दल-बदलू नेताओ का है 2019 लोकसभा चुनाव, क्या नरेश अग्रवाल, रीता बहुगुणा से पार्टी मजबूत हुई ?…पढ़े

सलमान गांधी, नई दिल्ली, N.I.T : कहते हैं उगते सूरज को हर कोई सलाम करता है. इन दिनों भाजपा के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. अलग-अलग पार्टी से लोग अपनी पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं. और हों भी क्यों ना, देश के 29 में से 21 राज्यों में भाजपा या भाजपा की गठबंधन वाली सरकार जो बन चुकी है. और उसकी हवा दिन-ब-दिन तेज होती जा रही है. ऐसे में कभी कांग्रेस सदस्‍य रहे नरेश अग्रवाल अब समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं. बावजूद इसके कि वे कुछ दिन पहले तक मोदी और भाजपा को जमकर खरी-खोटी सुनाते रहे हैं. बड़ा सवाल ये है कि आखिर इन नेताओं के पास ऐसी कौन सी ताकत है जो ये लोग अपनी पार्टियां छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं. और तमाम बेइज्‍जती सहने के बावजूद भाजपा ने उन्‍हें हार-फूल देकर अपने दल में मिला भी रही है.

नरेश अग्रवाल ( यूपी )

हरदोई विधानसभा से 7 बार विधायक रह चुके नरेश अग्रवाल के भाजपा में आने से पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना फायदा देख रही है. नरेश अग्रवाल ने समाजवादी पार्टी का साथ 12 मार्च को छोड़ दिया, क्योंकि पार्टी ने उनकी जगह जया बच्चन को राज्यसभा का टिकट दे दिया. नरेश अग्रवाल वैश्य समाज में अच्छी पकड़ रखते हैं और इसका वो दावा भी कर चुके हैं. हालांकि, पिछले ही महीने सपा के एक अखिल भारतीय वैश्य महासम्मेलन में उन्होंने पीएम मोदी पर जातिगत टिप्पणी की थी, बावजूद इसके वह भाजपा में शामिल हो चुके हैं. आपको बता दें कि वैश्य समाज के लोगों ने सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए यह महासम्मेलन आयोजित किया था.

 

जीतन राम मांझी ( बिहार )

1980 में कांग्रेस से सफर शुरू करने वाले जीतन राम मांझी की दलित और आदिवासी इलाकों में अच्छी पकड़ है. वह नीतीश कुमार की सरकार में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति कल्याण मंत्री की भूमिका भी निभा चुके हैं. वह मुसहर जाति से ताल्लुक रखते हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक सफर में कई पार्टियां बदलीं और कुछ समय पहले उन्होंने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा नाम की पार्टी शुरू की थी. हाल ही में उन्होंने एनडीए के साथ नाता तोड़ लिया है और अब खबर है कि जीतन राम मांझी को सोनिया गांधी ने डिनर पर बुलाया है. माना जा रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा में गठबंधन भी हो सकता है.

पेमा खांडू ( अरुणाचल प्रदेश )

सितंबर 2016 में पेमा खांडू ने कांग्रेस को छोड़ दिया था और दिसंबर में भाजपा का दामन थाम लिया था. इसी के साथ वह अरुणाचल प्रदेश के चुनाव में जीतकर मुख्यमंत्री पद पर जा पहुंचे. पीएम मोदी के 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए पेमा खांडू अरुणाचल प्रदेश में अहम भूमिका निभाएंगे. आपको बता दें कि महज 38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बनने वाले वह देश के सबसे यंग मुख्यमंत्री हैं. उन्होंने बहुत सारी वेलफेयर स्कीम की सीरीज लॉन्च करके और सरकारी विभागों में तकनीक को लेकर काफी अच्छा काम किया है, जो उनकी ताकत के रूप में पीएम मोदी की मदद करेगा. उनके साथ 32 विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने का फैसला किया और अब सभी को एक साथ बांधे रखना खांडू के लिए बड़ी चुनौती होगी.

