वेब सीरीज़ ‘हारमनी विद एआर रहमान’ न सिर्फ रहमान के संगीत और उसको बनाने की प्रक्रिया से हमें मिलवाती है बल्कि बतौर इंसान वे कैसे हैं, यह भी दिखाती है

मुम्बई, N.I.T. : ‘हारमनी विद ए आर रहमान’ के एक एपीसोड में साधारण से नजर आ रहे एक कंसोल को देखकर रहमान चहक उठते हैं. कहते हैं कि इसका बड़ा वर्जन मेरे पास भी है! यह तब होता है जब वे और मणिपुरी लोक गायिका बेदबति ऑल इंडिया रेडियो, मणिपुर पहुंचकर इस आइकॉनिक संस्थान के चेन्नई और मणिपुर स्टेशनों में बिताए अपने पुराने दिनों को याद करना शुरू करते हैं. थोड़ी देर बाद अल्लाह रक्खा रिकॉर्डिंग स्टूडियो में पहुंचने वाला एक दरवाजा खोलते हैं और उन्हें वहां टेबल पर रखा हुआ यह कंसोल नजर आता है. देखते ही वे चहकते हुए उस यंत्र का नाम लेते हैं और किसी बच्चे की निश्छलता से कहते हैं, ‘मेरे पास इसका बड़ा वर्जन है…उसे इन्फिनिटी एक्स कहते हैं.’

यह घटना मामूली इसलिए नहीं है कि ये वाद्ययंत्रों और मशीनों से रहमान के प्रेम को दर्शाती है. ‘हारमनी विद ए आर रहमान’ में कई जगह आप इस प्रेम की शुद्धता को महसूस करते हैं जब उनके नए-अनोखे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के नाम और उनके उपयोग से आपका वास्ता पड़ता है, और उनसे निकलने वाला साउंड आपको हतप्रभ कर देता है. रहमान के पास ऐसे उपकरणों का जखीरा है जिन्हें वे उतना ही प्यार व सम्मान देते हैं जितना कि एक स्थापित डागर घराने से ताल्लुक रखने वाले पारंपरिक वीणा वादक बहाउद्दीन अपनी रुद्र वीणा को देते हैं. अमेजॉन प्राइम वीडियो पर 15 अगस्त को रिलीज हुई यह सीरीज देखिए, आपको हमारी बात साफ-साफ समझ आएगी.

लेकिन फिर भी, मशीनों से संगीत तैयार करने वाले दर्जनों संगीतकारों और एआर रहमान के बीच खाई बराबर फर्क है. रहमान अपनी मशीनों से प्रेम तो करते हैं, उनसे निकलने वाली ध्वनियों को प्रमुखता से अपने संगीत में जगह भी देते हैं, लेकिन शास्त्रीय संगीत, अंजान रह गए लोक कलाकार और वर्षों की साधना से सीखे गए वाद्ययंत्रों की महता सबसे ज्यादा समझते हैं. इसलिए ‘हारमनी…’ उनकी महंगी मशीनों का शो-ऑफ नहीं है, बल्कि दो मुख्तलिफ संगीत के विचारों की जुगलबंदी है. मशीनी संगीत यानी कि इलेक्ट्रॉनिक म्यूजिक और वर्षों की साधना मांगने वाले पारंपरिक हिंदुस्तानी वाद्ययंत्रों के साथ आने से उपजी ऐसी हारमनी है, जो कई बरसों से रहमान के संगीत को समृद्ध करती रही है. और हमें आज ही जाकर उनके इस दर्शन के पीछे की यात्रा को देखने का मौका मिला है.

पत्रकार करण थापर की किताब ‘डेविल्स एडवोकेट’ (2018) में दर्ज है कि जिस मशहूर शख्सियत का इंटरव्यू करने में उन्हें सबसे ज्यादा कठिनाई आई वो न मोदी थे, न बच्चन. उनका नाम था एआर रहमान! सन् 2000 में पद्म श्री मिलने के बाद हुए इस साक्षात्कार में लंबे बालों वाले संकोची रहमान ने हूं हां में ही ज्यादातर प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश की थी और करण थापर को उनसे जवाब निकलवाने के लिए तीन बार इंटरव्यू को दोहराना पड़ा था.

