विश्वविद्यालयों के परिसर में राष्ट्रीय झंडे को ऊंचा लहराकर उसके प्रति श्रद्धा की मांग करके भी नहीं होगा

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नई दिल्ली, N.I.T : अभी हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ की एक संस्था ने लगभग सात सौ अध्यापकों का एक समागम किया . बताया गया कि इनमें 51 विश्वविद्यालयों के कुलपति भी थे, दिल्ली विश्वविद्यालय समेत. इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में हस्तक्षेप बताकर इसकी आलोचना की जा रही है.

लेकिन कहा जा सकता है कि यह इन अध्यापकों और कुलपतियों का अधिकार है कि वे ऐसे किसी कार्यक्रम में जाएं. कल वे या कोई और कम्युनिस्ट पार्टी या नेशनल कॉन्फ़्रेन्स के किसी आयोजन में भी जाने को स्वतंत्र होंगे, यह उम्मीद की जानी चाहिए. यह भी कि सीताराम येचुरी को किसी शिक्षा संस्थान में बुलाने पर किसी को न तो दंडित किया जाएगा, न गोष्ठी रद्द करवाई जाएगी.

जो छूट शिक्षकों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जाने के लिए मिली है, वह इस सिद्धांत के तहत कि शिक्षकों को राजकीय मत से स्वतंत्र मत रखने का अधिकार है. यह अलग बात है कि इस प्रसंग में इन शिक्षकों का मत आज के सरकारी दल से मेल खाता है. इसकी आज़ादी मिलनी ही चाहिए कि मैं राज्य से सहमत होऊं और उसका पक्षपोषण करूं. कुलपति को भी यह हक़ है. इसलिए मुझे इस समागम पर और उसमें शिक्षकों और कुलपतियों की भागीदारी पर कोई सैद्धांतिक आपत्ति नहीं है, उनके विवेक की गुणवत्ता के बारे में मेरी राय जो भी हो.

यह इन अध्यापकों और कुलपतियों का अधिकार है कि वे ऐसे किसी कार्यक्रम में जाएं. कल वे या कोई और कम्युनिस्ट पार्टी या नेशनल कॉन्फ़्रेन्स के किसी आयोजन में भी जाने को स्वतंत्र होंगे

इस प्रसंग में 2002 याद आता है. गुजरात में जनसंहार जारी था. दूर दिल्ली में बैठे बौद्धिक समुदाय में बेचैनी थी. लेखकों, शिक्षकों और अन्य बुद्धिजीवियों ने इस पर अपना दुःख और प्रतिरोध ज़ाहिर करने के लिए अभियान चलाया. उसमें उस वक़्त महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति अशोक वाजपेयी पेश पेश थे. मैं भी उन्हीं के साथ काम करता था. इस प्रतिरोध के बीच अशोकजी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय से एक पत्र मिला. उनसे स्पष्ट करने को कहा गया था कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति होते हुए वे कैसे इस राज्य विरोधी अभियान में शामिल हैं. हमने उसका उत्तर देते हुए यही कहा कि विश्वविद्यालय बाक़ी राजकीय संस्थाओं से अलग हैं और उनमें काम करनेवाले भी सरकारी कर्मचारियों से अलग हैं. उन्हें अपना सामाजिक और राजनीतिक मत रखने और उसे व्यक्त करने का अधिकार मिला है, इसलिए कुलपति होने के कारण अशोक वाजपेयी पर पाबंदी नहीं लग जाती कि वे अपने राजनीतिक मत को अभिव्यक्त न करें.

दूसरे, अगर इन सबको किसी आदेश के तहत, ज़बरन इकट्ठा किया गया था तो मानकर चला जा सकता है कि अपने साथ ज़बरदस्ती किए जाने के चलते क्षुब्ध अध्यापकों पर संघ के बौद्धिकों का कोई असर न होगा.यानी, वे अभी अपनी राजकीय ताक़त का इस्तेमाल कर भले ही भीड़ ले आएं और शिक्षक भय या प्रलोभनवश आ भी जाएं, वे उनकी वैचारिक वफ़ादारी न ले सकेंगे. बल्कि सम्भवतया इस ज़बरदस्ती को लेकर शायद एक प्रकार की वितृष्णा ही पैदा हो. फिर यह वफ़ादारी किंचित अवसरवादी है. और अगर यह जमावड़ा सचमुच इस राजनीतिक या सामाजिक विचार में यक़ीन करने वालों का है तो इससे एक बात प्रकट होती है, वह यह कि आज तक उनके राजनीतिक मतवाली सरकार न होने के बावजूद वे बने रहे और किसी सरकार ने उन्हें संघ का होने की वजह से न तो निकाला, न प्रताड़ित किया. यह रवैया क्या वे ख़ुद सत्ता में रहते हुए प्रतिकूल मतवालों के साथ अपनाएंगे? इस सवाल का जवाब तसल्लीबख़्श नहीं है.

ऐसी ख़बर लगातार मिल रही है कि अध्यापकों को इस बात के लिए नोटिस मिल रहे हैं कि उन्होंने ऐसे आयोजन क्यों किए जो संघ समर्थित लोगों के अनुसार राष्ट्रवादी नहीं हैं, या राष्ट्र्विरोधी हैं. यह अभियान यहां तक पहुंच गया है कि यह आरोप लगाकर शिक्षकों को प्रताड़ित किया जा रहा है कि वे कम्युनिस्ट हैं और इस वजह से ख़तरनाक हैं.

