गुरुद्वारे के 60 वर्षीय ग्रंथी की स्थिति उस समय बहुत नाज़ुक थी. उनकी जान तो बच गई, पर वे अब भी ठीक से चल नहीं पाते. दोषियों का पता लगाने के लिए 70 सदस्यों का एक विशेष कार्यदल गठित किया गया था. वीडियो कैमरे से मिली तस्वीरों की सहायता से दो संदिग्धों को पांच ही दिन बाद पकड़ लिया गया. दोनों उस समय 16-16 साल के स्कूली लड़के थे. बाद में एक तीसरे लडके को भी गिरफ्तार किया गया. तीनों का लक्ष्य शायद भारी खून-खराबा करना था. शाम लगभग सात बजे गुरुद्वारे के दरवाज़े पर जब बम फूटा, तब तक वहां हो रहे एक विवाह समारोह में आए लगभग 200 लोगों में से अधिकांश जा चुके थे.

प्रवासी पृष्ठभूमि वाले जर्मन नागरिक

मुस्लिम परिवारों के ये तीनों लड़के प्रवासी पृष्ठभूमि वाले जर्मन नागरिक हैं. पुलिस यूसुफ को उग्र इस्लामवादी सलाफी विचारधारा की चपेट में आए एक किशोर के तौर पर पहले से जानती थी. वह जर्मनी की आंतरिक गुप्तचर सेवा ‘संविधान-रक्षा कार्यालय’ की निगरानी में भी था. स्कूल में उसके शिक्षक और दोस्त भी इसे जानते थे. किंतु, प्रत्यक्षतः किसी ने भी उसे उस गंभीरता से नहीं लिया. यही नहीं, यूसुफ मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथ की तरफ़ फिसलने से रोकने के एक सरकारी ‘मार्गदर्शन’ कार्यक्रम में हिस्सा भी ले रहा था और साथ में बम बनाने के प्रयोग भी कर रहा था.

गुरुद्वारे के दरवाज़े पर जिस बम का विस्फोट हुआ, उसे यूसुफ और उसके साथियों ने आग बुझाने के काम आने वाले एक सिलिंडर में विस्फोटक सामग्री भर कर खुद बनाया था. बम कैसे बनाया जाता है और इसके लिए क्या सामग्री चाहिये, यह इन लड़कों ने आईएस (इस्लामिक स्टेट) की ‘दाबिक’ नाम की पत्रिका से सीखा जो जर्मन भाषा में भी उपलब्ध थी. बम के लिए आवश्यक सामग्री उन्होंने इंटरनेट विक्रेताओं से ख़रीदी और उसके डेटोनेटर के लिए आवश्यक हिस्से-पुर्जे बिजली के सामान बेचने वाली दुकानों से जुटाए.

अपने पहले बम का परीक्षण भी किया

एसन शहर की एक बंद पड़ी कोयले की खान वाली जगह पर, जो अब घास का एक मैदान बन गई है, जनवरी 2016 में इन लड़कों ने अपने पहले बम का परीक्षण भी किया था. स्कूल के अपने दोस्तों को इसकी तस्वीरें और वीडियो दिखा कर उन्होंने इसकी डींग भी हांकी. यूसुफ की दसवीं क्लास की शिक्षिका गीज़ेला बार्थेल्मेस ने एक टेलीविज़न चैनल से कहा कि गुरुद्वारे पर हमले से चार महीने पहले उसकी क्लास के बच्चों ने उन्हें इस बारे में बताया था. पुलिस ने उसके घर में उसके कमरे की तलाशी ली थी और उसका कंप्यूटर तथा मोबाइल फ़ोन उठा ले गई थी. लेकिन, लगता है कि बम-विस्फोट वाले परीक्षण का वीडियो या तो किसी ने देखा नहीं या उसे खिलवाड़ मान कर गंभीरता से नहीं लिया.