हिमंत बिस्व सरमा ( असम )

असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्व सरमा 15 साल तक कांग्रेस के साथ कदम से कदम मिलाकर चले, लेकिन मई 2016 में उन्होंने भी कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया और भाजपा में शामिल हो गए. इनके अलावा असम में पल्लभ लोचन दास, जयंत मल्ला बरूच, पियूष हजारिका, राजन बोरथाकुर, अबु ताहर बेपारी, बिनांद कुमार सैकिया, बोलिन चेतिया, प्रदान बरूह और कृपानाथ मल्ला भी कांग्रेस को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे. हिमांत की भूमिका 2019 के लोकसभा चुनावों में अहम होगी क्योंकि हिमांत ने ही अरुणाचल प्रदेश में भाजपा के लिए रणनीति तय की थी. फिलहाल वह भाजपा के लिए पूरे उत्तर पूर्वी भारत के लिए रणनीति बनाने का काम कर रहे हैं. त्रिपुरा में टीएमसी के 6 विधायकों को भाजपा में शामिल करवाने का श्रेय भी हिमांत को ही जाता है. इन्हीं सारी रणनीतियों की वजह से भाजपा को त्रिपुरा में जीत हासिल हुई.

चौधरी बीरेंदर सिंह ( हरियाणा )

मौजूदा समय में स्टील यूनियन मिनिस्टर चौधरी बीरेंदर सिंह पहले कांग्रेस के साथ थे, लेकिन लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर 29 अगस्त 2014 को भाजपा का दामन थाम लिया. अच्छा पद न मिलने के चलते कांग्रेस से विद्रोह कर के भाजपा में शामिल हुए बीरेंदर सिंह की 2019 लोकसभा चुनावों में भूमिका अहम हो सकती है. दरअसल, भाजपा सरकार में भी उन्हें मन मुताबिक पद नहीं मिला है. बीरेंदर सिंह कांग्रेस से अलग होकर एक बार पहले भी वापस कांग्रेस से मिल चुके हैं तो हो सकता है कि 2019 में भी बीरेंदर सिंह की जाट छवि को भुनाने के लिए कांग्रेस बीरेंदर सिंह को खुद से मिलाने का प्रस्ताव रखे या खुद बीरेंदर सिंह ही कांग्रेस के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव रख दें.

शंकर सिंह वाघेला ( गुजरात )

जुलाई 2017 में शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है और अभी तक किसी भी पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं. उन्होंने अपने 77वें जन्मदिन पर जिस तरह से शक्ति प्रदर्शन करने हुए रैली की और दंबग आवाज में बोले कि पार्टी ने उन्हें निकाल दिया है, उससे यह तो साफ है कि वह अभी रिटायर नहीं हो रहे हैं. यह भी कहा जाता है कि भारतीय राजनीति में यह तय करना मुश्किल है कि शंकर सिंह वाघेला जैसे लोग किसके दोस्त हैं और किसके विरोधी. और जिस तरह से उन्होंने अभी तक सभी को सस्पेंस में रखा है कि वह किसी ओर जाने वाले हैं, उससे भी उनकी इस छवि के दर्शन हो जाते हैं. गुजरात में वाघेला की एक मजबूत पकड़ है. उन्हें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का गुरू भी कहा जाता है. उनकी ताकत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि 1995 में जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री अमेरिका दौरे पर थे तो उन्होंने 55 विधायकों के साथ विद्रोह कर दिया और वाघेला को मनाने के लिए शर्त के मुताबिक पार्टी ने नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर भेज दिया. उसके बाद 1996 में पार्टी से अलग होकर उन्होंने राष्ट्रीय जनता पार्टी के साथ मिलकर अपनी सरकार भी बना दी. 2019 लोकसभा चुनाव में वह वापस कांग्रेस में जा मिलेंगे या पुराने दोस्त यानी भाजपा में शामिल हो जाएंगे, यह अभी तक सस्पेंस ही है.

