अब्दुल बिस्मिल्लाह की ‘श्रेष्ठ कहानियां’ का संग्रह : ताने-बाने की खोज-खबर जिससे हिंदुस्तानी समाज बना

अंजुम रिजवी, नई दिल्ली, N.I.T –

दरोगा ने पुर्जी को गौर से देखा और किसी नीलामी के फंसने की तरह उसे पढ़कर सुनाया-‘हिंदुओं की ओर से पडरौना महाविद्यालय के प्रधानाचार्य आदरणीय कवि जी का नाम आया है. अब मुसलमान भाई भी अपने सरपंच का नाम दे दें, ताकि पंचायत की कार्रवाई शुरू की जा सके.’

अब बाबू साहब घबरा गए. वे क्या फैसला करेंगे? वे तो हिंदुओं के प्रिंसिपल हैं और मुसलमानों के भी. क्या उनका नाम इसलिए दिया गया है कि वे हिंदू हैं? मगर एक शिक्षक क्या हिंदू अथवा मुसलमान होता है?

बाबू साहब अभी इसी पशोपेश में पड़े थे कि मुसलमानों की पुर्जी भी दरोगा की टेबुल तक पहुंच गई और भीड़ में खुसुर-पुसुर बढ़ गई…हिंदुओं के दिल तेज़-तेज़ धड़कने लगे…

‘सुनाइए दरोगा साहब, सुनाइए’! भीड़ का सब्र टूट चला था.

दरोगा जी ने पुर्ज़ी को एक बार फिर गौर से देखा और कुछ लड़खड़ाती हुई-सी आवाज़ में बोला, ‘मुसलमान की तरफ़ से जो नाम आया है…वह…वह नाम भी पडरौना महाविद्यालय के प्रधानाचार्य आदरणीय कवि जी का ही है!’

…बाबू साहब की आंखों से टपाटप आंसू बहने लगे. यह समूचा हिंदुस्तान पडरौना और बनारस की तरह ही एक शहर है शायद! और ‘यह शहर आधा फूल में है, आधा शव में/आधा जल में है, आधा मंत्र में…’


कहानी संग्रह : अब्दुल बिस्मिल्लाह : श्रेष्ठ कहानियां

कहानीकार : अब्दुल बिस्मिल्लाह

प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास

कीमत : 180 रुपये


निम्न और निम्न-मध्यवर्गीय आबादी अभी भी इस देश का सबसे बड़ा हिस्सा है. लेकिन जैसे-जैसे मुख्यधारा के मीडिया, खबरों, फिल्मों में और टीवी पर उसकी उपस्थिति घटी है, उसी तरह साहित्य की अलग-अलग विधाओं में भी यह तबका हाशिये पर आता गया है. फिर भी कुछ रचनाकार हैं जो गरीब तबके को अपने कथानक का हिस्सा बनाते हैं और कुछ बहुत उम्दा रच देते हैं. अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह कहानी संग्रह हाशिये पर जी रहे ऐसे ही तबके को, कहानियों में जिंदा करने का सफल प्रयास है.

इस संग्रह की ज्यादातर कहानियां समाज में पसरी सांप्रदायिकता को अलग-अलग कोणों से दर्ज करती हैं. ‘आधा फूल, आधा शव’, ‘दूसरा सदमा’, ‘जीना तो पड़ेगा’, ‘पेड़’, ‘लंठ’, ‘नया कबीरदास‘ आदि इसी मिजाज की कहानियां हैं. ‘लंठ’ कहानी का भोला-भाला आरिफ सांप्रदायिकता का शिकार हो जाता है. वहीं ‘जीना तो पड़ेगा’ कहानी सांप्रदायिक माहौल में कुंद होती मानसिकता को व्यक्त करती है.

‘दूसरा सदमा’ कहानी भारतीय संस्कृति के छिन्न-भिन्न होने और हिंदू-मुसलमानों के बीच बढ़ती दूरी को रेखांकित करती है. कहानी के पात्र रहमत चाचा अपने साथ होने वाले मजाक से बेहद चिढ़ते हैं, लेकिन जब लड़कों की मजाक करती आवाज उन्हें सुनाई नहीं देती तो वे बेहद परेशान हो जाते हैं : ‘लेकिन रहमत चायवाले की दूकान को पार भी कर गए, पर कोई आवाज़ उन्हें सुनाई नहीं पड़ी. वे ठिठक गए. उन्हें हैरत हुई. अपने ऊपर थोड़ा संदेह भी हुआ, कहीं वे बहरे तो नहीं हो गए हैं. या ऐसा तो नहीं कि उनका ध्यान कहीं और रहा हो और वे सुन ही न पाए हों…उन्होने कानों को एकाग्र किया. लेकिन कोई आवाज़ नहीं उभरी…

रहमत चचा कांपने लगे. आज क्या हो गया कि लोग उनसे मज़ाक भी नहीं कर रहे? क्यों? ऐसा क्यों हुआ आज? इस सवाल ने रहमत चचा को भीतर से बाहर तक बुरी तरह छेद कर रख दिया. उन्हें लगा कि इस क़ब्रिस्तानी सन्नाटे से तो वही अच्छा था कि लोग थोड़ी देर तक उन पर हंस लिया करते थे. इस चुप्पी में कैसा तीखा शोर है, जो भीतर-ही-भीतर उन्हें देर तक काटने लगा है! यह सदमा तो और भी गहरा है. इतना गहरा कि इसे दूर ही नहीं किया जा सकता! और गुलामू चचा आगे नहीं बढ़ सके. वहीं से लौट गए.’

