बियॉन्ड द क्लाउड्स : हज़ारों बार पर्दे पर देखी गई मुंबई, संवेदनाओं वाली एक भारतीय फिल्म

मुंबई, N.I.T. : 

निर्देशक : माजिद मजीदी

लेखक : मेहरान काशानी, माजिद मजीदी

कलाकार : ईशान खट्टर, मालविका मोहनन, तनिष्ठा चटर्जी, गौतम घोष

रेटिंग : 3.5/5

मुंबई शहर और उसकी अंधेरी बस्तियों पर हमने तमाम फिल्में देखी हैं. जब चिल्ड्रेन ऑफ हैवन और कलर्स ऑफ पैराडाइज़ फेम ईरानी निर्देशक मुंबई पर फिल्म बनाते हैं तो ट्रेलर देखकर हममें से ज्यादातर लोगों को लग सकता है कि वे एक और स्लमडॉग मिलेनियर बनाने वाले हैं. लेकिन फिल्म देखने के बाद एक ईरानी और अमेरिकन निर्देशक के नज़रिए का फर्क साफ नज़र आ जाता है. माजिद, डैनी बॉयल की तरह गरीबी का महिमामंडन नहीं करते. उनके किरदार गरीब ज़रूर हैं, पर फिल्म उनके आस-पास की गरीबी पर नहीं उनके भीतर के सपनों, भावनाओं और उनके बीच की टकराहट के विस्तृत कैनवास पर केंद्रित रहती है.

शुरुआत में आपको लगता है कि फिल्म के मरकज़ी किरदार आमिर पर मुंबई की अंधेरी अंडरबैली में उजाले दिखाने की ज़िम्मेदारी है. पर जल्दी ही आप देखने लगते है कि ऐसा सिर्फ आमिर के साथ ही नहीं है. फिल्म के लगभग हर किरदार के भीतर और बाहर उजाले और अंधेरे की कशमकश बराबर चलती रहती है. अक्सर इस दौड़ में हारते-हारते भी उजाले आगे निकल जाते हैं और आखिर में आप यकीन कर लेते हैं कि बादलों के पार एक रौशनी है जो आपके भीतर के अंधेरों को जीतने नहीं देती. अनिल मेहता का कैमरा जिस तरह से रौशनी और अंधेरे के साथ खेलता है, बिना बहुत से संवादों की ज़रूरत के, फिल्म का संदेश खुद-ब-खुद आप तक पहुंच जाता है.

ड्रग्स और देहव्यापार के कारोबार का बादशाह बनने का ख्वाब देखने वाला आमिर हो, या उसके मां-बाप के गुज़र जाने के बाद उसे पालने वाली तारा. तारा के साथ बलात्कार की कोशिश करने वाला अक्षी हो या जेल में तारा की अंगूठी वापस लौटाने वाली वॉर्डन, इन सब किरदारों की यात्राओं में अंधेरे हैं और माजिद बड़ी मासूमियत से इन्हें रात से गुज़र कर दिन की ओर आते हुए दिखाते हैं. इस काम में उनकी मदद करता है उनका सिग्नेचर अंदाज़. जैसे ही हम राहुल से वेश्यालय में मिलने गए आमिर को एक छोटी बच्ची को हंसाने की कोशिश करते देखते हैं, हमें यकीन होने लगता कि यह माजिद की ही फिल्म है. बच्चों के ज़रिए दुनिया की कड़वी, कसैली और मासूम हकीकतें दर्शकों पर ज़ाहिर करना, माजिद का खास फ़न है.

इंटरवल के पहले के हिस्से में फिल्म घटना प्रधान लगती है. हम किरदारों के भीतर उतरते तो हैं पर फिर भी हम उन करिश्माई पलों का इंतज़ार करते रहते हैं, जो उन्हें हमारा बना दें और जो माजिद की पहचान भी हैं. लेकिन इंटरवल के बाद हमारी यह शिकायत दूर होने लगती है. तब अक्षी की बेटियों आएशा, तनीशा की एंट्री हो या जेल में तारा और छोटू के बीच बढ़ता प्यार, इन नन्हें किरदारों के आने के बाद हम आमिर और तारा सहित कई किरदारों के भीतर की तहें खुलते देखते हैं. खासकर फिल्म का वह आइकोनिक दृश्य जब आमिर आएशा और तनीशा मिलकर तारा के घर की दीवार पर रंगों से एक खूबसूरत बस्ती बसा रहे होते है, फिल्म में बिखरे हुए संदेश को एक जगह ले आता है – ये मुंबई शहर, या फिर ये दुनिया चाहे जितनी भी खुरदरी और अकेली क्यों न हो, इंसान के भीतर की मासूमियत तमाम अकेली चीजों को जोड़ कर उसे जीने लायक बना देती है.

