‘स्त्री’ की कहानी में एक ऐसा कंटेम्पररी ट्विस्ट है जो इस हल्की-फुल्की हॉरर-कॉमेडी को वजनदार, समझदार और अनोखी फिल्म भी बना देता है

“सिकुड़ चुके हॉरर जॉनर की ‘स्त्री’ अपनी कहानी को ह्यूमर के छींटे मार बढ़िया इस्त्री करती है”

मुम्बई, N.I.T. : 
निर्देशक : अमर कौशिक

लेखक : राज और डीके, सुमित अरोड़ा

कलाकार : राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, श्रद्धा कपूर, अपारशक्ति खुराना, अभिषेक बनर्जी, विजय राज

रेटिंग : 3.5 / 5

‘स्त्री’ में कई सारी नादानियां हैं. इन्हीं चीजों को अंग्रेजी में सिलीनेस कहा जाता है! लेकिन जब हॉरर और कॉमेडी मिलती है, तो सिलीनेस ही सिलबट्टे पर पिसती है, ये सच बात है. जैसे इस फिल्म के लेखक राज और डीके की जोड़ी ने जब घनघोर मौज देने वाली ‘गो गोवा गॉन’ (2013) निर्देशित की थी तो जॉम्बी हॉरर जॉनर और कॉमेडी का मेल कराया था – ठीक महा-मनोरंजक ब्रिटिश फिल्म ‘शॉन ऑफ द डेड’ (2004) की तरह – और उसका यही सिली अंदाज हमें बेइंतहा भाया था. इसलिए समझने वाली बात है कि बेवकूफियां या मूर्खताएं करने वाली हर फिल्म सिली नहीं होती.

हॉरर-कॉमेडी जॉनर वाली ‘स्त्री’ की नादानियां उसकी खासियत भी बनती हैं और हास्य एक दूसरी हॉरर-कॉमेडी फिल्म ‘गोलमाल 4’ के स्तर का सस्ता भी कभी नहीं होता. बुद्धिमान बना रहता है, और तीन दोस्तों (राव, अपारशक्ति और अभिषेक) व पंकज त्रिपाठी के किरदार के बहाने आपको हंसाता-गुदगुदाता रहता है. लेकिन सनद रहे कि हॉरर-कॉमेडी जॉनर को हमारे यहां सिर्फ एक तरीके से समझा जाता रहा है – भूत-प्रेतों द्वारा पैदा किया गया वैसा वाला खौफ जो मजाकिया हो. जबकि ‘स्त्री’ शुद्ध रूप से एक हॉरर फिल्म है जो कि आपको डराने की भरपूर कोशिश करती है, और इसमें हास्य उत्सर्जन केवल घटनाओं से और पात्रों के आपसी व्यवहार से जन्म लेता है.

हिंदी सिनेमा में हॉरर का उपयोग 21वीं सदी में भी कई फिल्मकार केवल खौफ पैदा करने के लिए करते हैं. खुलते दरवाजे की चर्र-चर्र आवाज और तपाक से भूतिया चेहरे का क्लोज-अप दिखाने जैसे चूरन चीप थ्रिल्स ही उनकी महत्वाकांक्षा होती हैं. मुकम्मल कहानियां कहना उनका मकसद कभी नहीं रहता. लेकिन हाल-फिलहाल में ‘एक थी डायन’, ‘परी’ और ‘घूल’ जैसी फिल्में व सीरीज मुकम्मल कहानियां कहने के लिए हॉरर का सदुपयोग करने लगी हैं. ‘स्त्री’ भी उसी लीग की फिल्म है जो कि सिकुड़ते हॉरर जॉनर को हिंदी सिनेमा में फिर से जिंदा करने में मददगार साबित होने वाली है.

यह फिल्म 90 के दशक के एक अंधविश्वास ‘नाले बा’ पर आधारित है जो कि तब के बैंगलोर में घटित हुआ था. हालांकि देश के कई दूसरे हिस्सों में भी ऐसी कहानियां सुनने को मिलती रही हैं. एक नवविवाहिता को समाज परेशान कर मार डालता है और वो अपना बदला लेने वापस लौटती है. खुद को बचाने के लिए गांववाले घरों के बाहर लिख देते हैं कि ‘कल आना’ और वो बार-बार अगले दिन लौटती है. जिनको अपना शिकार बनाती है उनके केवल कपड़े छोड़ जाती है, और उन्हें अपने साथ ले जाती है.

लेकिन चूंकि राज व डीके समझदार निर्देशक-लेखक हैं इसलिए उन्होंने अंधविश्वास की एक कहानी को परदे पर ज्यादा बड़ा अंधविश्वास रचने में खर्च नहीं किया. कहानी को सर के बल खड़ा करके कंटेम्पररी ट्विस्ट दिया है, साफ-साफ कहें तो फेमिनिस्ट ट्विस्ट, और ऐसा करना एक हल्की-फुल्की हॉरर-कॉमेडी को वजनदार, समझदार और कहना न होगा कि अनोखी फिल्म भी बना देता है.