अपनी चुस्ती-दुरुस्ती और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध जर्मन पुलिस और गुप्तचर सेवाओं की ऐसी लापरवाही के और भी कई अदाहरण हैं. बर्लिन में लगे 2016 के क्रिसमस मेले के समय दर्शकों पर भारी ट्रक चढ़ा कर एक दर्जन लोगों को कुचल कर मार डालने और 50 से अधिक को घायल कर देने वाली वीभत्स घटना भी एक ऐसी ही कहानी है. उस घटना के लिए ज़िम्मेदार 24 वर्षीय ट्यूनीशियाई शरणार्थी एक दर्जन अलग-अलग नामों के साथ जर्मनी के अलग-अलग शहरों में दर्ज था. वह हर जगह शरणार्थी-भत्ता वसूल रहा था. ट्रक चोरी कर और उसके द्वारा लोगों को कुचलने के बाद वह ट्रेन से नीदरलैंड और फ्रांस में घूमता हुआ जब इटली पहुंचा, तो अपनी ही एक ग़लती से वहां के अधिकारियों की गोली से मारा गया.

सलाफ़ियों की संगत

यूसुफ़ सेंधमारियों के कारण भी पहले से ही पुलिस के राडार पर था. गुरुद्वारे पर बम-हमले से एक ही दिन पहले उसे पुलिस के सामने हाज़िर होना था. वह कट्टरपंथी सलाफ़ियों की संगत में पड़ गया था. अरबी शब्द ‘सलाफ़’ का अर्थ है ‘अतीत की मांग,’ यानी अतीत की तरफ़ लौटना, पुरातनकालीन इस्लाम को पुनर्जीवित करना. अतीतगामी यह घोर अनुदारवादी विचारधारा सऊदी अरब की देन है, जिसे वहां ‘अस-सलफ़िय्या’ कहा जाता है. यूसुफ़ का साथी मुहम्मद भी एक साल से सलाफ़ियों की संगत में था. बताया जाता है कि उसने अपने स्कूल की एक यहूदी लड़की की ‘गर्दन तोड़ देने’ की धमकी दे रखी थी. इसलिए पुलिस उसे भी जानती थी.

यूसुफ़ को हत्या करने के इरादे से गंभीर रूप से घायल करने के आरोप में सात साल की, बमकांड के समय उसके साथ रहे मुहम्मद को भी इसी आरोप में छह साल नौ महीने की और तीसरे अभियुक्त तोलगा को इन दोनों को हत्या करने के लिए उकसाने के आरोप में छह साल की किशोरवय सज़ा सुनाई गई है. किशोरवय होने के कारण सारा मुकदमा पिछले चार महीनों से बंद दरवाज़ों के पीछे चला. 21 मार्च को सज़ा की घोषणा भी बंद दरवाज़ों के पीछे ही हुई.अभियुक्तों के वकील ने कहा है कि वह इस फैसले के विरुद्ध अपील करेगा. सिखों के वकील का कहना था कि वे घोषित सज़ाओं से संतुष्ट हैं. उन्होंने कहा, ‘मुझे और सिख बिरादरी को खुशी है कि इस मुकदमे का किसी तरह अंत हुआ.’

अन्य धर्मों से घृणा

एसन शहर के प्रदेशिक न्यायालय के प्रवक्ता ने पत्रकारों को बाद में बताया कि इस घटना के पीछे की मुख्य वजह धार्मिक उन्माद और अन्य धर्मावलंबियों के प्रति घृणा थी. उनका कहना था, ‘अभियुक्त अपने आप को धर्मभीरु मुसलमान समझते हैं. अपने कल्पना-लोक में रहते हुए उन्होंने मान लिया कि उन्हें विधर्मियों पर हमला करना और हो सके तो उन्हें मार डालना चाहिये.’ उन्होंने ने यह भी बताया कि मुकदमे की सुनवाई के समय यह आभास मिला कि अभियुक्त किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में भी थे जो खुद सीरिया में या मध्यपूर्व की किसी दूसरी जगह आतंकवादियों के संपर्क में था. सारी सुनवाई के बाद न्यायाधीशों का मानना था कि तीनों लड़के इस्लाम से भिन्न अन्य धर्मों से घृणा करते हैं. उनके विरुद्ध आरोपपत्र में भी कहा गया था कि वे ‘उग्रवादी मुसलमान’ हैं और जो कोई मुसलमान नहीं है, वह उनकी नज़र में ‘काफ़िर’ है, इसलिए उसे ‘मार डालना’ उनका कर्तव्य बन जाता है.

