क्या यूपी में महागठबंधन से पहले अपना मोर्चा आगे करके शिवपाल यादव ने बड़ा दांव खेल दिया है..?

लखनऊ, N.I.T. : उत्तर प्रदेश के समाजवादी कुनबे में एक बार फिर अलगाव का धुआं दिखने लगा है. लोकसभा चुनाव से पहले उठ रहा यह धुआं विधानसभा चुनाव के पहले उठी चिंगारियों की पुनरावृत्ति भी है और समाजवादी कुनबे के बिखराव की परिणति भी. विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में जो सरफुटव्वल शुरू हुई थी, उसमें अंत यह तय नहीं हो पाया था कि झगड़ा किस बात का है और तक कौन किससे लड़ रहा है. कभी लगता था कि झगड़ा अखिलेश और मुलायम के बीच है, कभी लगता था कि झगड़ा अन्तःपुर की वजह से है तो कभी लगता था कि झगड़े की जड़ चाचा भतीजे के बीच में कड़ी है.

जिंदाबाद-मुर्दाबाद और सड़कों में नारेबाजी के बीच एक मौके पर तो सार्वजनिक मंच पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और चाचा शिवपाल यादव के बीच धक्का-मुक्की की नौबत तक आ गई थी. झगड़ा घर और पार्टी के दफ्तर से निकलकर चुनाव आयोग तक भी पहुंचा मगर चुनाव के नतीजों ने सबको उनकी हैसियत बता दी और एक अघोषित युद्ध विराम खुद ब खुद लागू हो गया. लेकिन अब बरसात के नम मौसम में समाजवादी कुनबे में फिर से अलगाव की चिंगारी सुलगने लगी है.

शिकायत का सिलसिला

पिछले कई महीनों की तनातनी के चिंगारियों में बदलने के पीछे हाल की कुछ घटनाएं रहीं. सबसे पहले पुराने समाजवादी नेता भगवती सिंह के जन्मदिन के मौके पर मुलायम सिंह यादव की रुलाई फूटी. उन्होंने कहा, ‘अब मेरा कोई सम्मान नहीं करता. शायद मरने के बाद करें.’ मुलायम की इस पीड़ा की आह दूर तक पहुंची और अगले ही दिन अखिलेश के ‘अंकल’ अमर सिंह लखनऊ में प्रकट हुए. उन्होंने अखिलेश की समाजवादी पार्टी को नमाजवादी पार्टी कहकर अखिलेश और मुलायम दोनों पर निशाना साधा. कहा ‘मेरी जिस बेटी को अखिलेश बहन की तरह मानते थे, उसे तेजाब से जलाने वाले आजम के बयान पर पिता पुत्र की चुप्पी यह समझने के लिए काफी है कि वे कितनी सतही स्तर की राजनीति कर रहे हैं.’

अमर सिंह ने मुलायम सिंह को धृतराष्ट्र की संज्ञा देते हुए कहा कि मुलायम को अपने जीते जी सपा की शव यात्रा देखनी पड़ेगी. अमर सिंह ने यह भी दावा किया कि शिवपाल यादव को भाजपा से जोड़ने के बारे में उन्होंने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से बात कर ली थी, लेकिन शिवपाल ऐन मौके पर वहां पहुंचे ही नहीं.

अमर सिंह के बाद बारी शिवपाल सिंह यादव की थी. मुलायम के साथ लोहिया ट्रस्ट की बैठक में हुई लंबी बातचीत के अगले ही दिन यानी 30 अगस्त को शिवपाल ने लखनऊ में मीडिया के सामने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाने का ऐलान कर दिया. शिवपाल ने कहा, ‘सपा में अपनी इज्जत नहीं होने से मैं बहुत आहत हूं. नेताजी भी कह चुके हैं कि उनको सम्मान नहीं दिया जाता, उनकी उपेक्षा हो रही है. मोर्चा बनाकर नेताजी का सम्मान वापस दिलाया जाएगा. मैं खुद भी सम्मान करूंगा और उनसे भी सम्मान करने का आग्रह करूंगा जो अभी उनका सम्मान नहीं कर रहे है.’

शिवपाल ने इस मोर्चे में संगठन में उपेक्षित चल रहे कार्यकर्ताओं को जोड़ने की बात कही. उनका यह भी कहना था कि सेक्युलर मोर्चा प्रदेश में मजबूत विकल्प के तौर पर सामने आयेगा. हालांकि मोर्चे के गठन के तत्काल बाद ही यह भी घोषित कर दिया गया कि यह मोर्चा समाजवादी पार्टी का अंग रहकर ही कार्य करेगा. शिवपाल यादव के पुत्र आदित्य यादव ने कानपुर में मीडिया के सामने स्पष्ट किया कि शिवपाल का मकसद समाजवादी पार्टी से अलग होना नहीं हैं. उधर, इस मोर्चे के गठन के अगले ही दिन महीनों बाद समाजवादी पार्टी के दफ्तर पहुंचे मुलायम सिंह यादव ने मोर्चे के बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

लेकिन मोर्चा बनाने की घोषणा के बाद शिवपाल खेमे को जो उत्साहजनक प्रतिक्रियाएं समाजवादी पार्टी के भीतर से मिलीं उनके चलते उन्होंने अपना रुख बदल लिया. मोर्चे के ऐलान के चार दिन बाद ही बागपत और मुजफ्फरनगर में दो कार्यक्रमों के बीच ही यह घोषणा करके उन्होंने सबको चौंका दिया कि उनका सेक्युलर समाजवादी मोर्चा कुछ छोटे दलों के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा. उत्तर प्रदेश में अब तक सिर्फ बीजेपी ही 80 सीटों के गठबंधन के जरिए चुनाव लड़ने की दावेदारी कर रही थी. शिवपाल की इस दावेदारी से विपक्ष के गठबंधन में सेंध भी लग सकती है और समीकरण बिगड़ भी सकते हैं.

