गली गुलियां : सिर्फ अपने अभिनय बल्कि इस फिल्म को करने के लिए भी मनोज बाजपेयी हर तरह के सम्मान के हकदार हैं

मुम्बई, N.I.T. : 

लेखक-निर्देशक : दीपेश जैन

कलाकार : मनोज बाजपेयी, ओम सिंह, नीरज कबी, शहाना गोस्वामी, रणवीर शौरी

रेटिंग : 3.5 / 5

समीक्षा का शीर्षक कैसा लगा आपको? इसलिए पूछा कि इस तरह के चंचल शीर्षकों के साथ अक्सर अतिनाटकीय होने के खतरे जुड़े होते है. लेकिन क्या करें, कभी-कभी ही तो ऐसी फिल्म हमारी नजर होती है जिसमें उसके मुख्य कलाकार का अभिनय इस कदर भाव-विभोर कर देता है कि आप साष्टांग दंडवत होकर अभिनय की उस मास्टरक्लास को धन्यवाद कहना चाहते हैं. ऊपर से ‘गली गुलियां’ न सिर्फ मनोज बाजपेयी के अद्भुत अभिनय की वजह से इस शीर्षक के काबिल बनती है, बल्कि इसलिए भी कि वे एक ऐसी साहसी फिल्म में बेजोड़ अभिनय करते हैं जो कि धीमी गति का बेहद ऑफ-बीट सिनेमा है. इतना कि उनकी ही लीग के कई काबिल अभिनेता इसे करने से इंकार कर देते.

वजह कुछ ये हैं कि ऐसी अति प्रयोगधर्मी फिल्मों को अब लोग ‘नेटफ्लिक्स पर ही देखेंगे यार’ जैसी सोच तक सीमित करने लगे हैं. सिनेमाघरों में बेहद कम शोज के साथ तीन-चार बड़ी फिल्मों के पीछे इन्हें खड़ा रहना पड़ता है. अनुराग कश्यप जैसे होनहार निर्देशक का साथ न मिलने की वजह से इन्हें वह पब्लिसिटी भी नहीं मिलती जो सिनेमा में बौद्धिकता ढूंढ़ने वाले दर्शकों तक इन्हें आसानी से पहुंचा सके. इसलिए बड़ी संभावना होती है कि शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को किरदार में पूरी तरह झोंक देने के बावजूद मुख्य अभिनेता को वह सराहना न मिले जिसके वह प्रथम दृष्टया लायक है.

लेकिन सिनेमा को ‘आर्ट’ कहा ही इसलिए जाता है कि कुछ बिरले निर्देशक और एक्टर इन सब चीजों से ऊपर उठकर सोचने की प्रतिभा रखते हैं. इसीलिए हमें ‘गली गुलियां’ जैसी उम्दा साइकोलॉजिकल ड्रामा फिल्म मिल भी पाती है जो कि त्वरित तृप्ति देने की जगह कई सिनेमाई मेटाफरों का उपयोग कर हमें सोचने पर विवश करती है. पागलपन की दहलीज पर खड़े अपने नायक की कैरेक्टर-स्टडी के बहाने वह हम सबको अहसास दिलाती है कि हाथ-पांव भले ही हमारे बंधे न हों, लेकिन हम सभी किसी न किसी तरह की कैद से आजाद होने के लिए छटपटाते रहते हैं. पुरानी दिल्ली छोड़कर बाहर नहीं निकल पाने की इस फिल्म की टीस एक ऐसी सतत व यूनिवर्सल थीम है जिससे प्रवासी-अप्रवासी सभी तरह के दर्शक तुरंत कनेक्ट करेंगे. आखिर हम सभी कहीं और होना चाहते हैं, लेकिन होते कहीं और हैं.

‘गली गुलियां’ का नायक खुद्दूस (मनोज बाजपेयी) पुरानी दिल्ली का बरसों पुराना बाशिंदा है जो कि ताजिंदगी उस जगह से आजाद नहीं हो पाता. वह सीसीटीवी कैमरे लगाकर पड़ोसियों की जासूसी करता है. यह काम उसका जुनून है, उसका पागलपन है, लेकिन इसे वह करता बिलकुल चुपचाप है बिना किसी को कोई नुकसान पहुंचाए. फिल्म यह नहीं बताती कि ऐसा करने के पीछे खुद्दूस का ‘मोटिव’ क्या है, लेकिन ऐसा दिखाकर उसके लूप में दौड़ते पागलपन को वाजिब अभिव्यक्ति जरूर देती है. पारिवारिक हिंसा के शिकार एक कम उम्र के लड़के (ओम सिंह) की मदद करने का फितूर इस नायक खुद्दूस को नियंत्रण से बाहर कर देता है और फिर जो होता है उसके बारे में बताने पर कई स्पॉइलर दे देने का खतरा होगा, इसलिए रहने देते हैं!