जर्मनी के सार्वजनिक प्रसारण केंद्र ‘डब्ल्यूडीआर’ का दावा है कि उसके पास यूसुफ़ की लिखी उस के अन्य साथियों के नाम उस समय की कुछ ऐसी चिठ्ठियां हैं, जब वह जांच-हिरासत में था. उनमें से एक में उसने लिखा है, ‘जब तक हम मुकदमे की सुनवाई से निपट नहीं लेते, बागडोर मेरे हाथ में है. मैं चाहता हं कि तुम सब जल्द से जल्द यहां से बाहर पहुंचो.’ ‘डब्ल्यूडीआर’ के पत्रकार इसका अर्थ यह लगाते हैं कि यूसुफ़ इस गिरोह का सरदार है और जल्द ही नए आतंकवादी हमलों के बारे में सोच रहा है. इस प्रसारण केंद्र के पास यूसुफ़ वाले गिरोह में घुस कर जानकारी निकालने वाले एक भेदिये का एक लिखित बयान भी है. इसके मुताबिक तीसरे अभियुक्त तोलगा ने उससे कहा कि वह एसन शहर के केंद्र में एक थैले में छिपा कर बम-धमाका करना चाहता है. सरकारी अभियोजक इसी कारण उसे आगे भी बहुत ख़तरनाक़ मान कर चल रहे हैं. वे यह भी जानते हैं कि इन लड़कों के जर्मनी के भीतर के अन्य कट्टरपंथी इस्लामवादियों के साथ गहरे संबंध हैं, भले ही अल बगदादी के इस्लामिक स्टेट (आईएस) के साथ उनके सीधे संबंध प्रमाणित नहीं हो सके.

कट्टरपंथी उपदेशक के अनुयायी

गुप्तचर सेवाओं की जानकारी के अनुसार ये सभी लड़के एसन के पास के ही डुइसबुर्ग शहर के एक कट्टरपंथी इस्लामी उपदेशक के अनुयायी हैं. हो सकता है उसी ने उन्हें भड़का कर उग्र बना दिया है. जर्मनी के क़ानून के अनुसार किशोरवय अपराधों की सज़ा शारीरिक और मानसिक दृष्टि से उतनी कठोर नहीं हो सकती, जितनी किसी वयस्क अपराधी की हो सकती है. सज़ा का मुख्य बल इस बात पर होता है कि युवाओं की बाद में समाज और सामान्य जीवन में वापसी आसान बन सके. लेकिन, यूरोप के अन्य देशों के समान जर्मनी में भी ऐसे मामलों की कमी नहीं है, जब जेल जाने वालों ने जेल में ही उग्रवाद सीखा या वहां से और अधिक उग्रवादी बन कर लौटे.

देखना यह भी होगा कि क्या बचाव पक्ष वर्तमान फ़ैसले के विरुद्ध अपील करता है और यदि करता है, तो अगला फ़ैसला कब और कैसा होगा. यह भी कुछ कम चिंताजनक बात नहीं है कि अल बगदादी की वहशी ख़लीफ़त के बच्चों में ही नहीं, बल्कि सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं वाले यूरोपीय देशों में रह रहे अधकचरे बच्चों और युवाओं में भी यदि इस हद तक जानलेवा धार्मिक उन्माद भरा जा सकता है. सवाल उठ रहा है कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ कह कर इस्लाम और उसके अनुयायियों को भला कब तक माफ़ किया जाता रहेगा? जर्मनी सहित सभी यूरोपीय देशों के मतदाताओं को इस तरह के ज्वलंत प्रशन घोर दक्षिणपंथी पार्टियों की गोद में धकेल रहे हैं.

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