बॉम्बे मेरी जान : मुम्बई की लोकल ट्रेनों में लेडीज फर्स्ट क्लास और सेकेंड क्लास में गजब का अन्तर है

मुम्बई, N.I.T : इस किताब के अध्याय ‘वो छोकरा’ का एक अंश : ‘मुम्बई की लोकल ट्रेनों में लेडीज फर्स्ट क्लास और सेकेंड क्लास में गजब का अन्तर है. क्लास से ज़्यादा सोच का. सेकेंड क्लास में अन्दर जगह न भी हो, तो दरवाजे के पास खड़ी महिलाएं आपको भरी ट्रेनों में अन्दर घुसने की जगह देंगी, ज़रूरत पड़ने पर अपनी सीट देंगी. हंसी-खुशी आपसे कहेंगी, मुझे बहुत दूर जाना है, दस मिनट अपनी सीट दे दो न. तमाम तरह के लोग सेकेंड क्लास में आते हैं. समोसे, वड़ा, मिक्चर बेचने वाले, रंग-बिरंगे क्लिप और हेयर बैंड बेचने वाले, मछली का टोकरा उठाकर चलने वाली मछुआरिन, साधू-सन्त, भिखारी,जादूगर, भजन मण्डली, अन्ताक्षरी वाला गैंग…सब साथ चलते हैं, सब सबकी मदद करते हैं.

…फर्स्ट क्लास में तो ये आलम देखा कि अगर कोई महिला हिन्दी या मराठी की कोई पत्रिका या अख़बार पढ़ रही है और जैसे ही कोई दूसरी महिला डिब्बे में आएगी, फौरन अंग्रेजी का अख़बार सामने आ जाता है. हर किसी की नाक ऊंची, हर कोई अपने को तुर्रम खान समझता है. मराठी कामकाजी औरतें तो फिर भी ठीक. दूसरे तो फर्स्ट क्लास में आते ही अपने को तोप समझने लगते हैं. किसी से बात नहीं करते, करते भी हैं, तो अंग्रेजी में. अगर कोई प्यास से तड़प रहा हो, तब भी अपनी बोतल का पानी नहीं देंगे, ना ही अपनी जगह…’


किताब : बॉम्बे मेरी जान

लेखिका : जयंती रंगनाथन

प्रकाशक : वाणी

कीमत : 350 रुपये


एक शहर अलग-अलग लोगों के भीतर अलग-अलग तरह से धड़कता है. इंसानों की तरह शहर भी कभी अच्छी याद बनकर, तो कभी एक कसक बनकर हमारे दिलों में आजीवन घर बनाए रहते हैं. ऐसे ही वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन के जेहन में मुम्बई आज भी ‘बॉम्बे’ की मिली-जुली यादों के तौर पर जिंदा है. जयंती ने इस किताब में 1983 के दौर की उस बम्बई का जिक्र किया है, जब इसे मुम्बई बनाने को लेकर कहीं कोई जद्दोजहद नहीं चल रही थी. तीन पात्रों हीरा (कचरा बीनने वाला एक किशोर), शबनम (बार डांसर) और ज्योति (किन्नर) की लंबी कहानियों के माध्यम से जयंती ने बम्बई की दुखती रग पकड़ने की काफी जीवंत कोशिश की है.

जो घटनाएं हम सिर्फ फिल्मों में देखकर डिस्टर्ब हो जाते हैं, वे इस देश के असंख्य लोगों का रोजमर्रा का जीवन हैं. बलात्कार और यौन शोषण को सबसे बडा अभिशाप समझकर इस देश की बहुत सारी लड़कियां जीवनभर उस सदमे से नहीं निकल पातीं. लेकिन इस तरह के यौन शोषण सड़कों पर रहने वाले बच्चों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं. हीरा इस किताब का एक ऐसा ही किशोर पात्र है, जिसे अपनी उम्र तक नहीं पता. जो पेट भरने के लिए कभी कचरा बीनता है, तो कभी जेब काटता है…और जब जेबकतरी के काम में एक्सपर्ट नहीं हो पाता, तो फिर चलती ट्रेन में गाना गाने का काम करता है.

हीरा अपने यौन शोषण की बात लेखिका को ऐसे बताता है, जैसे यह उत्पीड़न नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का सामान्य हिस्सा हो! वह कहता है – ‘एक जॉर्ज करके आदमी आता था हमारी चाली पर. हम लोगों को फॉरेन चॉकलेट देता, जूता देता. उसी के साथ भेजता था मुन्ना मेरे को. जॉर्ज जो बोलता, मेरे को समझ में नहीं आता. बान्द्रा में किधर तो एक फ्लैट में लेकर जाता था टैक्सी में. पहले बोलता, स्नान करके आने का. फिर पाउडर-बीडर डालता. बिरयानी खिलाता. उसके बाद…शुरू में थोड़ा प्रॉब्लम हुआ. फिर चलता था. पैसा भी देता था. मुन्ना को भी मेरे को भी. हर बार उसका घर में नया आदमी आता.’

