अलीगढ़, N.I.T  : एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की द्विजन्मशती समिति और साहित्य आकादमी, नयी दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में सर सैयद जीवन और कृतित्व विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रतन लाल हांग्लू मुख्य अतिथि रहे। साहित्य आकादमी की उर्दू परामर्श मंडल के सदस्य प्रो. चन्द्रभान ख्याल ने स्वागत भाषण दिया और कहा कि साहित्य आकादमी का इस आयोजन में सहयोग हमारा सौभाग्य है।

सेमिनार के संयोजक प्रख्यात उर्दू आलोचक और जनसंचार विभाग के प्रो. एम शाफे किदवई ने कार्यक्रम के विषय का परिचय कराते हुए बताया कि वर्तमान समय में सर सैयद की तमाम पुस्तकों और जीवन के लगभग हर क्षेत्र में किए गए कार्यों पर पुनः विचार और आत्म-मंथन की जरुरत को देखते हुए इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।

भाषाओं का नहीं हो बंधन
मुख्य अतिथि प्रो. रतन लाल हांग्लू ने अपने उद्घाटन भाषण में सर सैयद के सांस्कृतिक क्रांति और प्रतिवाद-संवाद-संचार के आदर्श को अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि वर्तमान सभ्यताओं के टकराव के दौर में मीर, गालिब और ऐसे तमाम लोगों के प्रसार की बहुत जरुरत है अन्यथा हम सब इतिहास के अपराधी होंगे क्योंकि बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों की अनदेखी और अनिच्छा से सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुँचता है। इसका लाभ राजनीतिक तबका अपने स्वार्थ के लिए करता है। उन्होंने कहा रूढ़िवादी रवैया अपनाकर हम खुद अक्सर समकालीन भारत के विकास में अवरोध उत्पन्न करते हैं।अपनी भाषा से लगाव होना चाहिए पर यह भी मानना चाहिए कि हर विषय हर भाषा में नहीं पढ़ाया जा सकता। इसलिए अंग्रेजी या किसी और भाषा से अतार्किक विरोध नहीं होना चाहिए। उन्होंने शिक्षण संस्थानों में सुधार पर कहा हमारी शिक्षा व्यवस्था अकादमिक उत्कर्ष तो प्रदान कर रही है पर सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए यह निरर्थक सी लगती है। हमें विचार करना पड़ेगा कि आखिर क्यों हम कोई दूसरा हाली, गालिब, मीर पैदा नहीं कर पा रहे, क्यों हमारे संस्थान एक कारखाने में तब्दील होते जा रहे हैं।

पुस्तकों का विमोचन
हांग्लू ने कहा कि किसी भी संस्था में वैचारिक स्वतंत्रता बहुत आवश्यक है। इंटरफेथ अंडरस्टैंडिंग के लिए आवश्यक है कि हर धर्म-ग्रन्थ को पूर्वाग्रह दरकिनार कर पढ़ा और समझा जाए। एएमयू के उर्दू विभाग के वरिष्ठ शिक्षक प्रो. असगर अब्बास ने की नोट भाषण दिया और उन्होंने सर सैयद अहमद खान के जीवन और कर्म पर विस्तृत प्रकाश डाला। उर्दू विभाग के शिक्षक मौला बख्श ने किया और उन्होंने विचारों की स्वतंत्रता पर सर सैयद से प्रेरणा लेने की बात कहते हुए कहा किताब का जवाब किताब होता है, उसे जलाना, या प्रतिबंधित करना नहीं और इसका प्रमाण खुत्बात-ए-अहमदिया जैसी किताब है।इस मौके पर कुछ पुस्तकों का विमोचन भी किया गया जिसमें प्रो. शाफे किदवई की सवानिह सर सैयद एक बाजदीद, बहार-ए-बुस्ताने शोयरा, और अलीगढ़ की उर्दू सहाफत आदि प्रमुख हैं. अंग्रेजी विभाग के वरिष्ठ एमिरेट्स शिक्षक प्रो. फरहतउल्लाह खान ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की और उन्होंने सर सैयद की इंटरफेथ अंडरस्टैंडिंग और उनके विजन को समझने की जरुरत और प्रसार पर बल दिया।