Kota story 3 : कोटा शहर में मुसीबते क्यों, कही असफलता कोशिशें तो नही

फिरोज खान, कोटा, N.I.T : फरवरी बीतने लगा है और नीट-आईआईटी की परीक्षाएं अब नज़दीक हैं. नीरज, अनिकेत आनंद, निहारिका देवगन, अनुराग भारती जैसे नामों को कोटा शहर अब भूलने लगा है, जनवरी महीने में दिसंबर के तीन नामों- अब्दुल अजीज़, मनीष परमार और अमनदीप सिंह को भी ठीक इसी तरह भुला दिया गया था. इसने पहले वाले 55 नामों को याद करने वाला भी शायद ही इस शहर में अब कोई बचा हो.

इन नामों से जुड़ी यादें एक ‘सामूहिक चुप्पी’ का हिस्सा हैं जिसे ‘बाज़ार’ ने इस शहर पर लगभग थोप दिया है. इस शहर की इन यादों का हिस्सा सिर्फ मौतें ही नहीं हैं उसके लिए की गईं असफल कोशिशें भी हैं. कोटा में पढ़ रहे स्टूडेंट्स बताते हैं कि ऐसी कोशिशें लगातार की गईं, इन्हें जानबूझकर कहीं दर्ज नहीं किया गया और बाद में ये कोशिशें ही मौतों में तब्दील होकर एक लंबी लिस्ट का हिस्सा बन गईं, जिसे अब ये शहर अपनी स्मृतियों का हिस्सा बनाने से भी परहेज करने लगा है.

कोटा का शोकगीत…

इन सात नामों की कहानी जानने के लिए मैं लगातार जवाहर नगर की महालक्ष्मी रेजीडेंसी, राजीव गांधी नगर की मोहिनी रेजीडेंसी, महावीर नगर का मकान नंबर-602, कुन्हाड़ी के पीजी-हॉस्टल के चक्कर लगाता हूं. जनवरी में जहां ये घटनाएं हुई उन कमरों में से ज़्यादातर में ताला लगा है दिसंबर की घटनाओं वाले कुछ कमरे फिर से किसी को दे दिए गए हैं. आत्महत्या करने वालों के दोस्तों ने रहने की जगह बदल दीं हैं और उन्हें इस डेढ़ लाख बच्चों की भीड़ और कोचिंग संस्थान-माकन मालिकों की ‘सामूहिक चुप्पी’ से ढूंढ निकालना लगभग असंभव सा है. ऐसी कितनी ही अधूरी कहानियां इस शहर में बिखरीं हुई हैं जिन्हें सुना जाना अब गैरज़रूरी मान लिया गया है.
राजीव गांधी नगर में ही मोहिनी रेजीडेंसी के पास देव (बदला हुआ नाम) भी खड़ा है और चाय पी रहा है, मुझे सुसाइड के बारे में सवाल पूछते देखकर वो ठिठक जाता है. उसकी-मेरी नज़रें बार-बार टकराती हैं और वो मुझे पार्क में चलने का इशारा करता है और हम जाकर एक बेंच पर बैठ जाते हैं. देव पहले ही साफ़ कर देता है कि वो कैमरे पर नहीं आएगा और न ही उसका असली नाम आना चाहिए. भरोसा दिलाए जाने के बाद वो बात करना शुरू करता है और बताता है कि सुसाइड से ज्यादा तो सुसाइड अटेम्प्ट के मामले होते हैं जिन्हें पुलिस से ले-दे कर रफा-दफा कर दिया जाता है. ऐसा करने वालों के घर वालों को फोन करके बुलाया जाता है और कोचिंग-हॉस्टल-पुलिस सब मिलकर उन पर दबाव बनाते हैं कि बच्चे को चुपचाप घर ले जाया जाए.

 Kota story – 1

देव इस दौरान कई कहानियां सुनाता है जिनके मुख्य पात्र कोटा में पढ़ रहे बच्चे हैं जो डिप्रेशन से घिरे हैं. घर का दबाव, कोचिंग का दबाव, शराब-ड्रग्स से लेकर ये कहानियां उन बच्चों के गैंग का भी ज़िक्र करती हैं जिन्हें ‘बिहार टाइगर्स’ के नाम से जाना जाता है. ये ऐसे बच्चों का गैंग है जो पढ़ने आए, एडमिशन नहीं हुआ तो घर लौटे ही नहीं. क्या मुंह लेकर घर जाते भी…गलत रास्ते चुन लिए और अब ड्रग्स, स्मगलिंग, मारपीट जैसे कम करते हैं. देव बताता है बीते साल इसी गैंग के कुछ लोगों ने एक स्टूडेंट का सरेआम सड़क पर क़त्ल कर दिया था.