‘हारमनी…’ देखते वक्त लगता है कि थापर शायद किसी और ही रहमान की बात कर रहे थे! यह सीरीज न सिर्फ उनके संगीत और उसको बनाने की प्रक्रिया से हमें मिलवाती है, बल्कि बतौर इंसान रहमान कैसे हैं यह भी हमें नजर आता है. वो दूसरों को सुनते वक्त कितनी दिलचस्पी लेते हैं, उनके संगीत को समझने के लिए खुद किस तरह अजनबियत मिटाने की कोशिश करते हैं, लंबी दूरी पर मौजूद एक कलाकार की कलारी (कक्षा) तक साइकिल चलाकर जाते हैं और लंबे अरसे बाद साइकिल चलाने की वजह से स्टेंड लगाने में जद्दोजहद करते हैं. पीजे भी मारते चलते हैं और उन पर बच्चों की तरह छोटी-छोटी हंसी हंसते हैं. अजनबी कलाकारों से अपने पिता की स्मृतियां साझा करते हैं, नुसरत फतेह अली खान से जुड़ा एक किस्सा सुनाते हैं और मणिपुर के मनोरम लैंडस्केप के बीच कार चलाते वक्त दार्शनिक होकर कहते हैं कि हम अपने कांक्रीट के जंगलों में रहते हुए इन्हीं जगहों के वॉलपेपर लगाते हैं. यह सब वे बिना संकोची हुए ऑन-कैमरा करते हैं.

यह इस सीरीज की अजीब-सी एक खासियत भी है. कि वो अपने कार्यक्रम के सूत्रधार को ‘हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के खुदा’ के तौर पर प्रस्तुत नहीं करती. जो कि रहमान हैं ही! मद्रास के इस मोजार्ट से जुड़े अब तक के सारे ही प्रोग्राम, इंटरव्यूज, शोज, लाइव जुगलबंदियां उनके इसी आभामंडल के सामने हमेशा से नतमस्तक नजर आते रहे हैं, और इस वजह से हमें कभी भी –‘रोजा’ के वक्त से गिनें तो उन्हें संगीत कंपोज करते हुए 26 साल हो गए हैं – रियल रहमान को देखने-समझने का मौका नहीं मिला. ‘हारमनी…’ यही दुर्लभ मौका हमें देती है. वो उन्हें हिंदुस्तानी संगीत के खुदा के तौर पर सभी कलाकारों से ऊपर बिठाने की जगह मुख्तलिफ संगीत की खोज में मीलों के सफर पर निकले एक सूफी की तरह प्रस्तुत करती है. और सूफी के लिए तो सब बराबर होते हैं– क्या अंजान कलाकार और क्या स्थापित, क्या जात-पात और क्या सामाजिक ऊंच-नीच. यह एक दुर्लभ एप्रोच है जिसे आप यह सीरीज देखकर ही समझ सकते हैं.

अमेजॉन प्राइम वीडियो पर मौजूद यह सीरीज 40-45 मिनट के पांच एपीसोड्स की एक बेहद जरूरी सीरीज भी है. जरूरी इस मायने में कि हमारा मौजूदा पॉपुलर संगीत – चाहे फिर वो फिल्म संगीत हो या फूहड़ रिएलिटी शोज वाला – जिस तेजी से गर्त में गिरता जा रहा है वो खौफनाक है. संगीत से प्रेम करने की जगह उसे बाजारू बनाने वाले कलाकारों के बीच कोई एआर रहमान के कद वाला संगीतकार ही ऐसा ‘टॉर्च बीयरर’ बन सकता है जो रैप करने को गायकी समझने वाली नयी पीढ़ी के बीच संगीत की समझ बढ़ा सके. इसलिए इस सीरीज में पहले चार एपीसोड तीन मुख्तलिफ व कम सुने वाद्ययंत्रों, उन्हें बजाने वाले कलाकारों, और एक गायिका की यात्रा को तफ्सील से बयां करते हैं. सूत्रधार रहमान रहते हैं, जो कि उनसे मिलने के लिए सुदूर शहरों तक का सफर करते हैं और हर एपीसोड में उनके साथ दो जुगलबंदियां पेश करते हैं. अपने अनोखे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (हारपेजी, फिंगरबोर्ड, एटीवी फ्रेम, सीबोर्ड) और पारंपरिक वाद्य-यंत्रों व लोक कलाकारों के साथ बिना खास तैयारी के खुले में त्वरित संगत बिठाते हैं.

