इतिहास के पन्नों में कुंभ का महत्व को बदलने की कोसिस, धर्मराज्य-रामराज्य पर राजनीति

लखनऊ, N.I.T. : लगता है उत्तर प्रदेश में रामराज्य आ ही गया है. सत्ता के शीर्ष पर संत-महंत विराजमान हैं, रामराज्य में भी ऐसा ही होता होगा. धर्मराज्य है, रामराज्य में भी ऐसा ही होता होगा. रामराज्य है इसलिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अयोध्या विवाद के लिए सुप्रीम कोर्ट को सलाह देते हुए कह सकते हैं कि ‘यदि सुप्रीम कोर्ट सबरीमला मामले में फैसला सुना सकता है तो उसे राम मंदिर मामले में भी आदेश सुनाना चाहिए. मैं कोर्ट से यह करने का अनुरोध कर रहा हूं.’ अयोध्या में मुख्यमंत्री स्वयं राम का स्वागत करके दीपावली मनाने लगे हैं. रामराज्य में भी ऐसा ही होता था.

लेकिन यह रामराज्य महात्मा गांधी का रामराज्य नहीं है. यह तो योगी सरकार का रामराज्य है. यह रामराज्य महात्मा गांधी के आदर्श राज्य जैसा रामराज्य नहीं है. यह रामराज्य तो ऐसा राज्य है जिसमें धार्मिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बोलबाला दिखता है और इसमें नागरिक अधिकार भी धर्म के अनुसार तय होते नजर आते हैं. इस रामराज्य में गाय धर्म की प्रतीक रह जाती है और पशुधन के बजाय अनबन की वजह बनने लगती है. यह योगी का रामराज्य है. इसलिए इस रामराज्य में मुगलसराय, दीनदयाल उपाध्याय नगर हो जाता है और इलाहाबाद प्रयागराज. इसीलिए इस रामराज्य के मंत्री सगर्व घोषणा करते हैं कि आत्मगौरव की स्थापना के लिए यदि जरूरी हुआ तो और भी नाम बदले जाएंगे. यह रामराज्य भारत के इतिहास की लगभग एक हजार साल की इबारतों को मिटाने के बाद धर्मध्वजा को पुर्नस्थापित करने वाला राज्य है.

रामराज्य की यह अवधारणा इतनी उत्साह भरी है कि यह धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का नवीनीकरण और उनकी पुर्नस्थापना के लिए भी फैसले करने से पहले किसी तरह का संकोच नहीं करती. अनेक बार तो यह अटल बिहारी वाजपेयी के ‘राज धर्म’ से भी परे पहुंच जाती है. इसलिए इस रामराज्य में अयोध्या के दीपोत्सव के लिए साढ़े तीन लाख दिए जलाने के लिए नौ हजार लीटर सरसों का तेल निःसंकोच जलाया जा सकता है, सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपराओं को जैसे चाहे बदला जा सकता है और इसीलिए इलाहाबाद में हर छह वर्ष में होने वाला आयोजन भी अब अर्धकुंभ नहीं बल्कि ‘कुंभ’ बना दिया जाएगा. यानी 12 वर्ष के बजाय हर छह वर्ष में एक कुंभ.

भारतीय परंपरा में कुंभ का महत्व इतिहास के पन्नों में बहुत पीछे तक जाता है. राजा हर्षवर्धन के जमाने से कुंभ आयोजन के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं. कुंभ के महत्व को लेकर देश में दो अलग-अलग मान्यताएं हैं. एक ज्योतिष शास्त्र की और दूसरी पौराणिक. ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार ग्रह-नक्षत्रों की गति के हिसाब से गुरु के एक राशि में बारह वर्ष बाद पुर्नप्रवेश के कारण हर 12 वर्ष बाद कुंभ का आयोजन होता है. इसी मान्यता के अनुसार हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन व नासिक में बारी-बारी से हर तीन वर्ष बाद कुंभ आयोजन होता है.

पौराणिक मान्यताएं कुंभ को समुद्र मंथन से जोड़ती हैं. इनके अनुसार देवासुर संग्राम में अमृत को असुरों से बचाने के लिए देवताओं ने 12 दिन तक पृथ्वी की परिक्रमा की और इस दौरान चार स्थानों में गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा नदियों में अमृत कुंभ (कलश) से अमृत की बूंदें छलक पड़ीं. चूंकि देवताओं का एक दिन मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर माना जाता है. इसलिए हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन व नासिक में बारह-बारह वर्ष बाद कुंभ का आयोजन होता है. दोनों मान्यताएं हरिद्वार और प्रयाग में हर छह वर्ष बाद अर्धकुंभ के आयोजन की बात भी कहती हैं. यानी यानी एक कुंभ के बाद छह वर्ष बाद अर्धकुंभ और फिर अगले छह वर्ष बाद पुनः कुंभ.

