‘जल, जंगल जमीन की लूट कॉर्पोरेट को किसी भी हालत में नहीं करने देंगे’

  • जल, जंगल जमीन की लूट कॉर्पोरेट को किसी भी हालत में नहीं करने देंगे’
  • जन निगरानी अभियान का आठवाँ दिन: आदिवासियों नेमांगा वन अधिकार, अपने जंगल-ज़मीन का हक़ 
  • कानून तो बना पर जमीन का पट्टा नहीं, पेसा, वन अधिकारकानून का क्रियांवन हो

फ़िरोज़ खान, राजस्थान (जयपुर) N.I.T. :सूचना व रोजगार का अधिकार अभियान एवं प्रदेश के विभिन्न जनसंगठनों कीओर से शहीद स्मारक पर दिये जा रहे जन निगरानी अभियान धरने के आजआठवें दिन आदिवासियों के मुद्दों पर बात हुई। धरने में सोमवार को राजस्थानके विभिन्न जिलों से २०० से ज़्यादा आदिवासी समाज के ११ संगठनों ने शहीदस्मारक पर अपने जल, जंगल, ज़मीन के हक़ और अधिकार माँगे।

झाड़ोल से आयी एक आदिवासी महिला देवली बाई ने सरकार से सवाल कियाकि, अगर जयपुर शहर में अगर सोना मिल जाए तो क्या जयपुर की जनता कोहटाकर सरकार सोना खोदने लग जाएगी? सभी आदिवासियों ने कहा किसरकार कहती है सागवान उगाओ लेकिन पेट तो अनाज से भरता है। सरकारें हमारे हज़ारों एकड़ के जंगल काटकर सड़क और रेल बनादी। लेकिन जिनगाँव को भू-सुधार क़ानून के द्वारा उजाड़ा गया वे गांव आज भी बहुत बुरीहालत में हैं।

राज्यभर से आए आदिवासियों ने कहा कि, वन अधिकार कानून को पास हुए10 वर्ष से अधिक समय होने के बाद भी लोग लोग अपनी फाइल लेकर वनअधिकार समिति से लेकर उपखंड स्तरीय समितियों के यहां लेकर चक्कर लगारहे हैं लेकिन हमें हमारी उस जमीन का ही पट्टा नहीं मिल रहा है जिस परहमारी कितनी ही पीढियां रहती आ रही हैं।

आज धरने में राजस्थान आदिवासी अधिकार मंच, आदिवासी विकास मंच, आदिवासी महिला जागृति संगठन, वागड़ मज़दूर किसान संगठन, डूब किसानसंघर्ष समिति , गोडवाड़ आदिवासी संगठन, उपरमाल संगठन, जागृत महिलासंगठन और बरड़ संगठन के २०० से ज़्यादा आदिवासी शामिल हुए।

सोमवार को आदिवासी समुदाय ने निम्न प्रस्ताव पारित किये :

जमीन

राजस्व (बिलानाम) भूमि जिस पर आदिवासी किसान वर्षों से खेतीकर रहे हैं,उनके आवंटन पर सरकार द्वारा अघोषित रोक हटाई जाएएवं राजस्व भूमि पर भूमि आवंटन एवं नियमन का कार्य किया जाएआदिवासी क्षेत्र में गैर कानूनी भू-हस्तांतरण पर रोक लगाई जाए तथाबेनामी या किस्म परिवर्तन करवा कर आदिवासियों से छीनी जमीनेंवापस दिलाई जाये। इसके लिए स्वतंत्र आयोग का गठन किया जाए।आदिवासी क्षेत्र में जो अन्सेटल्ड भूमि है, उनके सैटलमेंट का कार्यकिया जाए एवं वर्षों से जो आदिवासी किसाने खेती कर रहे हैं, उन्हेंकानूनी रूप से हक अधिकार प्रदान किए जाएं। दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा (डीएमआईसी) जैसी पर्यावरणऔर मानव विरोधी योजनाओं को रद्द कर कृषि भूमि को सुरक्षित किया जाए।

खनन

खदानों में जहां भूमि अवाप्त की जाए उसमें विस्थापित होने वालेलोगों को मुनाफे में कम से कम 20% भाग निर्धारित हो एवंविस्थापित परिवार को कम से कम एक व्यक्ति को रोजगार मिले। अनुसूचित क्षेत्र में गैर आदिवासियों को खनन पट्टे देने पर सख्ती सेरोक लगाई जाए एवं पट्टे केवल आदिवासियों के नाम ही दिए जाएं।

वन भूमि

वन अधिकार मान्यता कानून के तहत सामुदायिक वन अधिकारों कोधारा 3 (1) के तहत् मान्यता प्रदान करते हुए सामुदायिक वनअधिकार देने की प्रक्रिया को तुरंत प्रारम्भ किया जाए।वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के तहत भारी संख्या में निरस्तकिये गये दावों की पुर्नजांच कर दावों का निस्तारण किया जाये।अभी तक विभिन्न विशेष अभियानों (प्रशासन गांवों के संघ, सरकारआपके द्वार) के माध्यम व वन अधिकार समितियों द्वारा ग्रामसभा, उपखण्ड स्तरीय समिति को जमा करवाये गये दावों को विधिवत रुपसे रिकार्ड में लिया जाये।वन्यजीव अभ्यारण्य में काबिज दावेदारों के दावे स्वीकार नहीं कियेजा रहे हैं उनके दावे तुरन्त स्वीकार कर निस्तारण की प्रक्रिया कीजाये।वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के तहत जिन कास्तकारों कोउनके कब्जे की भूमि से कम भूमि का अधिकार पत्र जारी हुआ। उन्हेंशेष भूमि का पत्र जारी किया जाये।

आदिवासी स्वशासन

5वीं अनुसूची में आने वाले सभी गांव में पेसा कानून के तहत्त्रैामासिक गांवसभा के सुनिश्चित आयोजन के लिये ब्लॉकवार बैठकका कलेण्डर जारी कर उसकी पालना सुनिश्चित की जाये।पेसा क्षेत्र में वार्ड समाप्त कर गांव की गांवसभा को मान्यता दी जाये।अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासियों की जनसंख्या 73 प्रतिशत होने केबावजूद भी उनके लिये 45 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई हैं, जबकिशेष 27 प्रतिशत आबादी के लिये 55 प्रतिशत सीटे जोड़ दी गई हैंदुर्भाग्य पूर्ण स्थिति हैं उसे तुरंत बदला जाए तथा जनसंख्या केअनुपात में आरक्षण दिया जाए।पेसा कानून की प्रभावी क्रियान्वयन और मॉनीटरिंग के लियेएम.आई.एस. सिस्टम बनाकर उसका क्रियान्वयन प्रारम्भ कियाजाये।आदिवासी क्षेत्रों में कैम्पा और डी.एम.एफ.टी. फण्ड की आयोजनाऔर उसका उपयोग पेसा कानून के अनुरुप गांवसभा के माध्यम सेहो।

खेती किसानी

आदिवासी किसानों को एक बार अपने सारे बकाया कर्ज से मुक्ति मिले चाहे वोराष्ट्रीयकृत बैंक से हो या ग्रामीण एवं सहकारी बैंक से या साहुकार से एवंकिसानों को उसकी फसल की लागत का डेढ़ गुना दाम मिले।

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