पुराना बॉम्बे और आज की मुम्बई एक ऐसा महानगर है जो धीरे-धीरे हर वर्ग, वर्ण, क्षेत्र, जाति और धर्म के लोगों को अपने भीतर चुपचाप समेटता जाता है. आज मुम्बई इस स्थिति में है, जहां शहर को लोगों से और लोगों को इस शहर से बहुत तरह की शिकायतें हैं. फिर भी दोनों एक-दूसरे के साथ जैसे-तैसे हिल-मिलकर रहते हैं.

इस शहर की अपनी एक गति और कारोबारी प्रवृत्ति है. यहां आने वाले को यह सीखनी नहीं पड़ती, शहर खुद उन्हें इसमें माहिर कर देता है. जयंती लिखती हैं – ‘धीरे से और बहुत चुपके से यह शहर कब आपके अन्दर बसने लगता है और कब आपकी रगों में यह उल्लास और गति बनकर दौड़ने लगता है, आपको पता ही नहीं चलता. पहली बार वड़ा पाव का स्वाद आपको अजीब सा लग सकता है. सड़क किनारे पाव-भाजी के खोमचों पर भारी भीड़ देख आप चौंक सकते हैं. लेकिन बहुत जल्द आप भी उस भीड़ का हिस्सा बनने लगते हैं. बड़े-तवे पर कलछुल की झनाझन मार…लहसुन की चटनी की तीखी गन्ध आपकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं.’

किन्नर हमारे समाज का एक ऐसा तबका है जिसके बारे हम बहुत कम जानते और समझते हैं. वैसे तो यह तबका सभी जगह है लेकिन मुम्बई में किन्नरों की बड़ी-बड़ी बस्तियां हैं. इनमें देश के अलग-अलग हिस्सों से आए किन्नर रहते हैं. ऐसे ही एक किन्नर ज्योति के बारे में झकझोर देने वाले कुछ राज जयंती इस किताब में बांटती हैं.

ज्योति बताती है कि बचपन में वह सदाशिव नाम का लड़का थी. उसकी मां बचपन में उसे लड़कियों वाले कपड़े पहनाती थीं, क्योंकि वे एक बेटी चाहती थीं. बाद में जब उसे अपने किन्नर होने का अहसास हुआ, तो पूरा परिवार यही समझता रहा कि यह सिर्फ मां द्वारा उसे बचपन में लड़कियों की तरह पालने का मनोवैज्ञानिक असर है! बहुत बार लड़की होने की सोच रखने के लिए ज्योति को उसके पिता ने बेतहाशा मारा भी.

ज्योति ऐसी ही एक घटना के बारे में जानकारी देती है – ‘अप्पा गरजने लगे, ‘मेरा बेटा होकर ऐसा काम कर रहा है? मुझे अपने घर में मंदिरियम अली (हिजड़ा) नहीं चाहिए….’

‘…उस दिन पहली बार मुझे अपने लिए हिजड़ा सुनने को मिला. अम्मा, अप्पा और मुरुगन से मुझे बचाकर अन्दर ले गयी. मेरा चेहरा पोंछा, मुझे दूसरे कपड़े पहनाते हुए अम्मा बड़बड़ाती रहीं कि मेरी ही गलती है, जो बचपन में तुझे पावाड़ै (लहंगा) पहनाया. तेरे बालमन को मेरी बात लग गयी. अब मैं तुझे कभी लड़कियों वाला काम करने को नहीं कहूंगी. तू अच्छे से पढ़-लिखकर अपने अप्पा से भी बड़ा आदमी बन.’

जयंती रंगनाथन ने बहुत दिल से यह किताब लिखी है और शायद यही वजह है कि इसे पढ़ते हुए आप वह इंटेंसिटी महसूस कर पाते हैं. इस एक ही किताब को पढ़कर आप मुम्बई महानगर के सड़क के बच्चों, बार डांसरों और किन्नरों के जीवन में बहुत करीब से झांक सकते हैं. ‘बॉम्बे मेरी जान’ मेंजहां-जहां पात्रों के संवाद आते हैं, लगता है जैसे वे आपके नजदीक बैठकर अपनी आपबीती सुना रहे हों.

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