2.0 : सुपरस्टार रजनीकांत भगवान सरीखे हैं तो कृपया इस तरह की समीक्षा से दूर रहिए

नई दिल्ली, N.I.T. : 

निर्देशक : शंकर

लेखक : शंकर, अब्बास टायरवाला (हिंदी संवाद)

कलाकार : सुपरस्टार रजनीकांत, अक्षय कुमार, ऐमी जैक्सन, सुधांशु पंडित, आदिल हुसैन

रेटिंग : 3.5 / 5

बेहद कल्पनाशील निर्देशक शंकर अतिरेक के फिल्मकार हैं. उन्होंने ‘इंडियन’ (1996) और ‘नायक’ (2001) जैसी मजबूत विषय आधारित फिल्में भी बनाई हैं लेकिन वो बहुत पीछे छूट गए वक्त की बात है. उनके समकालीन राजामौली भी अतिरेक में डूबी फिल्में बनाना पसंद करते हैं लेकिन उनकी फिल्मों में अतिरेक एक दिलचस्प कहानी को कहने के लिए उपयोग होता है. फिर चाहे एक मक्खी के बदला लेने की कहानी कहने वाली ‘मक्खी’(2012) हो, पूर्वजन्म जैसे सबसे पुराने फिल्मी फॉर्मूले में बंधी मनोरंजक पीरियड फिल्म ‘मगधीरा’ (2009) हो, या फिर राजा-महाराजाओं के आपसी युद्ध और भितरघात की कहानी कहने वाली बाहुबली सीरीज की दोनों फिल्में हों.

वहीं, शंकर कहानी-पटकथा के उत्तम होने पर ध्यान न देकर अतिरेक का महोत्सव खड़ा करने में यकीन ज्यादा रखते हैं. इसलिए वे महंगे वीएफएक्स आधारित दुर्लभ दृश्यावली रचने के बावजूद राजामौली के स्तर के फिल्मकार नहीं कहे जा सकते. हाल-फिलहाल की फिल्मों के हिसाब से तो कतई नहीं. फिर चाहे ‘रोबोट’ (2010) की बात हो या फिर विक्रम अभिनीत ‘आई’ (2015) की. इन दोनों ही फिल्मों के भौचक्क करने वाले विजुअल्स जहां आपको बांधे रखते हैं, वहीं लचर कहानी और पटकथा कुछ दिन बाद ही इन महंगे कल्पनाशील विजुअल्स को स्मृति से बाहर ढकेलने में खुद ही मदद करने आगे आती हैं.

यही कुछ हाल ‘2.0’ का भी है! बिला शक रजनीकांत की यह मसाला फिल्म थकाऊ होने के बावजूद मनोरंजक है और भरे थियेटर में इसे देखने में मजा आता है. ‘रोबोट’ की तरह यह बेवजह तीन घंटे लंबी नहीं है और केवल ढाई घंटे में बिना किसी कॉमिक या प्यार-मोहब्बत वाले सब-प्लॉट के ‘टू द पॉइंट’ अपनी कहानी कहती है. हीरो आता है, विलेन लंबा वक्त लेकर स्थापित किया जाता है, फिर अपनी बैक-स्टोरी सुनाता है और आखिर में हीरो-विलेन के बीच तगड़ा घमासान होता है. ऐसा, कि सारे के सारे रजनीकांत अंत में मर* जाते हैं.

वहीं, ‘रोबोट’ में एक लंबा वक्त दो रजनीकांत और एक ऐश्वर्या राय के प्रेम-त्रिकोण में खर्च किया गया था और आखिर का एक घंटा ही मुख्य रूप से मनोरंजक था. इस एक घंटे का भी आखिरी आधा घंटा सबसे अधिक मनोरंजक था जिसमें वीएफएक्स और अपनी कल्पनाशीलता की मदद लेकर शंकर ने खूब आनंद दिया था. उसी हिस्से ने ‘रोबोट’ को इतनी लोकप्रियता दिलाई थी कि आज पूरा हिंदुस्तान ‘2.0’ की प्रतीक्षा कर रहा है. अच्छी खबर यह है कि ‘2.0’ में भी ‘रोबोट’ की तर्ज पर लंबा क्लाइमेक्स रचा गया है और यह – हम इस टर्म से बेहद नफरत करते हैं, लेकिन फिर भी – फुल पैसा-वसूल है!

