क्या देश मे ‘सुसाइड सीजन’ की आहट है ? क्या कोटा पर खतरा मडरा रहा है ?

“लो फिर आ गया ‘सुसाड सीजन’…”

  • हरियाणा के जींद में मौजूद एक छोटे से गांव से आई नीरज कई दिनों से न कोचिंग जा रही थी और न ही गर्ल्स पीजी में किसी से बात कर रही थी.
  • बिहार के हाजीपुर का रहने वाला अनिकेत आनंद भी देर रात हॉस्टल के दोस्तों के पास से उठ कर गया और फिर सुबह नाश्ते पर लौटा ही नहीं.
  • छत्तीसगढ़ के धमतरी की निहारिका देवगन कई दिन से चुप-चुप थी और बिहार के रहने वाले अनुराग भारती ने भी कई दिनों से खुद को कमरे में बंद कर लिया था.
  • जनवरी 5, 13 और 19 को नीरज, निहारिका, अनिकेत की लाशों को इनके कमरों में मौजूद सीलिंग फैन से उतारा गया.
  • अनुराग 4 जनवरी को कमरे से निकला और लापता हो गया, बाद में उसकी लाश चंबल नदी से बरामद हुई. इन घटनाओं का ज़िक्र करने पर कोटा में 10 सालों से ऑटो चला रहा वकील बेहद रूखेपन से कहता है.

फिरोज खान, कोटा, N.I.T : जनवरी ख़त्म होते-होते राजस्थान के ‘एजुकेशनल हब’ के नाम से मशहूर कोटा शहर में अब तक 4 स्टूडेंट सुइसाइड कर चुके हैं. दिसंबर में भी लखनऊ-यूपी के रहने वाले अब्दुल अजीज़, मनीष परमार और रायगढ़-महाराष्ट्र के रहने वाले अमनदीप सिंह ने खुद को ख़त्म कर लेने का रास्ता चुन लिया था . इन सातों स्टूडेंट्स की उम्र 16 से 21 के बीच है. इस शहर में जनवरी से अप्रैल के इस वक़्त को अब ‘सुसाइड सीजन’ कहा जाने लगा है. NCRB डेटा के मुताबिक बीते 10 सालों में देश भर में स्टूडेंट सुसाइड में 240% की बढ़ोत्तरी हुई है.

पिछले तीन सालों में आत्महत्याओं का आंकड़ा अब 62 पहुंच गया है. वक़्त के साथ-साथ शहर के सामान्य जन-जीवन में ऐसी मौतें धीरे-धीरे रोजमर्रा की घटनाओं की तरह शामिल हो गई हैं. शहर का ‘बाज़ार’ जिससे सबके घरों के चूल्हे जल रहे हैं नहीं चाहता कि ये कहानियां यहां से बाहर जाएं, कोई इनका ज़िक्र करे या इन पर सवाल पूछे. शहर में तीन पीजी(हॉस्टल) चलाने वाले धर्मेन्द्र चिढ़कर कहते भी हैं- आप मीडिया वाले हमारा धंधा चौपट करने पर लगे हुए हैं…

कैसे बना बाज़ार
ये सब साल 1981 में शुरू हुआ जब जेके सिंथेटिक लिमिटेड नाम की कंपनी में काम करने वाले एक इंजीनियर वीके बंसल से शहर में आठवीं क्लास के स्टूडेंट्स को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. 1985 में बंसल सुर्ख़ियों में आ गए जब पहली बार उनका यहां से ट्यूशन लेने वाले एक बच्चे ने आईआईटी-जेईई क्लीयर कर लिया. इसके बाद साल 1991 में आईआईटी की तैयारियों के लिए बंसल क्लासेज की शुरुआत हुई. बाद में इसी में पढ़ाने वाली फैकल्टीज ने अलग होकर कई अन्य कोचिंग संस्थानों की शुरुआत की. फिलहाल कोटा के कोचिंग संस्थान सालाना कम से कम एक लाख रुपए फीस लेते हैं. स्टूडेंट्स से बातचीत में पता चलता है कि कोटा में एक साल कोचिंग करने, रहने-खाने का एवरेज खर्चा करीब ढाई लाख रुपए है.

