World Aids Day 2018 : आज एड्स डे हैं, एड्स से बचकर कैसे बनाये खूबसूरत जिंदगी..?

  • एड्स से कंडोम सस्ता हैं।
  • एड्स असुरक्षित यौन संबंध के अलावा संक्रमित सुई, खून और अजन्मे बच्चे को उसके मां से भी हो सकता है।
  • एक सर्वे के मुताबिक, एड्स के बारे में अभी भी 34 फीसदी लोग बहुत ज्यादा जागरूक नहीं है। 

सलमान खान(गाँधी), नई दिल्ली, N.I.T. : आज ‘विश्व एड्स दिवस’ हैं। “एक्वायर्ड इम्युनो डेफिशियेन्सी सिंड्रोम” (AIDS) के बारे में आप सभी अच्छी तरह से वाकिफ होंगे। हर साल 1 दिंसबर का दिन वर्ल्ड एड्स डे के रूप में मनाया जाता हैं। समाजसेवी संस्थाएं और सरकार समय-समय पर कई तरह के अभियान चलाकर एड्स के प्रति लोगों को जागरूक करती हैं लेकिन इस जानलेवा रोग की खास बात यह हैं कि इसके विषय में कई अभियान चलाने के बावजूद भी लोग इन बातों से अनजान बने रहते हैं इसीलिए हर साल लोगों को जागरूक करने के लिए वर्ल्ड एड्स डे मनाया जाता हैं।

1 दिसंबर यानि विश्व एड्स दिवस। ये दिन इस जानलेवा बीमारी के खिलाफ एकजुट होने का संदेश देता है।  1988 में पहली बार पूरी दुनिया के लोगों ने 1 दिसंबर को इस बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए चुना। और इसलिए हर साल 1 दिसंबर को एड्स के प्रति जागरूक करने के साथ साथ जो लोग इससे जूझ रहे हैं उनमे आत्मविश्वास पैदा करने  की कोशिश की जाती है। ताकि वो इस लड़ाई में खुद को अकेला ना समझे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एड्स का पहला मामला आखिरकार कब सामने आया..? आखिर कब लोगों को इस जानलेवा बीमारी की सुगबुगाहट सुनाई दी थी…ये पहली बार हुआ था 1981 में। जी हां….वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन यानि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इस बीमारी का पहला मामला 1981 में सामने आया था। 2014 में प्रकाशित बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी उत्पत्ति किन्शासा शहर में हुई, जो कि अब डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो की राजधानी है। कहा जाता है कि किन्शासा बुशमीट का बड़ा बाज़ार था और इसलिए संभावना है कि संक्रमित खून के संपर्क में आने से ये बीमारी मनुष्यों तक पहुंच गई और आज विकराल रूप धारण कर चुकी है।

2017 की एक रिपोर्ट

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2017 तक करीब 1.20 लाख  बच्चे और किशोर एचआईवी संक्रमण से पीड़ित हैं। बृहस्पतिवार को जारी यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘चिल्ड्रन, एचआईवी और एड्स: द वर्ल्ड इन 2030’ के मुताबिक पाकिस्तान में 5800, उसके बाद नेपाल में 1600 और बांग्लादेश में (1000 से कम) लोग एचआईवी का शिकार हैं।

यूनिसेफ ने चेताया है कि अगर इसे रोकने की कोशिशें तेज नहीं की गईं तो 2030 तक हर दिन दुनियाभर में एड्स की वजह से 80 किशोरों की मौत सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया ने बच्चों, किशोरों, गर्भवती महिलाओं और माताओं में एचआईवी की रोकथाम के लिए जरूरी प्रयास किए हैं।

इलाज होने पर जी सकता है पूरी जिंदगी युवक

अगर आप भी किसी एचआइवी एड्स पीड़ित के साथ ऐसा भेदभावपूर्ण व्यवहार होते देखें तो एक पल को ठहरें और सोचें अगर आपका कोई बेहद करीब ऐसी बीमारी से ग्रसित होता तो आप क्या करते। एचआइवी-एड्स ऐसी बीमारी नहीं है जो छूने, साथ खाने जैसे सहज मानवीय भावनाओं से फैल जाए। छूने और साथ खाने से प्यार फैलता है एड्स नहीं। एड्स एक ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे इंसान को अंदर से खोखला कर देती है, इसलिए ऐसे मरीजों को दुत्कारें नहीं बल्कि प्यार दें। इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति का उपहास उड़ाने की कोशिश भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह असुरक्षित यौन संबंधों के अलावा यह संक्रमित सुई, खून और अजन्मे बच्चे को उसके मां से भी हो सकता है।