मुकुल रॉय ( पश्चिम बंगाल )

कभी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के खासमखास रहे मुकुल रॉय ने नवंबर 2017 में भाजपा का दामन थाम लिया. अगर 2019 लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर देखा जाए तो मुकुल रॉय पश्चिम बंगाल में भाजपा की पकड़ मजबूत करने में काफी काम के आदमी हो सकते हैं. इतना ही नहीं, वह ममता बनर्जी के खास थे यानी उनके पार्टी से हट जाने से बंगाल में टीएमसी भी थोड़ी कमजोर पड़ेगी. मुकुल रॉय की शख्सियत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान उन्हें रेलवे जैसा अहम विभाग सौंपा गया था. खैर, 2019 के लोकसभा चुनावों में मुकुल रॉय क्या तीर मारते हैं ये तो देखने की बात होगी, लेकिन भाजपा को मुकुल रॉय से फायदा होना तो तय है.

जगदंबिका पाल ( यूपी )

एक वक्त था जब जगदंबिका पाल को कांग्रेस का लाल कहा जाता था. यूपी में कांग्रेस की सत्ता के दौरान वह एक दिन के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. लेकिन मार्च 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनावों से पहले ही इस्तीफा दे दिया था और भाजपा में शामिल हो गए थे. नाराजगी थी कि उनके जूनियर मंत्रियों को केंद्र में मंत्री बनाया जा चुका है, लेकिन पाल की अनदेखी की गई है, जिसे उन्होंने अपना अपमान माना और पार्टी से नाता तोड़ लिया. अब 2019 के लोकसभा चुनावों में ये देखना दिलचस्प होगा कि वह भाजपा के साथी बने रहते हैं या फिर कांग्रेस का हाथ थाम लेते हैं.

विजय बहुगुणा ( उत्तराखंड )

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों से पहले मई 2016 में कांग्रेस को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. वह अकेल नहीं आए, बल्कि अपने साथ 9 और विधायकों को ले आए. इस स्थिति में मानो उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने एक बड़ा संकट पैदा हो गया था. भाजपा को विजय बहुगुणा की साफ छवि का फायदा मिला और उनके पार्टी में आने की वजह से पार्टी को मजबूती मिली. साथ ही उनके पार्टी में आने की वजह से 9 अन्य विधायक भी पार्टी में आ गए. खैर, 9 विधायकों को अपने साथ लेकर आए विजय बहुगुणा को अभी पार्टी में कोई बड़ा पद मिला नहीं दिख रहा है ऐसे में वह 2019 के लोकसभा चुनावों में अहम हो सकते हैं. हो सकता है कि भाजपा इस चुनाव में उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंप दे, वरना कांग्रेस की ओर से भी उन्हें लुभावने प्रस्ताव आ सकते हैं.

रीता बहुगुणा (यूपी)

विजय बहुगुणा की बहन रीता बहुगुणा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का एक बड़ा चेहरा थीं. वह उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी थीं, लेकिन उन्होंने भी 20 अक्टूबर 2016 को कांग्रेस का साथ छोड़ दिया और भाजपा की नैया में सवार हो गईं. फिलहाल रीता बहुगुणा उत्तर प्रदेश की पर्यटन मंत्री हैं. भले ही रीता बहुगुणा उत्तर प्रदेश की पर्यटन मंत्री हैं, लेकिन हर मुद्दे पर उनके बयान आते रहते हैं. जैसे हाल ही में उत्तर प्रदेश में सभी विपक्षी पार्टियों के एक साथ होने के कयास पर भी उन्होंने अपनी बात कही है कि जो भी विकास चाहता है वह भाजपा के साथ गठबंधन कर रहा है. वह बोलीं कि मायावती, अखिलेश यादव और राहुल गांधी का अहंकार बहुत अधिक बढ़ चुका है. माना जा रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष रह चुकीं रीता बहुगुणा को पार्टी कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है.

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