क्या है कोटा का सक्सेस रेट?
बता दें कि देश का कोई भी कोचिंग हब आईआईटी, मेडिकल और एम्स एंट्रेंस एग्जाम में टॉप रैंक, नंबर ऑफ टॉपर्स और टोटल सलेक्शन के मामले में कोटा के आगे कहीं नहीं ठहरता. यहां के कोचिंग सेंटर्स की मानें तो देश के तीन सबसे मुश्किल एग्जाम में कोटा का सक्सेस रेट 40% से भी ज्यादा बताया जाता है. यहां के कोचिंग संस्थानों का दावा है कि आईआईटी का हर तीसरा और मेडिकल में फाइनल सलेक्शन तक पहुंचा हर पांचवां स्टूडेंट कोटा का ही होता है.

साल 2017 के एम्स के नतीजों पर नज़र डालें तो कोटा के ही एक कोचिंग संस्थान एलेन के स्टूडेंट्स ने ही टॉप-10 रैंक पर कब्ज़ा जमाया था. हालांकि बाद में आकाश कोचिंग ने भी इनमें से कुछ स्टूडेंट्स के अपने यहां पढ़ाई करने का दावा किया था. बहरहाल एम्स, नीट के रिज़ल्ट्स को देखें तो टॉप-10 में करीब 75% स्टूडेंट्स कोटा के ही शामिल होते हैं. 2017 में एम्स की टॉपर निकिता और 2016 में नीट के टॉपर संजय शाह ने कोटा में ही कोचिंग हासिल की थी.

आईआईटी में कोटा के सक्सेस रेट का अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि बीते 10 सालों में लगभग हर दूसरे साल आईआईटी को टॉपर इसी शहर ने दिया है. आईआईटी के टॉप-10 पर नज़र डालें तो साल 2014 में 3, 2015 में 2, 2016 में 4 और 2017 में 5 बच्चे कोटा के कोचिंग संस्थानों के थे. आईआईटी के टॉप-100 पर नज़र डालें तो 2014 में 19, 2015 में 28, 2016 में 43 और 2017 में 50 बच्चे कोटा के शामिल थे.
आखिर क्या हो रहा है कोटा में…
साल 2014 वो पहला साल था जब कोटा में हो रही स्टूडेंट सुसाइड का कुल आंकड़ा अपने अधिकतम स्तर 45 पर पहुंच गया था. ये वो साल था जब स्टूडेंट सुसाइड के मामले में देश के 88 शहरों में कोटा नंबर एक पर आ गया था. साल 2015 में 15, 2016 में 19 और 2017 में 16 के साथ ये कुल 62 पहुंच गया है. दिसंबर में 3 और जनवरी में 4 मामले सामने आने के बाद मामला फिर बिगड़ता नज़र आ रहा है.

कोटा के राजीव गांधी नगर में ज्यादातर कोचिंग करने आए स्टूडेंट ही रहते हैं. 6 दिसंबर को आत्महत्या करने करने वाला छात्र अब्दुल अजीज भी यहीं के मोहिनी रेजीडेंसी में रहता था. वहां जाने पर पता चलता है कि अब्दुल की मौत के बाद उसके सभी दोस्तों ने भी ये जगह छोड़ दी है. उधर जवाहर नगर के महालक्ष्मी रेजीडेंसी में मौत को गले लगाने वाली निहारिका की दोस्तों ने या तो ये जगह छोड़ दी है या फिर वो घर लौट गईं हैं. जो मौजूद हैं उन सभी के लिए फिलहाल नीट के एग्जाम की तैयारी बात करने के लिए सबसे ज़रूरी विषय है.

जिस कमरे में अब्दुल ने ऐसा किया उस पर अभी भी ताला लटका है और बगल में रहने वाला कोई नहीं जानता अब्दुल ने ऐसा क्यों किया. अगल-बगल के कमरों में मौजूद स्टूडेंट इस बारे में जानना भी नहीं चाहते क्योंकि उनके पास इस सब के लिए वक़्त नहीं है, ये एग्जाम का सीजन है. इसी हॉस्टल में रह रहा रजत साफ़ कहता है- हमें क्या पता क्यों मर गया, हमें पता भी नहीं करना है. नीचे मौजूद परचून की दुकान वाला राजेश कहता है कि सर इस इलाके में तो हर महीने ही कोई न कोई मर जाता है आखिर किस-किस की कहानी याद रखेंगे हम…?

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