एक किरदार जब भूतिया खंडहर में जाकर कहता है कि मुझे यहां क्यों ले आए यार, स्त्री जबरदस्ती उठाकर ले जाएगी, तो दूसरा समझदार किरदार कहता है कि वो मर्द नहीं, स्त्री है, जबरदस्ती नहीं उठाती! उसकी आवाज पर पलटो तभी समझती है कि ‘यस मीन्स यस’! एक दूसरी जगह इस स्त्री की वजह से रात होते ही सारे मर्द घरों में बंद हो जाते हैं और स्त्रियां उन्हें घरों में रहने की हिदायत देने के बाद घरों के बाहर आजाद विचरण करती हैं. राज व डीके इस अंधविश्वासी कहानी से जुड़े इस हास्यास्पद तथ्य को भी नहीं बख्शते कि यह चुड़ैल पढ़ी-लिखी है और ‘स्त्री कल आना’ पढ़कर वापस लौट जाती है.

एक बेहद बढ़िया सीक्वेंस इस अंधविश्वास के अंदर मौजूद अंधविश्वासों की पोल खोलने के लिए सटल अंदाज में पांचों मुख्य पात्रों के बीच रचा जाता है और चुड़ैल के पढ़े-लिखे होने की बात पर एक समझदार पात्र कहता है,‘ये है नए भारत की चुड़ैल!’

स्त्री के चुटीले व नुकीले संवाद सुमित अरोड़ा ने लिखे हैं और मारक मजा देने के अलावा राजनीतिक टिप्पणियां करने में भी वे पीछे नहीं रहे हैं. एक पात्र आज भी इमरजेंसी के दौर में जी रहा है और कोई अहम सवाल करो तो वापस पूछता है कि इमरजेंसी खत्म हो गई! कहने वाले कह सकते हैं कि इन दिनों हर कोई इमरजेंसी पर चुटकुले सुना रहा है लेकिन आज का जो विपक्ष है उसने भी अनेकों साल वही अभिव्यक्ति की आजादी छीनने की कोशिश की है जो आज की सत्ताधारी पार्टी कर रही है. इसलिए कहानी की मांग हो न हो, फिल्मकारों का इंदिरा गांधी या इमरजेंसी पर चुटकुलेबाजी करने के मौके पटकथाओं में निकालना गलत नीयत का परिणाम नहीं कहा जा सकता. अभिव्यक्ति की आजादी जब भी मिलेगी, सुधीजन उसका उपयोग करेंगे ही. (वैसे सोशल मीडिया पर मजाक का शिकार बनने वाले ‘भक्तों’ पर भी फिल्म में एक नुकीला तंज है, चिंता मत कीजिए!)

इस बात की भी चिंता मत कीजिए, कि कहीं श्रद्धा कपूर ने अभिनय का फिर से श्राद्ध तो नहीं कर दिया होगा! न सिर्फ वे फिल्म में खूबसूरत लगी हैं बल्कि अभिनय भी संयमित करती हैं. उनके रहस्यमयी किरदार के लिए निर्देशक अमर कौशिक ने उन्हें कोरा चेहरा रखने का निर्देश दिया होगा और काफी हद तक उन्होंने इसकी तामील की है. क्या ये काफी नहीं है!

राजकुमार राव के दोस्तों की भूमिका में अभिषेक बनर्जी और अपारशक्ति खुराना दोनों ही प्रभावी अभिनय करते हैं. पटकथा भी उन्हें हरदम साथ लिए चलती है, कर्रे संवाद मिलते रहते हैं, और यह कहना मुश्किल काम है कि किसने कम अच्छा काम किया है. लेकिन सबसे अच्छा सर्वज्ञानी रुद्र बनकर पंकज त्रिपाठी ने किया है, और इसलिए किया है कि उन्हें पता है कि सीन में तीसरे-चौथे नम्बर का मुख्य पात्र होने के बावजूद कैसे हर सीन को केवल अपना बनाना है. वो भी सहजता से, जैसा कि उनका अभिनय है. उनका मुख्य काम मुख्यत: इंटरवल के बाद शुरू होता है और फिल्म भी तभी से, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में… लाफ-रायट बन जाती है. हंसी का दंगा! उनके मुख से निकली शुद्ध हिंदी सुनना भी अलग सुख देता है.

राजकुमार राव विक्की बनकर ‘बरेली की बर्फी’ के प्रीतम विद्रोही की याद दिलाते हैं. फिर भी दोहराव-ग्रसित नहीं लगते और आंखों से नाप ले लेने वाले ‘चंदेरी के मनीष मल्होत्रा’ के रोल में चार चांद लगा देते हैं. शुरू-शुरू में लगता है कि छोटे शहर का लौंडा बनने की जल्दी में बहुत तेज संवाद बोलकर उनकी रेलमपेल बना रहे हैं लेकिन जल्द ही संयमित होकर प्यार, काम और चुड़ैल के बीच फंसे ‘शहर के रक्षक’ की भूमिका वे बेहद इत्मीनान से निभाते हैं. हमें लगने लगा है कि अब उनके अभिनय में नुक्स निकालने के नुस्खे हमें किसी विदेशी एक्टिंग यूनिवर्सिटी में जाकर सीखने पड़ेंगे!

तब तक आप य़ह फिल्म देखिए. इसकी लंबाई कम होती, पहला हिस्सा ढीला न होता, एक गाना भी न होता और क्लाइमेक्स बहुत जोरदार होता तो यह साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिनी जाती. अभी हॉरर जॉनर की कहानी पर ह्यूमर का पानी छिड़ककर बढ़िया इस्त्री करने वाली फिल्म के तौर पर गिनी जाएगी ‘स्त्री’.

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