वैसे तो सपा में अपने अपमान से क्षुब्ध शिवपाल ने पिछले वर्ष पांच मई को ही इटावा में मुलायम सिंह की मौजूदगी में एक मोर्चा बनाने की घोषणा कर दी थी. लेकिन इसके तुरंत बाद ही मुलायम ने पलटी मार दी और शिवपाल को सपा में राष्ट्रीय महासचिव का पद देने की बात कह कर मोर्चे पर विराम लगा दिया. मगर शिवपाल के लिए समाजवादी पार्टी में इसके बाद भी कोई जगह नहीं बन पाई और उनकी हैसियत अयाचित जैसी ही रही. इसी के बाद शिवपाल ने अपनी तैयारियां शुरू कर दीं. 11 जून, 2018 को उनके निर्देश पर समाजवादी अल्पसंख्यक मोर्चे के पूर्व अध्यक्ष फरहत हसन ने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाने की घोषणा की थी और अब शिवपाल ने इस मोर्चे की कमान अपने हाथ में ले ली है और सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा करके राजनीतिक माहौल में खलबली मचा दी है.

बड़ा दांव

उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस का गठबंधन कोई ठोस आकार लेता इससे पहले ही अपने मोर्चे को आगे करके शिवपाल ने बड़ा दांव खेल दिया है. इस दांव के जरिए एक ओर उन्होंने भाजपा में शामिल होने की अटकलों को खारिज करने की कोशिश की है तो एक दर्जन से ज्यादा समाजवादी विधायकों और अनेक बड़े नेताओं को उपेक्षितों की सम्मान बहाली के नारे के साथ अपने पाले में ले आने का दावा करके अखिलेश यादव की मुश्किलें बहुत बढ़ा दी हैं.

यह तो सब जानते हैं कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है. नये-पुराने की प्रतिद्वन्दिता, पुरानों में ज्यादातर पर शिवपाल खेमे का वफादार होने का संदेह और अखिलेश का चाटुकारों से घिरे रहना बहुत समस्याएं पैदा कर रहा है. उस पर बसपा से तालमेल की अटकलों के चलते कम से कम 40 लोकसभा सीटों पर समाजवादी नेताओं की उम्मीदवारी संकट में है. ऐसे में ये सब लोग शिवपाल के मोर्चे में शामिल हो सकते हैं. फिर बाकी दलों के असंतुष्टों के लिए भी इस मोर्चे में सम्भावनाएं हैं. शिवपाल सिंह ने मुलायम की छत्रछाया में रहकर कार्यकर्ताओं को जोड़े रखने और संगठन को चलाने के जो गुर सीखे हैं वह भी उनके मोर्चे के लिए ताकत बन सकते हैं.

मोर्चे को सेक्युलर नाम देकर उन्होंने उत्तर प्रदेश में महागठबंधन या महागठबंधन से इतर किसी दूसरे राजनीतिक गठजोड़ के दरवाजे भी खोल दिए हैं. इसके साथ ही उन्होंने समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में अपनी हिस्सेदारी भी मजबूत कर ली है. मोर्चा यदि अपनी घोषणा के अनुरूप सभी 80 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ता है तो उसके विजयी उम्मीदवारों की संख्या चाहे कुछ भी हो, मगर यह तय है मोर्चे के कारण दूसरी पार्टियों का खेल जरूर बिगड़ेगा.

इसलिए समाजवादी पार्टी में मोर्चे को लेकर सबसे अधिक प्रतिक्रिया दिख रही है. अखिलेश यादव खुद सुरक्षा मोर्चे पर तैनात हो गये हैं. जेबी मीडिया के जरिए तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही है. शिवपाल को कारण बताओ नोटिस से लेकर परिवार में एकता होने तक के नए नए दावे किए जाने लगे हैं.

लेकिन शिवपाल ने अब अपनी राह तय कर ली है. वे कहते हैं, ‘मैं दो साल से परिवार और पार्टी को जोड़ने की कोशिश कर रहा था. लेकिन मुझे लगातार बेइज्जत किया जा रहा था. आखिर कितनी बेइज्जती सहता. इसलिए अब सेक्युलर मोर्चे के जरिए लड़ाई लड़ी जायेगी. हाशिए पर रख दिए अहम लोगों के साथ अब यह मोर्चा दबे-कुचले और वंचितों को उनका हक दिलाने के लिए लड़ेगा.’

शिवपाल के बयान और मोर्चे की घोषणा पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना था, ‘नाराज तो मैं भी हूं, लेकिन मैं कहा जाऊं’. अखिलेश की यह बात समाजवादी पार्टी और समाजवादी कुनबे की आंतरिक स्थितियों को बहुत हद तक साफ कर देती है. इस टिप्पणी से यह भी दिखता है कि शिवपाल का दांव एकदम निशाने पर लगा है.

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