रंगलीला बस्ती का रंगमंच

IMG-20170413-WA0003अजहर उमरही, N.I.T :
वर्कशॉप में बच्चों को एक हफ्ता पूरा हो चुका है। हापित हो चूका है। अब वे आपस में तो घुलमिल गए ही हैं, वर्कशॉप के परिवेश के साथ भी उनका तादात्म्य स्थापित हो गया है। अब वे जानने लगे हैं कि वे यहाँ क्यों आये हैं और यहाँ आकर उन्हें क्या सीखना है, क्या करना है। जिन्हें यहाँ मज़ा नहीं आ रहा था या जो यार-दोस्तों के कहने पर ‘यूँ ही’ चले आये थे, वे रुख़सत कर गए। अभी भी करीब 60 बच्चे मौजूद है। पिछले कई दिनों से उनकी रुचियों और उनके भीतर मौजूद ‘पोटेंशियल’ का आकलन चल रहा था। आज आठवें दिन निर्देशकों ने अलग-अलग टीमें बनायीं। एक्टिंग, डान्स और सिंगिंग के अलग किये गए। इनके कुछ प्रशिक्षण अभी सामूहिक चलेंगे और कुछ अलग-अलग। 2 नाटक इन्हें करने हैं। पहला नाटक अंधविश्वास और साफ़-सफाई को लेकर गढ़ी गयी एक दिलचस्प कहानी है जो राजदरबार से निकल कर सामान्य जन तक पहुँच बनाती है। ‘सुपरस्टीशन’ और ‘सेनिटेशन’ इसमें सामानांतर चलते हैं। कैसे, इसे जानने के लिए आपको प्रदर्शन देखना आना होगा। दूसरा नाटक स्त्री व्यथा को लेकर है। भ्रूण अवस्था से लेकर से लेकर वृद्धा हो जाने तक की भारतीय महिला की दमन यात्रा का वृतांत है इस की कहानी के मूल में। 14-15 बच्चों के समूह ने आज नाटक की अभ्यास कक्षा में बैठकर नाटक की रीडिंग की। ‘आश्रम’ के एक सिरे पर बैठे इनमें जो बच्चे निरक्षर या अल्प साक्षर होने के चलते स्क्रिप्ट नहीं पढ़ सकते, उन्हें उनके दूसरे साथी संवाद याद करने में मदद देंगे। रीडिंग के बाद बच्चों को स्पीच और बॉडी एक्सरसाइज़ के लिए लॉन में लाया गया। रंजीत और करन नाटक टीम के निर्देशक होंगे। वरिष्ठ रंगकर्मी योगेंद्र दुबे इस समूचे खंड की ‘देखभाल’ करेंगे। आश्रम के मुख्य हॉल में डान्स वालियां म्यूजिक और अपने पैरों की थिरकन से पूरे परिवेश के आकर्षण का बिंदु रहीं लेकिन उनके बारे में विस्तार से कल !

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