आपने शायद निर्देशक शंकर की यह खासियत नोटिस नहीं की होगी कि वे कई बार अपने मुख्य कलाकार से एक ही फिल्म में कई रोल करवाते हैं! उनकी कई फिल्मों में आप जानबूझकर उपयोग किया गया उनका यह मौलिक हस्ताक्षर मौजूद पाएंगे. ‘इंडियन’ में दो कमल हासन थे. ‘अपरिचित’ (2005) में तीन विक्रम. ‘आई’ में दो. ‘रोबोट’ में तीन रजनीकांत– वैज्ञानिक वसी, चिट्टीव चिट्टी टू पॉइंट ओ. इस बार ‘2.0’ में तो इतने सारे रजनीकांत हैं कि आप कल्पना ही नहीं कर पाएंगे! इसलिए ‘रोबोट’ के अंतिम हिस्से की तरह ‘2.0’ का भी अंतिम हिस्सा ही इसकी ताकत है और इसी को 3डी में देखने का थोड़ा-बहुत लुत्फ है.

दिक्कत यह है कि अगर आप 600 करोड़ खर्च कर रचे गए अतिरेक, शंकर की अजब-गजब कल्पनाशीलता और भगवान का दर्जा रखने वाले रजनीकांत के होने की वजह से भावनाओं में बहने वाले दर्शक नहीं हैं, तो आपको ‘2.0’ की कमियां बोल्ड में नजर आएंगी. एक यह कि शंकर की अजब-गजब कल्पनाशीलता के बावजूद यह फिल्म कई सारी हॉलीवुड फिल्मों से प्रभावित है. कई सारे रेफरेंस आप खुद समझ लेंगे और एक हम बता देते हैं कि एक पात्र फिल्म में ऐसा है जिसको कि सीधे मार्वल यूनिवर्स के एक सुपरहीरो सा बना दिया गया है. उसकी विशेषता (सुपरपॉवर) तक ले लेने के अलावा उसके सूट का लाल रंग तक नकल कर लिया गया है!

वहीं, स्टेडियम में लड़ा जाने वाला एक प्रमुख फाइट-सीक्वेंस जिसमें कि चिट्टी 2.0 और अक्षय कुमार का किरदार विशाल रूप अख्तियार कर लेते हैं (ट्रेलर में दिखाया जा चुका है इसलिए यह स्पॉइलर नहीं है!), प्रभावी बन पड़ने के बावजूद ऐसा कुछ नहीं है जो आपने पहले न देखा हो. ट्रांसफॉर्मर्स सीरीज की फिल्मों से लेकर ‘पेसिफिक रिम’ (2013) फिल्म तक में हम विशाल रोबोटों को आपस में लड़ता पहले कई बार देख चुके हैं और कई-कई गुना बेहतर अंदाज में. इसलिए यह अलग से रेखांकित किया गया वीएफएक्स हैवी फाइट-सीक्वेंस उतना भी असरदार नहीं सिद्ध होता जितना कि निर्माता-निर्देशक द्वारा दावा किया जा रहा था.

फिल्म की एक दूसरी कमी इसका 3डी में होना है. ‘2.0’ को 2डी से 3डी में कन्वर्ट नहीं किया गया है जैसा कि कई फिल्में आजकल करने लगी हैं और जिनका कि परिणाम बेहतर नहीं निकलता है. यह फिल्म ज्यादा लागत लगाकर शुद्ध रूप से 3डी में शूट हुई है और इसे फिल्म की विशेषता बताकर बेचा भी गया है. लेकिन 3डी में फिल्म देखते वक्त आपको वो मजा नहीं आता जो कभी ‘अवतार’ (2009) को 3डी में देखते वक्त या हाल-फिलहाल में ‘द जंगल बुक’(2016) व ‘डॉक्टर स्ट्रेंज’ (2016) को देखने में आया था.

चश्मे के अंदर से देखने पर परदा डार्क न नजर आकर साफ जरूर नजर आता है, लेकिन दृश्यों में ऐसा कुछ है नहीं कि 3डी होने से वो आपको रोमांचित कर सकें. बस ये है कि अगर किसी बाइक का पीछे से शॉट लिया जा रहा है तो उसका साइलेंसर आपके मुंह के पास आ जाएगा, कोई कुत्ता भौंक रहा है तो लगेगा कि आपके मुंह के पास आकर भौंक रहा है, और ज्यादा से ज्यादा ये होगा कि एक फाइट-सीक्वेंस में चली गोलियों में से एक-दो आपको लग जाएंगीं! बस! अब इतने से के लिए 2डी की तुलना में 50-100 रुपए ज्यादा खर्च करना चाहें तो आपकी मर्जी.