संघ को जिनसे नफ़रत है, उस नेहरू ने भी नियति से साक्षात्कार’ वाले अपने प्रसिद्ध उद्बोधन में भारतीय संस्कृति से पांच हज़ार साल लंबे सफ़र की याद दिलाई थी. प्रश्न सिर्फ़ इस संस्कृति के आज के स्वरूप का है.

एक तरह से यह अच्छा है कि संघ समर्थित अध्यापक अब खुलकर अपनी बात कह रहे हैं. लेकिन उनके स्वर में शिकायत और हीनताबोध अधिक झलकता है, बौद्धिक आत्मविश्वास का पता नहीं चलता. अगर ज्ञान के नाम पर कहने को सिर्फ़ यही है कि भारत ज्ञान के क्षेत्र में सबसे आगे था और उससे ज़बरन यह गद्दी छीन ली गई, तो यह बात अब बहुत घिस गई है. इसके लिए वे अंग्रेज़ों और मुग़लों तक पर आरोप लगाते हैं. जब वे मुग़लकाल को भी भारत के लिए अंधकारकाल मानते हैं तो वे एक तरह से उपनिवेशवादी दृष्टि को ही ज्यों का त्यों अपना ले रहे हैं. मध्यकाल रचनात्मक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है. फिर कैसे मान लें कि उस समय भारतीय बुद्धि पर क़ब्ज़ा कर लिया गया था और वह कुंठित हो गई थी.

उससे बड़ा प्रश्न यह है कि भारतीयता का आरम्भ बिंदु क्या है! उसका पता करने का तरीक़ा क्या है? क्या इसमें यही बहस चलती रहेगी कि आर्य बाहर से यहां आए या यहां से बाहर गए. रोमिला थापर जैसी इतिहासकार भी इस बहस के पुराने तरीक़े को ख़ारिज कर चुकी हैं. भारतीय सभ्यता की प्राचीनता में शायद ही किसी को संदेह हो. संघ को जिनसे नफ़रत है, उस नेहरू ने भी नियति से साक्षात्कार’ वाले अपने प्रसिद्ध उद्बोधन में भारतीय संस्कृति से पांच हज़ार साल लंबे सफ़र की याद दिलाई थी. प्रश्न सिर्फ़ इस संस्कृति के आज के स्वरूप का है. ग़ैरबराबरी और भेदभाव पर आधारित हिंसा क्योंकर इसका स्वभाव बन गई?

क्या भारतीयता का कोई एक निश्चित प्रारंभिक बिंदु सुझाया जा सकता है? क्योंकि यह तय किए बिना बाहरी तत्वों को, जिन्हें अक्सर दूषण माना जाता है, निश्चित करना कठिन होगा. बौद्ध मत क्या भारतीय है? क्योंकि एक समय इसे पीट पीटकर भगा ही दिया गया था. यह आधुनिक भारत में एक स्मृति के रूप में सोया रहा और फिर लौटा दूसरे देशों के रास्ते. तो इसमें अब उन देशों का कितना हिस्सा है?

यदि नालंदा के अनुभव को ही देखें तो वह अनेकानेक संस्कृतियों का मिश्रण है. वह आज की भाषा में राष्ट्रीय से अधिक अंतरराष्ट्रीय अनुभव है. आख़िर भारत में अंतरराष्ट्रीय मेधा को आकर्षित करने की क्षमता क्यों नहीं बची? और उनके बिना ज्ञान का परिसर समृद्ध कैसे होगा?

ज्ञान के क्षेत्र में नारेबाज़ी से हमपेशा समुदाय में स्वीकृति नहीं मिल जाती. वह इतिहास हो या राजनीति शास्त्र, स्वीकृति अंतरराष्ट्रीय होती है

वह सिर्फ़ यह कह कहकर नहीं हो सकता कि हम महान थे, यह अपने परिसर में अपने राष्ट्रीय झंडे को ऊंचा लहराकर उसके प्रति श्रद्धा की मांग करके भी नहीं होगा. अगर वैसा किया गया तो हमारी हीनता ग्रंथि ही प्रदर्शित होगी. दूसरे, ज्ञान के क्षेत्र में नारेबाज़ी से हमपेशा समुदाय में स्वीकृति नहीं मिल जाती. वह इतिहास हो या राजनीति शास्त्र, स्वीकृति अंतरराष्ट्रीय होती है. रोमिला थापर इसलिए इतिहासकार नहीं हैं कि भारत में साज़िशन उन्हें इतिहासकार घोषित कर दिया गया है, बल्कि इसलिए कि पूरी दुनिया के इतिहासवेत्ता उन्हें मानते हैं.

दो साल पहले एक ब्राह्मण बौद्धिक मंच अचानक सक्रिय हुआ और उसने कहा कि वेदों की श्रेष्ठता स्थापित करने का वक़्त आ गया है. उन्होंने इसके लिए एक दौड़ के आयोजन की घोषणा की. यह पूछने पर कि कौन वैदिक प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है, उन्होंने रोमिला थापर का नाम लिया. यह पूछने पर कि वे कैसे किसी नए ज्ञान को रोक सकती हैं, क्योंकि वे किसी ताक़तवर पद पर नहीं हैं, उन्होंने उनके प्रभाव को दोषी ठहराया.

मैंने उनसे कहा कि वेद के संबंध में किसी नए ज्ञान के लिए दौड़ने की जगह बैठने की ज़रूरत होगी. बैठकर पढ़ने और लिखने की, दीर्घ तपस्या की. तपस्या भारतीय शब्द और अवधारणा है. इसमें सत्ता से दूर, लोगों की निगाहों से दूर, सांसारिकता के प्रलोभन से अलग विद्या में स्वयं को लीन कर देना होता है. क्या यह संयम और धैर्य भारतीयता का नामजाप करने वालों में है?

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