इन्हीं सारी कहानियों से गुजरने के दौरान देव मुझे चाय ऑफर करता है, चाय पीने के दौरान..ये कहानियां सुनाने के दौरान उसके चेहरे पर लगातार बेचैनी बनी रहती है. करीब एक घंटे की बातचीत के बाद मैं उससे विदा लेने का मन बनाता हूं लेकिन वो कहता है- चलिए पास ही में मेरा रूम है, थोड़ी देर और बैठते हैं. हम उसके रूम पर पहुंचते हैं तो नीचे बैठा गार्ड मेरे पास कैमरा बैग-ट्राई पॉड देखकर सवालों की बौछार कर देता है. देव जवाब में सिर्फ इतना कहता है- मेरे दोस्त हैं, मिलने आए हैं.

इस रूम में कोचिंग मटीरियल, कपड़ों के दो बैग, एक पलंग और टेबल-चेयर के अलावा कुछ भी नहीं है. हम बैठ जाते हैं, देव चुप रहता है और ये चुप्पी कई मिनटों तक हमारे बीच बनी रहती है. जब चुप्पी टूटती है तो देव बताता है कि करीब 16 महीने पहले उसने भी ज़हर खाकर मरने की कोशिश की थी. कहानी यूं थी कि बेहद सामान्य आमदनी वाले टीचर पिता के सबसे बड़े बेटे को उम्मीदों और कर्जे पर कोटा भेजा गया और वो लगातार दो साल पीएमटी नहीं निकाल पाया. दूसरे रिजल्ट के बाद पिता ने कुछ कहा नहीं पर उसे बढ़ता कर्ज नज़र आ रहा था. उसने एक दिन ज़हर खा लिया लेकिन बगल वाले ने देख लिया और वो बच गया. अनकहे नियम के मुताबिक मां-पिता को बुलाकर उसे कोटा से रवाना कर दिया गया.

मां-बाप ने तो शायद किसी अनकहे डर से उससे कोई सवाल नहीं पूछा लेकिन रिश्तेदार-दोस्त-पड़ोसी सब उससे लगातार पूछते कि कोटा कब लौटना है ? क्यों लौट आए, पढ़ाई में मन नहीं लगा ? लौट तो आए हो अब करोगे क्या ? मां-बाप की उम्मीदों का क्या? तीन महीने घर में रहा तो माता-पिता और छोटे भाई की नज़रें भी लगातार सवाल पूछती रहती थीं…कहते-कहते देव अचानक चुप हो जाता है.

Kota story – 2

हम दोनों काफी देर ऐसे ही चुप रहते हैं फिर वो अचानक झुंझलाकर कहता है- इन सवालों से तंग आ गया था भाई…कोई रास्ता ही कहां था, हिम्मत जुटाई और पिता को भरोसा दिलाकर फिर कर्जे पर कोटा आ गया हूं. वहां मरने से तो अच्छा यहीं मरना है न ? इन दोनों ऑप्शन में से उसे क्या चुनना चाहिए था या सच में कोई तीसरा ऑप्शन मौजूद है, इसका कोई जवाब मेरे पास नहीं होता.

वो मुस्कुराकर बताता है- अब तो पापा भी कहते हैं, इस बार मेडिकल नहीं होगा तो कुछ और कर लेना. ये सुनकर जब मैं देव को कुछ करियर सुझाने लगता हूं…वो उसे बिलकुल अनसुना कर देता है, बिना रुके बोलता है- इस बार नीट में जान की बाज़ी लगा दूंगा भाई!

बेहद फ़िक्र के साथ मैं उसे अपना नंबर देता हूं ये कहकर कि जब भी लगे बिना झिझक के कॉल करना, हालांकि मुझे भी पता है शायद वो नहीं करेगा, मैं जिन कहानियों से गुजर रहा हूं उनमें किसी ने भी किसी को कॉल नहीं की थी… मेरे ज़हन में जो अटका रह जाता है, वो शब्द था ‘जान की बाजी’.

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