‘2.0’ में एक बुजुर्ग पात्र भी है जो कि एक जरूरी चीज पर लंबी-चौड़ी प्रवचन-नुमा कहानी सुनाता है. फिल्म बहुत लंबे समय तक उस विषय पर टिकी रहती है क्योंकि यह आगे चलकर उसकी मुख्य धुरी बनने वाला है. इस हिस्से में बुजुर्ग पात्र के बेहद साधारण अभिनय को देखकर आपको शंकर की ही ‘इंडियन’ याद आती है जिसमें कमल हासन ने बुजुर्ग सेनापति बनकर अभूतपूर्व अभिनय किया था. कहते हैं कि शंकर उन शुरुआती भारतीय फिल्मकारों में से एक हैं जिन्होंने प्रोस्थेटिक्स का सुघड़ उपयोग फिल्मों में करना शुरू किया. ‘2.0’ में भी प्रोस्थेटिक्स की भरमार है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इन बुजुर्ग महाशय ने केवल नकली सफेद दाढ़ी से बुढ़ापा दिखाने की कोशिश की है और थोड़ा झुककर चलने व बूढ़ी आवाज में बात करने को बुजुर्ग किरदार बनना समझा है. इसमें वे घोर असफल रहे हैं.

फिल्म का आखिरी हिस्सा भी थोड़ा असंवेदनशील है. जिस अच्छी चीज की वकालत यह बुजुर्ग पात्र करता है उसी का उपयोग सारे नायक खलनायक को ब्लैकमेल करने में करते हैं और फिल्म की पटकथा यहां बहुत बुरी तरह काई पर फिसलती है. सही-गलत के बीच फिल्म नायकत्व को विशाल आकार देने के चक्कर में गलत की तरफ झुकती हुई मालूम होती है. आपको भी शायद इसका अहसास फिल्म देखकरहोगा.

अक्षय कुमार ‘2.0’ में पक्षीराज बने हैं जो कि सेलफोन टॉवर की वजह से मरने वाले पक्षियों के प्रति दुनिया का असंवेदनशील रवैया देखकर सुपरविलेन बन जाते हैं. वीएफएक्स के माध्यम से जो पक्षी उनका साथ देने के लिए रचा जाता है वो अभूतपूर्व है और उसके विजुअल्स बिलकुल हॉलीवुड स्तर के हैं. अक्षय जब पंखों वाले बर्ड-मैन बनते हैं तब भी उनका प्रोस्थेटिक कमाल का है और मेकअप आर्टिस्टों की मेहनत देखने लायक होती है. हालांकि उनका सीधा-सीधा काम कम है, लेकिन इस गेटअप में रजनीकांत के साथ वाला उनका बीच बाजार घटित हुआ सीक्वेंस बवाल है.

रजनीकांत फिर रजनीकांत हैं, और चूंकि इस फिल्म में कई रजनीकांत हैं इसलिए वे थोड़ा-थोड़ा अंतर पैदा कर सभी में मुख्तलिफ अभिनय करते हैं. सबसे बेहतर 2.0 और उससे आगे वाले रूप में करते हैं और अपनी पुरानी स्टाइल की भी झलकियां इस दौरान देकर टोटल पैसा-वसूल होने की कोशिश करते हैं – वी हेट दिस टर्म! लेकिन उनके अभिनय में कोई ताजगी नहीं है और न ही ‘काला’ की तरह फिल्म का विषय इतनी ग्रेविटी लिए है कि वे प्रभावशाली हो जाएं.

‘2.0’ उसके विजुअल इफेक्ट्स के लिए देखिए. शंकर की कल्पनाशीलता ‘रोबोट’ (2010) में ज्यादा उन्मुक्त और बेहतर थी, लेकिन आठ साल बाद की तकनीकों ने ‘2.0’ को विजुअल ट्रीट तो बना ही दिया है. टाइमपास ही सही!
(*मजाक कर रहे हैं भाई, मजाक!)

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