नैनीताल की हरी-भरी खूबसूरती और बढ़िया संगीत ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ की कई खामियों को ढक लेती हैं, लेकिन मकसद की बत्ती तो गुल है

निर्देशक : श्री नारायण सिंह
लेखक : सिद्धार्थ सिंह-गरिमा वहल (पटकथा), विपुल के रावल (कहानी)
कलाकार : शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, दिव्येंदु शर्मा, यामी गौतम
रेटिंग : 2.5/5

मुम्बई, N.I.T. : ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ का पहला दृश्य यात्रियों से भरी एक बस दिखाता है जिसमें दो पुलिस वाले जांच के लिए चढ़ते हैं. एक सवारी से उसका नाम पूछ जाता है तो जवाब मिलता है ‘विकास’ बहुगुणा. इसी सीन की अगली झलक में सवारियों में से एक ‘कल्याण’ भाई को गलत जगह का टिकट लेने पर झिड़क खाते दिखाया जाता है. इस तरह आपको पता चलता है कि ‘विकास’ और ‘कल्याण’ एक ही बस पर सवार हैं और स्क्रीन पर यह बस आपकी तरफ आती दिखती है. श्री नारायण सिंह ने ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ की कहानी इन्हीं दो किरदारों की जुबानी आपको बताई है. स्वच्छता के मुद्दे को उठाने वाली सफल ‘टॉयलेट – एक प्रेम कथा’ के बाद उन्होंने बिजली के भारी-भरकम बिल आने की समस्या ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ के जरिए परदे पर दिखाने की कोशिश की है.

सिद्धांत सिंह और गरिमा वहल द्वारा लिखी गई ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ की पटकथा विपुल रावल की एक कहानी पर आधारित है. विपुल रावल के परिचय के लिए जान लें कि फिल्म ‘रुस्तम’ की कहानी, पटकथा और संवाद, सबकुछ इन्होंने ही लिखा था. उत्तराखंड के टिहरी को बैकग्राउंड में रखकर बनाई गई यह कहानी बचपन के तीन दोस्तों सुंदर, सुशील और ललिता की है. इनमें से पहला अपना बिजनेस जमाने का सपना देखने वाला आम आदमी है, दूसरा अपनी वकालत की डिग्री और लाइसेंस के नाम पर लोगों को ब्लैकमेल कर उनसे वसूली करता है और तीसरी शहर की लोकल फैशन डिजायनर हैं. इन तीनों की गैरपरंरागत-त्रिकोणीय-प्रेमकथा दिखाने के बाद, फिल्म सुंदर को बिजली कंपनी की मनमानी का शिकार बताती है और बाकी दो को उसके लिए न्याय की लड़ाई लड़ते दिखाती है.

फिल्म का पहला हिस्सा जहां तीनों की दोस्ती, प्यार और तकरार को समर्पित है, वहीं दूसरे हिस्से की यूएसपी कोर्ट रूम ड्रामा है. ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ की एक बुरी बात ये है कि मतलब की बात हल्के-फुल्के तरीके से कहने की कोशिश में यह कुछ शॉर्टकट्स अपनाती है और अपना जरूरी वजन भी खो बैठती है. खासतौर पर तब जब कोर्ट में शाहिद कपूर यामी गौतम पर लगातार सेक्सिस्ट टिप्पणियां करते हैं. इसके बाद जो चीज आपको सबसे ज्यादा खटकती है, वो है गढ़वाली बोली को कुछेक शब्दों जैसे बल, ठहरा, लाटा जैसे शब्दों में ही समेट देना. बल और ठहरा तो फिल्म में इतनी बार इस्तेमाल किया गया है कि शुरुआती दस मिनट में ही आप इससे इरीटेट हो जाते हैं. इसके बावजूद ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ टिहरी और वहां के माहौल को परदे पर उतारने में सफल कही जा सकती है.

फिल्म के दोनों ही हिस्सों में शाहिद कपूर ज्यादातर वक्त स्क्रीन पर नजर आते हैं. काम उन्होंने बहुत प्रभावित करने वाला नहीं किया है, फिर भी टुच्चे वकील के टुच्चेपन को और बाद में सच्चे दोस्त को जरूरी सच्चाई देने में काबिल साबित होते हैं. अभिनय में अभी-भी पक्की नहीं हो पाईं श्रद्धा कपूर से आपको इस फिल्म में कोई शिकायत नहीं होती क्योंकि यहां वे कुछ भी ओवर नहीं करतीं और यही बात उनके पक्ष में जाती है. दिव्येंदु शर्मा के साथ अच्छा यह हुआ है कि वे इस बार सिर्फ हीरो के दोस्त वाली भूमिका में सीमित नहीं रह गए हैं. खुद को आरके लक्ष्मण का आम आदमी बताने वाला उनका किरदार, उनके अभिनय से सही साबित होता है. शाहिद के अलावा दिव्येंदु भी जब परदे पर होते हैं, आपका ध्यान उन्हीं पर होता है. यामी गौतम इस मसाला फिल्म को दिया गया तड़का हैं, जो इस गड़बड़ हुई रेसिपी का स्वाद संभालने का काम ठीक-ठाक कर जाती हैं.

श्री नारायण सिंह की बत्ती गुल मीटर चालू एक घोर मसाला फिल्म है जो थोड़ी सी ही सही, लेकिन आपके मतलब की बात भी करती है. टिहरी और नैनीताल की हरे रंग के अलग-अलग शेड्स वाली लोकेशन और बढ़िया संगीत, फिल्म देखने के एक्सपीरियंस को बढ़िया बनाता है और इसकी खामियों के जरा ढक लेता है. यह कहना जरूरी है कि कुछ ट्विस्ट्स जरा ठीक से प्लेस होते, संवाद की भाषा साधने के लिए जरा और रिसर्च की गई होती और मनोरंजन का मकसद के साथ संतुलन ठीक-ठीक सध जाता तो यह एक कमाल फिल्म हो सकती थी. फिलहाल यह एक औसत मनोरंजक फिल्म है, और औसत होना भी कोई बुरी बात नहीं है.

…और हां, विकास और कल्याण जिस बस से आ रहे थे, क्लाइमैक्स से ठीक पहले उसका एक्सीडेंट हो गया है. वे आप तक पहुंचेंगे या नहीं, यह तो आने वाला वक्त बताएगा और इस वक्त को बिताने के लिए आप चाहें तो ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ देख सकते हैं.

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