डायरी से हुआ खुलासा: नस्लवाद के ख़िलाफ़ बोलने वाले आइंस्टीन भी ‘नस्लवादी’ थे

नई दिल्ली, N.I.T. : हाल ही में प्रकाशित हुई अल्बर्ट आइंस्टीन की ट्रेवल डायरी से ये जानकारी मिली है कि उनकी सोच नस्‍लवादी थी.कु छ लेखों से ये अंदाज़ा भी लगाया गया है कि भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन अनजान (परदेसी) लोगों से नफ़रत करते थे.

अल्बर्ट आइंस्टीन ने ये डायरी अक्टूबर 1922 से मार्च 1923 के बीच लिखी थी. इस दौरान वो सुदूर पूर्व और मध्य पूर्व की एक लंबी यात्रा पर थे. उनकी ट्रेवल डायरी के अनुसार इस यात्रा में अल्बर्ट आइंस्टीन ने सिंगापुर, चीन, जापान, श्रीलंका, फ़लस्तीन और कुछ हफ़्ते स्पेन में गुज़ारे थे.
अपनी डायरी में अल्बर्ट आइंस्टीन ने इन देशों के लोगों पर कई नकारात्मक टिप्पणियाँ कीं. जैसे, चीन के लोगों के बारे में उन्होंने लिखा कि चीनी लोग मेहनती होते हैं लेकिन वो गंदे रहते हैं और थोड़े मंदबुद्धि होते हैं.
हालांकि, बाद में अमरीका में रहते हुए आइंस्टीन ने नागरिक अधिकारों की हमेशा वक़ालत की और साल 1946 में उन्होंने नस्लवाद को ‘सफ़ेद लोगों की एक बीमारी’ तक कहा.
लेकिन ये पहली बार है जब अल्बर्ट आइंस्टीन की डायरी के एक अंश को अंग्रेज़ी में प्रकाशित किया गया है. प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस ने आइंस्टीन की इस डायरी को छापा है.
चीनी लोगों के लिए कड़वे शब्द
चीन के लोगों के बाद आइंस्टीन ने श्रीलंका के कोलंबो शहर का वर्णन करते हुए लिखा, “ये लोग कितनी गंदगी में रहते हैं. इनका जीवन कितना निम्न स्तर का है. कम में गुज़ारा करते हैं और उसी में संतुष्ट भी हैं.”
आइंस्टीन की इस डायरी का हवाला देते हुए कुछ मीडिया संस्थानों ने लिखा है कि आइंस्टीन ने सबसे ज़्यादा तीखी टिप्पणियाँ चीनी लोगों पर की हैं.
वो लिखते हैं, “चीनी बच्चे कुन्द और निष्प्राण होते हैं. यही वजह है कि दूसरी नस्ल के लोगों को देखने के बाद, इन चीनी लोगों को देखकर मुझे दया आती है.”
अपनी डायरी में आइंस्टीन ने चीन के बारे में एक अन्य लेख में लिखा कि चीन ‘एक असाधारण झुंड जैसा राष्ट्र’ है. और यहां के लोग ‘मशीनी मानव’ की तरह ज़्यादा लगते हैं.
अल्बर्ट आइंस्टीन को उनकी वैज्ञानिक प्रतिभा और उनके मानवीय विचारों के लिए जाना जाता है.
जब एडोल्फ़ हिटलर और नाज़ी पार्टी का उदय हुआ तो जर्मनी में पैदा हुए अल्बर्ट आइंस्टीन साल 1933 में देश छोड़कर अमरीका चले गए थे.
नज़रिया: ट्रेवल डायरी पर अमरीकी लोगों की राय?
अमरीका के वॉशिंगटन शहर में मौजूद बीबीसी संवाददाता क्रिस बकलर के अनुसार आइंस्टीन के इन लेखों से अमरीका के कुछ लोगों को काफ़ी निराशा हुई होगी क्योंकि ये लोग आज तक अल्बर्ट आइंस्टीन को नस्लभेदी लोगों के ख़िलाफ़ मुखर रही एक आवाज़ के तौर पर देखते आए हैं.
क्रिस लिखते हैं, “जब आइंस्टीन साल 1933 में पहली बार अमरीका आए तो काले और गोरे लोगों के अलग-अलग स्कूल और सिनेमाघर देखकर वो अचंभित रह गए थे. इसके बाद ही वो एक नेशनल एसोसिएशन में शामिल हुए और उन्होंने नस्लभेद के ख़िलाफ़ बोलना शुरू किया. उन्होंने लोगों से ये कहा भी कि जैसे जर्मनी में यहूदी लोगों के साथ भेदभाव होता है, कमोबेश वही स्थिति अमरीका में अफ़्रीकी मूल के लोगों की है.”
लोगों का मानना है कि आइंस्टीन ने अपनी डायरी में जो प्रतिक्रियाएं दर्ज कीं वो उनके उस वक़्त के निजी अनुभवों पर रही होंगी लेकिन बाद में जर्मनी का जो हाल हुआ और जो स्थिति उन्होंने अमरीका में देखी, उससे शायद उनकी राय बदली होगी.
बहरहाल, एक बड़े मानवतावादी और नामी वैज्ञानिक के रूप में सम्मानित अल्बर्ट आइंस्टीन के ये लेख, 21वीं सदी में उनकी प्रतिष्ठा को ख़राब ज़रूर कर सकते हैं.

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