आज के समय में किसी भी एक गुट, धड़े या पक्ष के साथ न होकर तटस्थ होना भी अपने-आप में खतरनाक ही हो गया है. कट्टरता जब हिंसा का नंगा नाच करती है तो उसमें सबसे ज्यादा निर्दोष ही पिसते हैं. ‘दूसरा कबीरदास’ नामक कहानी का कबीरदास ऐसा ही पात्र है जो खुद को न हिंदू कहता है न मुस्लिम. वह दोनों की कमियों पर एक समान रूप से उंगली रखता है. लेकिन दंगे की आग में झुलसने से वह भी नहीं बचता. कहानी की कुछ लाइनें :

‘दरवाजा खोलो’

आवाज़ भयंकर थी. कबीरदास डर गया…उसने यह सोचते हुए दरवाजा खोलना शुरू किया कि आज वह अपने को बदल देगा. अगर अशरफ भाई की तरफ के लोग होंगे तो कहेगा, भैया, मुझे मुसलमान बना लो मगर छोड़ दो. अगर दीपक बाबू की तरफ के लोग होंगे तो कहेगा कि भैया मुझे हिंदू बना लो लेकिन छोड़ दो…

मगर दरवाज़ा खुलने पर जो लोग सामने खड़े थे, वे न हिंदू थे न मुसलमान. उनके शरीर से एक विचित्र प्रकार की तेज गंध आ रही थी. उनके वस्त्र भी विचित्र प्रकार के थे और उनके चेहरे भी. वे उसकी बीवी के बारे में पूछ रहे थे.

‘सरकार, हम न हिंदू हैं, न मुसलमान…’ उसने गिड़गिड़ाने की कोशिश की थी और उसके पिचके गाल पर एक जोर का झापड़ पड़ गया था… कबीरदास का शरीर ऐंठने लगा था.’

इस पूरे कहानी संग्रह में अब्दुल बिस्मिल्लाह ने निम्न-मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय मुस्लिम समाज के नारी जीवन के भी काफी मार्मिक चित्र खीचे हैं. ‘तलाक के बाद’ कहानी में तलाकशुदा मुस्लिम स्त्रियों की विवशता को बहुत बेबाकी से दर्ज किया है.

इस कहानी संग्रह की एक अन्य विशेषता यह है कि यहां मुस्लिम समाज की हलाला जैसी विसंगति का विरोध कर लेखक ने नई सामाजिक दृष्टि की वकालत की है. इस कहानी का किरदार सत्तार न चाहते हुए भी अपने पिता के कहने से अपनी पत्नी को तलाक दे देता है. लेकिन उसकी अंतरात्मा इसे स्वीकार नहीं करती. इसलिए वह अपनी पत्नी साबिरा को ‘हलाला’ के बगैर अपना लेता है. इसी मौके के संवादों में लेखक की प्रगतिशीलता दिखाई देती है.

– ‘मैं इस तलाक को नहीं मानता. मैं तुम्हें लेने आया हूं…’

‘ऐसा नहीं हो सकता. मज़हब इसकी इजाज़त नहीं देता. शरीयत का रू से पहले ‘हलाला’ होना ज़रूरी है…’

‘लेकिन मैं इस कानून को नहीं मानता…दुनिया अगर मानती है, तो भी मैं इस कानून को नहीं मानता कि साबिरा का निकाह पहले किसी दूसरे मर्द से हो, उसके साथ वह रहे और फिर वह तलाक दे तब वह मेरे निकाह में आए. जब शौहर और बीवी बिना शर्त अलग हो सकते हैं, तब वे बिना शर्त एक भी हो सकते हैं. मैं यह सब कुछ नहीं जानता. मेरे और साबिरा के बीच में कोई कानून आड़े नहीं आएगा.’

ये कहानियां पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के अभाव, दुख-सुख, मिथक, लोकगीत, पर्व, उत्सव आदि जीवन के हर एक पक्ष को बहुत करीब से दर्ज करती हैं. दलित जीवन की त्रासदी दिखाने वाली कहानी ‘सुलह’ और ‘खाल खींचने वाले’ काफी मार्मिक हैं. इसी तरह ‘दुल्हिन और खून’ कहानी महानगरीय जीवन की जटिलताओं पर आधारित हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि इस संग्रह में आम इंसानों की, आम जिंदगी की, खास कहानियां हैं.

अब्दुल बिस्मिल्लाह की ये कहानियां कहीं न कहीं प्रेमचंद की कहानी परंपरा को आगे बढ़ाती हुई महसूस होती हैं. विश्वनाथ त्रिपाठी इन कहानियों की भाषा के बारे में कहते हैं – ‘अब्दुल बिस्मिल्लाह की कहानियों की भाषा पर विचार करने के लिए प्रेमचंद की भाषा के बारे में यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी उर्दू, उर्दू होते हुए भी कुछ और ही है और उनकी हिंदी भी सिर्फ़ हिंदी नहीं. उसमें पूर्वी बोली की तरावट है. यह तरावट अब्दुल बिस्मिल्लाह की भाषा में प्रेमचंद से ज़्यादा है क्योंकि इनकी कहानियों में उन पात्रों की संख्या अधिक है जो खड़ी बोली से सुपरिचित नहीं हैं.’

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