इलाहाबाद में पिछला कुंभ 2013 में हुआ था और अगला कुंभ 2025 में होना है. लेकिन चूंकि उत्तर प्रदेश में रामराज्य है, इसलिए योगी सरकार ने 2019 में होने वाले अर्धकुंभ को 12 वर्ष बाद होने वाला ‘कुंभ’ घोषित कर दिया है. सब जानते हैं कि अगले वर्ष जनवरी-फरवरी-मार्च में देश में लोकसभा चुनावों की अनुगूंज सुनाई देने लगेगी इसलिए अगर कुंभ नहाकर कुर्सी बच सकती है तो इसमें क्यों चूका जाए. इसलिए सरकार ने अर्ध कुंभ का नाम बदलकर उसे कुंभ का नाम दे दिया है. वैसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कुंभ के महत्व को बहुत उदारतापूर्वक रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘कुंभ भारत की परम्पराओं में बहुत ही सात्विक और सांस्कृतिक शब्द है, जो हमें एकता के सूत्र में बांधता है.’ लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मानते हैं कि इस आयोजन से यूपी की ब्रांडिंग होगी और भाजपा के नेता तो यह स्वीकारने में नहीं हिचकते कि इससे भाजपा को बड़ा लाभ होने वाला है.

इसीलिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अर्धकुंभ के नामान्तरण पर हमला करते हुए ट्वीट करते हैं, ‘राजा हर्षवर्धन ने अपने दान से प्रयाग कुंभ का नाम किया था और आज के शासक केवल ‘प्रयागराज’ नाम बदलकर अपना काम दिखाना चाहते हैं. इन्होंने तो अर्ध कुंभ का भी नाम बदलकर कुंभ कर दिया है. ये परम्परा और आस्था के साथ खिलवाड़ है.’

लेकिन धर्म और परम्पराओं का ठेका तो सरकार के पास ही है इसलिए कोई बोल भी क्या सकता है. अर्धकुंभ के नामान्तरण को लेकर प्रारम्भ में अनेक अखाड़ों और साधु-संतों ने भी विरोध जताया था, लेकिन सरकार ने उनके विरोध को भी शांत करवा दिया. योगी सरकार अपने राज में येन केन प्रकारेण कुंभ नहा लेने का पुण्य प्राप्त कर लेना चाहती है क्योंकि अगर परम्पराओं पर अटके रहे तो अगला असल कुंभ तो प्रयाग में 2025 में ही होना है. पता नहीं तब तक सत्ता और राजसी ठाट बाट रहें या न रहें. इसलिए देश में पापों के बोझ से दबी जनता के लिए सहज, सटीक और समसामयिक नुस्खा है कि अब जनता के लिए उत्तर प्रदेश में हर 6-6 साल में कुंभ आयोजन हुआ करेगा.

राज्य सरकार इस कुंभ के लिए 3000 करोड़ से ज्यादा खर्च करने जा रही है. 300 करोड़ की लागत से एक कुंभ म्यूजियम भी बनाया जाएगा. योगी सरकार पहली बार इस कथित कुंभ के लिए हर गांव को न्यौता भेजेगी. सभी मुख्यमंत्रियों को योगी जी स्वयं न्यौतेंगे. सरकार इस बात को भी प्रचारित करने में कसर नहीं छोड़ रही कि दक्षिण कोरिया में दिसंबर, 2017 में यूनेस्को के अधीन कल्चरल हैरिटेज की इंटर गर्वमेंटल कमेटी ने एक बैठक कर कुंभ को मानवता की अमूर्त धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल कर लिया है. इसलिए अब की अर्धकुंभ ‘कुंभ’ का चोला पहन कर पूरी भव्यता से आयोजित होगा. सरकार की ओर से आयोजित होगा.

कुंभ नहाने के उत्साह में सरकार हर छोटे-बड़े आयोजन को कुंभ में बदलने लगी है. 26 से 28 अक्टूबर तक लखनऊ में किसानों के लिए हुए एक बड़े आयोजन को भी अधिकृत रूप से ‘कृषि कुंभ’ कहा गया. इसी तरह 23 दिसंबर को लखनऊ में युवाओं का एक बड़ा आयोजन हो रहा है जिसे ‘युवा कुंभ’ नाम दिया गया है. इसमें समाज के आठ अलग-अलग वर्गों के 20 से 45 वर्ष आयु के लोग बुलाए जायेंगे. इस आयोजन के मुख्य आइकाॅन श्री कृष्ण होंगे और उनका कथन ‘‘सत्यम वंद, धर्म चरं’’ इस आयोजन का सूत्र वाक्य होगा. आयोजन के अन्य आइकाॅन अष्टावक्र, नचिकेता, रामानुजम और विवेकानन्द से लेकर ध्यान चन्द और हीमादास तक होंगे.

यानी लोकसभा चुनाव की बेला में उत्तर प्रदेश में वाकई धर्मराज्य यानी रामराज्य को अवतरित होते देखा जा सकता है. इस रामराज्य में राम के आदर्शों का पालन हो या नहीं मगर राम के नाम की लूट जरूर हो रही है. इसमें तमाम साधु-संत, धर्म के ठेकेदार और राजनीतिक दल अपने अपने तरीके से हिस्सेदारी करते और अपने-अपने हिस्से का माल बटोरते दिखते हैं.

(सूत्र)

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