रहमान का संगीत फिल्म में खामोशी से घुला हुआ है. लेकिन फिल्म का पहला गीत, ‘छोटे मोटर चला’ फिल्म की ज़रूरत नहीं लगता. फिल्म में सिलुएट या छाया-चित्रण का बहुत सटीक इस्तेमाल किया गया है. इसके अलावा पंछियों को भी काफी सिनेमैटिकली दिखाया गया है. कबूतर, फ्लैमिंगोज़ और सीगल्स, अलग-अलग दृश्यों के कथानाक को एक अलग ही आयाम दे-देते हैं. दर्शक उनकी मौजूदगी को कहानी में अपने नज़रिए से समझ कर अपने अर्थ चुन सकता है.

बॉलीवुड से इतर फिल्में न देखने वालों के लिए यह फिल्म एक सुखद बदलाव हो सकती है. हज़ारों बार पर्दे पर देखी गई मुंबई को एक संवेदनशील ईरानी निर्देशक की नज़र से देखना आपको ज़रूर पसंद आएगा. और आप ज़रूर चाहेंगे कि आपकी भाषा में आपको ऐसी और भी फिल्में देखने को मिलें. लेकिन माजिद मजीदी के प्रशंसक फिल्म से थोड़े निराश हो सकते हैं. एक नई भाषा, संस्कृति और दर्शकों के लिए फिल्म बनाते हुए माजिद उस सहजता और मजबूती के साथ अपनी बात कहते हुए नहीं दिखते जैसे हम पहले उन्हें बर्ड्स ऑफ पैराडाइज़ या चिल्ड्रन ऑफ हैवन में कहते देख चुके हैं.

अगर किरदारों और अभिनय की बात की जाये तो बच्चों से अभिनय कराने में माजिद को महारत हासिल है. दक्षिण भारत से आई आयशा हो या जेल में पला-बढ़ा छोटू, या फिर वैश्यालय में नज़र आई बच्ची, ये नन्हें किरदार कैमरे पर इतने सहज और मासूम लगते हैं कि आपके दिल में उतर जाते हैं. पहली फिल्म कर रहे ईशान खट्टर फिल्म की जान हैं. वे पूरी शिद्दत से आमिर को पर्दे पर जीते नज़र आते हैं. लेकिन फिल्म देखते हुए आप महसूस करते हैं कि जिस खूबसूरती से ईशान ने अपना किरदार निभाया है उस खूबसूरती से उसे गढ़ा नहीं गया है. किरदार में डीटेलिंग की कमी खलती है. और बिलकुल यही कमी तारा के किरदार को भी फिल्म में जड़ें नहीं पकड़ने देती.

तारा और आमिर के बीच जो कैमिस्ट्री दर्शक महसूस करना चाहते हैं, वह भी फिल्म में नजर नहीं आती. एक तो तारा के किरदार के लिए मालविका मोहनन का गलत चुनाव और दूसरा इस किरदार का उतनी गंभीरता से न गढ़ा जाना, फिल्म को एक ऊंचाई से ऊपर नहीं जाने देते. जेल में जब तारा चीखती है कि उसे यहां नहीं मरना, एक संवेदनशील दर्शक की भंवें सिकुड़ जाती हैं. उसे शक होने लगता है कि शायद इस दृश्य को फाइनल किए जाते वक्त माजिद न तो सैट पर मौजूद थे और न ही एडिटिंग टेबल पर.

लेकिन इन कमियों के बावजूद फिल्म देखी जानी चाहिए. माजिद ने एक नई भाषा में नए लोगों के लिए फिल्म बनाकर जो खतरा मोल लिया है, उसके लिए. ईशान खट्टर के शानदार और उम्मीद जगाने वाले अभिनय के लिए. और इन से भी इतर उन ईरानी संवेदनाओं के लिए जिन्हें हमारे समाज में भी होना ही चाहिए.

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