फिर आखिरी एपीसोड में सभी कलाकार रहमान के घर चेन्नई पहुंचते हैं. और उनके स्टूडियो में साथ मिलकर 20 मिनट से अधिक की ‘मन मौज में’ नाम की वह जुगलबंदी पेश करते हैं जिसे वर्णित करने के लिए सिर्फ एक कायदे का शब्द हिंदी भाषा में रचा गया है – चमत्कारिक!

कहने को तो यात्राओं पर निकलकर संगीत तलाशने और मुख्तलिफ मिजाज के कलाकारों को साथ लाने वाले कार्यक्रमों का फॉर्मेट नया नहीं है. हमारे यहां ही कोक स्टूडियो विपरीत छोरों पर मौजूद कलाकारों को साथ एक मंच पर लाता रहा है. स्नेहा खानवलकर ने एमटीवी के शो ‘साउंड ट्रिपिंग’ में शहर-शहर गांव-गांव भटककर प्रतिभाएं व साउंड्स खोजे हैं और उन्हें अपने संगीत में समाहित किया है. ‘द ड्यूरिस्ट्स’ कुछ पांच सीजन तक यही काम सुघड़ता से करता रहा है. लेकिन ये सभी कार्यक्रम और उनके तैयार किए गए परफॉर्मेंस कहीं न कहीं हिंदी फिल्म संगीत और लोकप्रिय पॉप म्यूजिक की परिधि के आसपास ही विचरण करते हैं.

रहमान के शो की खास बात है कि चारों कलाकार और उनके वाद्ययंत्र तथा गायकी मिजाज में ही फिल्म संगीत की विलोम है. बॉलीवुड तो फिर छोड़ ही दीजिए. बावजूद इसके रहमान सबकी साथ संगत कराते हैं और आखिरी एपीसोड में फाइनल परफॉर्मेंस से पहले बैठक जमाते वक्त कहते भी हैं कि हम सब जो करने जा रहे हैं वह कोई म्यूजिकल फॉर्म नहीं है, लेकिन फिर भी उस फ्यूजन में हारमनी होगी. तारतम्य होगा.

इस आखिरी एपीसोड से पहले, एक एपीसोड में रहमान मणिपुरी लोक गायिका बेदबति से मिलने मणिपुर जाते हैं. इस पूरे एपीसोड में एक-दूसरे से बात करते वक्त रहमान अंग्रेजी का उपयोग करते हैं और बेदबति मणिपुरी का. हमें नहीं दिखाया जाता कि एक-दूसरे की भाषा से अंजान दोनों कलाकारों को बातें अनूदित करके समझाई गईं हैं या नहीं. लेकिन इस बातचीत से एक बेहद सटल इशारा दे दिया जाता है कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती. उम्दा टच!

जैसा कि बाकी के एपीसोड में भी होता है, रहमान इन मणिपुरी गायिका से उनकी जीवन-यात्रा से लेकर कुनुंग इशाई नामक संगीत की यात्रा तक से जुड़े सवाल करते हैं, और खासकर जब संगीत से जुड़ी बातें करते हैं तो आप रहमान के व्यक्तित्व से भी रूबरू होते हैं. उनके ऐसे सवालों की गहराई सबसे ज्यादा दूसरे एपीसोड में उभरकर सामने आती है जब वे नवी मुंबई में रहने वाले सरस्वती पूजक वीणा-वादक उस्ताद मोही बहाउद्दीन डागर से मिलते हैं. चूंकि उस्ताद बहाउद्दीन बरसों से वीणा साध रहे हैं और सीरीज के बाकी कलाकारों की तुलना में अपने क्षेत्र में अच्छा-खासा नाम कमा चुके हैं, इसलिए उनकी और रहमान के बीच की बातचीत एकदम खरे सोने जैसी मूल्यवान मालूम होती है! यह एपीसोड सीरीज का सर्वोत्तम एपीसोड इन आपसी संवादों की वजह से भी बनता है, वृहद और बेइंतहा ही खूबसूरत वीणा के बेहतरीन क्लोज-अप शॉट्स की वजह से भी, और बहाउद्दीन साहब के बताए उस फलसफे की वजह से भी कि उनके गुरू कहा करते थे कि सुर को देखो कि वो कैसा है, न कि सुर को सुनो! इसी खूबसूरत थॉट से इस बेमिसाल एपीसोड का नामकरण भी होता है– लुकिंग एट द स्वर!

