पैडमैन फिल्म है या मुद्दा, सिनेमा हॉल में देखने पर ही पता चलेगा ?

  • पीरियड्स, माहवारी, अंग्रेजी में चम्स, खासकर अगर लड़का ऐसे शब्द इस्तेमाल करे तो उसके किरदार पर सवालिया। ‘
  • पैडमैन’ को आम जनता कितना अपनाएगी, ये तो जल्द पता चल ही जाएगा, लेकिन फिल्म अच्छी है.
  • अक्षय कुमार के दोस्तों ने भी इस मुद्दे को बेबाकी से प्रमोट किया है, ताकि आम लोगों की झिझक दूर हो.

सलमान गांधी, नई दिल्ली, N.I.T : मैंने देखी पैडमैन, एक ऐसे विषय पर बनी फिल्म, जिसका नाम लेने से आज भी लोग झिझकते हैं या शर्माने लगते हैं, पीरियड्स, माहवारी, अंग्रेजी में चम्स, खासकर अगर लड़का ऐसे शब्द इस्तेमाल करे तो उसके किरदार पर सवालिया निशान भी लग सकते हैं. फिल्म का टाइटिल “पैडमैन” फिल्म की कहानी बयान करता है, ये एक बायोपिक है अरुणाचलम मुर्गुनाथम की, जिनके रोल को निभाया है अक्षय कुमार ने. कहानी लक्ष्मीकान्त की, जो महावरी के दिनों में अपनी पत्नी को सेनेट्री पैड के बजाय गंदा कपड़ा इस्तेमाल करते देखता है और उसे एहसास होता है कि ये कितना हानिकारक है औरत की सेहत के लिए. अपने ही घर से प्रेरित होकर वो पत्नी के लिये सेनेट्री पैड बनाने की कोशिश करता है, जिसमें कामयाबी के बजाये उसे अलग-अलग क़िस्म के तानों का सामना करना पडता है, तकलीफ़ और बढ़ती है जब पत्नी घर छोड़ के चली जाती है, माँ नाराज़, बहनें रिश्ता तोड़ लेती हैं और गांव बहिष्कार कर देता है, लेकिन लक्ष्मीकान्त हिम्मत नहीं हारता.

 

“लाख ठोकरों के बावजूद आखिकार वो ऐसी मशीन का अविष्कार करता है जो सस्ते में पैड बनाती है, जो पैड बाज़ार में 55 रुपए का मिलता है, लक्ष्मीकान्त 2 रुपए में बेचता है, वक्त का पहिया पलटता है, देश और दुनिया में लक्षमीकांत का नाम होता है”

नाराज़ परिवार अपनी ग़लती सुधारता है और एक मुहिम छिड़ती है सस्ते पैड बनाने की, स्वच्छता की. असल ज़िंदगी पर आधारित फिल्म की सबसे दिलचस्प बात ये होती है, कि कुछ चीज़ें जो आपको अगर सिनेमा की वजह से हज़म नहीं होती, उन्हें भी आप मान लेते हैं, क्योंकि आपके जेहन में ये बात रहती है कि जो आप देख रहे हैं वो सच में घटित हो चुका है और ये एक अहम वजह बनती है प्रेरणा के लिये.

“अभिनय के डिपार्टमेंट में अक्षय कुमार फिल्म की जान हैं और राधिका आप्टे सहित सभी कलाकरों ने उन्हें बख़ूबी सपोर्ट किया है.”

स्क्रीनप्ले इंटरवल तक थोडा लंबा जरूर है, लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म बांध कर रखती है, 2 घंटे 20 मिनट की फिल्म अगर सिर्फ दो घंटे की होती तो ज्यादा बेहतर होता, लेकिन कुल मिलाकर एंटरटेनमेंट के जरिये एक ज़रूरी संदेश देने में “पाडमैन” के निर्देशक लेखक आर बाल्कि, स्वनंद किरकिरे और फिल्म की निर्माता ट्विंकल खन्ना कामयाब होते हैं. अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म की लय के साथ जाता है. हालांकि, गानों का ज्यादा स्कोप फिल्म में है नहीं. पीसी स्रीराम की सिनेमेटोग्राफ़ी सच्ची है. अब बात ये कि “पैडमैन” को आम जनता कितना अपनायेगी, ये तो जल्द पता चल ही जायेगा, लेकिन फिल्म अच्छी है. फिल्म इंडस्ट्री में अक्षय के दोस्तों ने भी इस मुद्दे को बेबाकी से प्रमोट किया, आलिया भट्ट हों या वरुण धवन या आमिर खान हर बड़े सितारे ने सेनेट्री पैड हाथ में लेकर फ़ोटो खिचवाई और ये साबित करने कोशिश की कि पैड ख़रीदना या पीरियड्स पर बात करना कोई ग़लत बात नहीं है, इस विषय की आवाज़ बनना जरूरी है, ताकि उन्हें देख औरों की झिझक भी खुले.

“फिल्म चलती है तो ये ज़ाहिर होगा कि मुद्दा लोगों तक पहुंचा है और बात सिर्फ फिल्म तक सीमित नहीं है ये एक मुहिम बनना चाहिये ताकी आज भी हमारे देश के छोटे शहरों में सेनेट्री पैड को लेकर जागरुकता बढ़े”

इसे सिर्फ औरतों का मसला समझ के छोड़ना नहीं चाहिये. बदलाव फ़ौरन नहीं होगा, लेकिन ये तय है कि अक्षय कुमार की “पैडमैन” ने एक तार छेड़ दिया है, अब सरकार और लोगों को इसे आगे बढ़ाना चाहिये. पैडमैन जैसी फिल्में सिर्फ बिजनेस के लिये नहीं बनती हैं, लेकिन बिजनेस को ध्यान में रखना भी ज़रूरी है, क्योंकि फिल्में चलेंगी तो अलग-अलग मुद्दों को उठाने की हिम्मत करेगा फ़िल्मकार और संजीदा बात एंटरटेनमेंट के जिरये कही जाये तो देर तक याद रहती है।

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