मोसुल जीता जा चुका है, लेकिन आईएस अभी-भी हारा नहीं है

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आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) अपने दूसरे बड़े गढ़ मोसुल को हार चुका है. रविवार को ईराकी सेना ने औपचारिक रूप से मोसुल जीतने की घोषणा कर दी है. वहीं सीरिया का रक्का, जो कि आईएस का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता रहा है, में भी आईएस के खिलाफ लड़ाई अंतिम चरण में है. इन दोनों इलाकों से आईएस का कब्जा खत्म होना उसके खिलाफ चल रहे अभियान का निर्णायक मोड़ कहा जा सकता है, लेकिन आतंक के खिलाफ लड़ाई में जीत अभी कोसों दूर है. दरअसल अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र के बिना भी आईएस पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा बना रह सकता है और इससे बचने के लिए आतंकवाद विरोधी अभियानों के साथ अन्य कोशिशों को, और तेज करना होगा.

आतंक के खिलाफ वैश्विक गठबंधन में जो देश शामिल हैं, अब उन्हें आईएस के कब्जे से मुक्त कराए गए इलाकों में अपनी रणनीति पर विशेष ध्यान देना होगा. यहां की सुन्नी आबादी खुद को अलग-थलग महसूस न करे इसलिए इन क्षेत्रों में पूरे जोरशोर पुनर्निर्माण का काम करना होगा. ईराक और सीरिया के साथ-साथ अफ्रीका और दक्षिण, दक्षिण-पूर्व एशिया तक आईएस के कई सहयोगी संगठन सक्रिय हैं. गठबंधन को इन्हें हराने की रणनीति भी बनानी होगी.

आईएस के हाथ से वह भौगोलिक क्षेत्र निकल चुका है जहां वह अपने विदेशी लड़कों को सुरक्षित पनाहगार उपलब्ध करवाता था. इसके साथ ही अब उसके कब्जे में तेल के कुंए जैसे संसाधन भी नहीं हैं. ऐसे में आईएस अल-कायदा से सबक लेते हुए उन इलाकों, जैसे पाकिस्तान और तालिबान नियंत्रित अफगानिस्तान में अपने लड़ाकों को एकजुट करने की कोशिश कर सकता है, जहां उसके पनपने का अच्छा माहौल है.

यमन में विद्रोही गुटों और सरकार के बीच लड़ाई के चलते अराजकता की स्थिति बनी हुई है. कुछ ऐसा ही हाल सोमालिया का भी है. इसलिए ये देश भी आईएस का नया ठिकाना बन सकते हैं. इनके अलावा वहाबी विचारधारा की तरफ झुकाव के चलते सऊदी अरब में भी इस आतंकवादी संगठन को जड़ें जमाने में आसानी हो सकती है. यही वजह है इस समय आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में शामिल सरकारें खुफिया सूचनाएं साझा करने पर विशेष ध्यान दें और जिन देशों में आईएस के पनपने की संभावना है, उन्हें इस मसले पर चेताएं.

युवाओं को कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाने के लिए आईएस इंटरनेट का धड़ल्ले से इस्तेमाल करता है और साथ ही वह इसके जरिए अपने सदस्यों को भर्ती करता है. इस मोर्चे पर भी गठबंधन के देशों को ध्यान देना होगा. इस सबके अलावा दुनिया से तमाम देशों को उन राजनीतिक-आर्थिक समस्याओं को समझना और दूर करना होगा जिनके बूते आईएस जैसे संगठन खड़े होते हैं.

इस समय सबसे बड़ी चुनौती उन देशों के पुनर्निर्माण की है जो इस युद्ध के चलते जर्जर हो चुके हैं. यह पुनर्निर्माण सिर्फ बुनियादी ढांचे का ही नहीं होना है, यहां की आबादी में आपसी भरोसा भी पैदा करना होगा. यह काम इस तरह होना चाहिए जिससे कि कुर्द, शिया या सुन्नी समुदाय के भीतर भेदभाव की भावना पैदा न हो. इन इलाकों में सरकारों को सुनिश्चित करना होगा कि पुनर्निर्माण के दौरान इन समुदायों की आवाजों को भी पर्याप्त तवज्जो मिले. कुल मिलाकर यहां एक तटस्थ प्रशानिक व्यवस्था की स्थापना करनी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है तो फिर यहीं से आईएस के नए संस्करण को खाद-पानी मिलना शुरू हो जाएगा. (स्रोत)

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