एक दूसरे एपीसोड के लिए रहमान सिक्किम जाते हैं, और वहां के सबसे पुराने वासियों में से एक माने जाने वाले लेपचा जनजाति के मिकमा से मिलते हैं. लेपचा जनजाति के लोग प्रकृति को पूजते हैं और मिकमा लेपचा की पंथोंग से निकला संगीत भी उसी प्रकृति की साधना करता है. पंथोंग एक खास तरह की बांसुरी को कहा जाता है जिसके लिए यह कलाकार खुद ही हिमालय के पहाड़ों में पाए जाने वाले एक खास किस्म के बांस को काटकर लाता है और अंगीठी में तापकर इस बांसुरी को बनाता है. रहमान इस संकोची व अंजान कलाकार के साथ भी अपने एक जादुई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सीबोर्ड के साथ जुगलबंदी करते हैं और खूबसूरत बैकड्राप वाली इस जुगलबंदी को देखते हुए रह-रहकर पहले एपीसोड के अंजान व संकोची साजिथ याद आते हैं.

अपने पहले एपीसोड में ‘हारमनी…’ जब केरल पहुंचती है, तब वहां के कलामंडलम् नाम के एक कला केंद्र में हमारी मुलाकात कलामंडलम् साजिथ विजयन नाम के एक शिक्षक से होती है. साजिथ ने सालों की साधना के बाद मिरावा नामक अनोखे परकशन इंस्ट्रूमेंट (जिसे हिंदी में आघात-वाद्ययंत्र कहते हैं) को सीखा है और अब वो कलामंडलम् के छात्रों को धार्मिक कर्मकांडों में ज्यादातर उपयोग होने वाला यह वाद्ययंत्र सिखाते हैं. यह तांबे का बना हुआ एक बहुत बड़ा मटका होता है, कम लंबाई के किसी आदमी की लंबाई जितना, जिसके मुंह पर तबले की तरह बछड़े की सफेद चमड़ी बांधी जाती है. इसे लंबे समय तक बजाना आसान नहीं है क्योंकि तांबा सीधे आपकी तेज पड़ती उंगलियों पर प्रहार करता है, लेकिन यही रफ्तार इसके साउंड को खालिस अद्भुत बनाती है. कहते हैं कि शिव के तांडव के वक्त इसे बजाया गया था और जब हट्टे-कट्टे साजिथ इसे डूबकर बजाते हैं तो आप शिव के उस नृत्य की कल्पना में आसानी से डूब सकते हैं.

‘हारमनी विद ए आर रहमान’ की एक और खास बात उसके नयनाभिराम विजुअल्स हैं. मणिपुर से लेकर केरल और फिर सिक्किम की खूबसूरती को सिनेमेटोग्राफर विराज सिंह गोहिल ने जिस खूबसूरती से स्लो-मोशन व एरियल शॉट्स के माध्यम से कैप्चर किया है, वो दिव्य है. खूबसूरत संगीत के साथ तो और भी ज्यादा दिव्य! वीणा तो वीणा, बांसुरी तक के दृश्य इतने प्यार से लिए गए हैं कि इन वाद्ययंत्रों का घर पर न होना आपको कचोटने लगेगा. केवल मशीनों से संगीत बनाने वाले इस दौर में यह सीरीज एक बहुत बड़ा काम यह भी करती है कि हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के खुदा की टेक लेकर हिंदुस्तान के पारंपरिक वाद्ययंत्रों को उनकी सुंदरता लौटाती है. आप इसे अवश्य देखें.

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