फिल्म में एक बड़ा ट्विस्ट, एक रोचक खुलासा भी है. इसे आप काफी पहले भांप लेंगे अगर चौकन्ना होकर इसे देखेंगे. जिस सहजता से ‘गली गुलियां’ इसे हमारे सामने लाती है वह किसी साइकोलॉजिकल ‘ड्रामा’ फिल्म का ही शऊर रखता है और कैरेक्टर स्टडी के लिए प्रतिबद्ध एक फिल्म को सस्ते थ्रिल के रास्ते पर भटकने भी नहीं देता. फिल्म को देखते वक्त आपको कहीं यह लगेगा भी नहीं कि इसकी मंशा साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्मों की तरह – उदाहरण के लिए ‘सेवन’ (1995) जैसी फिल्में – भौचक करने वाला कोई राज खोलकर मनोरंजन करने की है.

‘गली गुलियां’ की रफ्तार बेहद धीमी है और दो घंटे से कम की होने के बावजूद फिल्म बेहद लंबी मालूम होती है. लेकिन यह पटकथा का आलस्य नहीं है, न ही फिल्म की कमी है. बल्कि खंडहरनुमा घर, तंग गलियां और पीली रोशनी से नहाए अंधेरे की मदद लेकर फिल्म जो क्लॉस्ट्रोफोबिक वातावरण रचती है और उस माहौल में जिस तरह से अपने उदास किरदारों की कहानी कहती है, उसे लगातार देखते रहना आसान नहीं है. एक्टर जिस निर्मम कहानी को परदे पर जी रहे होते हैं वह अपने रियलिस्टिक आवरण की वजह से हमारे लिए बर्दाश्त करना मुश्किल होती जाती है और हम चाहने लगते हैं कि फिल्म जल्दी खत्म हो जाए. इस तरह का अलहदा इम्पेक्ट कम ही हिंदी फिल्में डाल पाती हैं.

‘गली गुलियां’ की एक खासियत यह भी है कि जहां हिंदी फिल्मों में पुरानी दिल्ली को हमेशा ही रोमेंटिसाइज किया जाता है, वहां निर्देशक दीपेश जैन इस फिल्म के माध्यम से उस छवि को सर के बल उलटा कर देते है. केवल ‘दिल्ली 6’ ही याद कीजिए तो याद आएगा कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने कई तरह से पुरानी दिल्ली से मोहब्बत दर्शाने के बाद ऋषि कपूर के पात्र से जौक साहब का वह शेर तक बुलवा लिया था – ‘कौन जाए जौक दिल्ली की गलियां छोड़कर’. आम जीवन में भी पुरानी दिल्ली और चांदनी चौक से जुड़ा यह रोमेंटिसिज्म इस कदर गहरा है कि कचौड़ी की तरह तलकर अति के साधारण पराठे बनाने वाली पराठा गली तक पर कोई आलोचनात्मक राय मिलनी मुश्किल है! लेकिन अपनी फिल्म का परिपक्व निर्देशन करने वाले दीपेश जैन साहब का साहस देखिए, उन्होंने एक मजबूत छवि का विलोम गढ़ते वक्त कला निर्देशन और सिनेमेटोग्राफी की मदद लेकर उसे इस कदर यथार्थवादी बनाया है कि आप उनके कन्विक्शन के मुरीद हो जाते हैं.

फिल्म में साइलेंस का भी बेजोड़ इस्तेमाल है. मनोज बाजपेयी के स्क्रीन पर मौजूद रहते वक्त खामोशी एक अदृश्य किरदार बनकर सदैव उनके साथ उठती-बैठती नजर आती है. आपको शायद याद हो कि कुछ वक्त पहले ‘अ क्वाइट प्लेस’ नामक एक हॉलीवुड हॉरर फिल्म आई थी जिसमें साइलेंस का अद्भुत प्रयोग था. ‘गली गुलियां’ भी बेहद कम संवाद और साइलेंस की अधिकता वाली एक ऐसी फिल्म है जिसमें सन्नाटा सिहरन तक पैदा कर देता है.

और, इसी खामोशी को जिंदा करने की वजह से मनोज बाजपेयी का अभिनय अद्भुत के स्तर का होता है! अलीगढ़’ में उऩके जिस स्तर के खामोश अभिनय के दर्शन हुए थे, यहां वह और भी फैलाव के साथ मौजूद है और मार्मिकता की जगह ऐसा पागलपन तारी है जिससे आपको नफरत नहीं, हमदर्दी होती है.

हरदम शारीरिक व मानसिक रूप से बीमार नजर आने से लेकर जब तब बड़बड़ाने तक, हाथ के घाव को सिलते वक्त बिना कोई सिसकी लिए चेहरे पर दर्द दर्ज करते वक्त, और एक डॉक्टर के यहां इलाज के लिए पहुंचकर पारिवारिक हिंसा के शिकार बच्चों पर मोनोलॉग देते वक्त मनोज बाजपेयी बारंबार अभिनय का शिखर छूते हैं. शूटिंग के 25-30 दिन उन्होंने ऐसे ही बीमार नायक के किरदार में रहकर बिताए होंगे, सोचकर ही कंपकंपी छूट जाती है.

महान अभिनय उतनी ही महान कुर्बानी भी मांगता है, ‘गली गुलियां’ में मनोज बाजपेयी को देखकर समझ आता है.

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