सरकारी अस्पतालों में इलाज तो मुफ्त है, लेकिन देखरेख न के बराबर। ऐसे में मरीज के परिजन प्राइवेट अस्पतालों में लाखों खर्च कर देते हैं। जबकि उन्हें भी पता है कि इस बीमारी के होने का मतलब है निश्चित मौत। इलाज के लिए दर-दर भटकने के अलावा मरीज और उसके परिजनों के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं रह जाता। या फिर चुपचाप मौत का इंतजार करें।

एड्स की चपेट में युवा, कम उम्र में ही बन रहे शिकार
एड्स दुनिया में आज भी किसी महामारी से कम नहीं है। भारत के साथ वैश्विक देशों के लिए भी यह सामजिक त्रासदी और अभिशाप है। लोगों को इस महामारी से बचाने और जागरूक करने के लिए 1 दिसंबर को मनाया जाता है। इस दिवस की पहली बार 1987 में थॉमस नेट्टर और जेम्स डब्ल्यू बन्न ने कल्पना की थी। बहरहाल बताते चलें कि एड्स स्वयं में कोई बीमारी नहीं है, लेकिन इससे पीड़ित व्यक्ति बीमारियों से लड़ने की प्राकृतिक ताकत खो बैठता है। उस दशा में उसके शरीर में सर्दी-जुकाम जैसा संक्रमण भी आसानी से हो जाता है। एचआइवी यानि ह्यूमन इम्यूनो डिफिसिएंसी वायरस से संक्रमण के बाद की स्थिति एड्स है। एचआइवी संक्रमण को एड्स की स्थिति तक पहुंचने में आठ से दस साल या कभी-कभी इससे भी अधिक वक्त लग सकता है।

बीमारी से ज्यादा भेदभाव मार रहा
एड्स से बचाव संभव है, लेकिन एक बार किसी व्यक्ति को यह रोग लग गया तो देर-सबेर उसकी मौत निश्चित है। एड्स की बीमारी धीरे-धीरे इंसान को मौत के आगोश में ले जाती है, लेकिन सामाजिक भेदभाव पीड़ित को तिल-तिल मरने पर मजबूर कर देता है। इसकी सजा पीड़ित के परिवार को भी भुगतनी पड़ती है। इससे बुरी बात क्या होगी कि यह जानते हुए भी कि एड्स संक्रामक बीमारी नहीं है आज भी अस्पतालों, दफ्तरों और स्कूलों से इस बीमारी से ग्रसित मरीज को निकाल बाहर कर दिया जाता है।

एड्स के शुरुआती लक्ष्ण

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  • अधिक समय तक सूखी खांसी आना।
  • ग्रंथियों में सूजन।
  • बार – बार फंगल इंफैक्शन होना।
  • रात को पसीना आना।
  • याददाश्त कम होना।

उपर्युक्त लक्षणों से एड्स का पता चलता हैं। अतः इन लक्षणों को जानने के बाद एड्स से निदान हेतु निम्न सावधानी बरतनी चाहिए

  • अपने साथी से वफादार रहें।
  • अगर बाहर दाढ़ी आदि बनवानी हो तो नाई से कहकर हमेशा नये ब्लेड का प्रयोग ही करवाएं।
  • अस्पताल आदि से सुई आदि लगवाते समय हमेशा नई सिरींज का ही प्रयोग करना चाहिए।
  • एड्स के प्रति सजग होने के लिए हमें एड्स के कारण, लक्षण और बचाव के उपायों से स्वंय को अवगत कराना पड़ेगा।
  • यदि एड्स के प्रति हम जागरूक रहेंगे, तो एचआईवी संक्रमण को काफी हद तक कम किया हैं।
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एड्स से पीड़ित लोगों की साहचर्य प्रदान करने के लिए भोजन, आवास, परिवहन सेवा शुरू की जानी चाहिए। जिससे एड्स दिवस का अभियान एड्स पीड़ित लोगों को प्रोत्साहित कर पाएं। इस प्रकार अनेक क्रियाएँ तथा लोगों को बीमारी के प्रति सजक करके विश्व एड्स दिवस का अभियान पूरा किया जा सकता है और इसे सफल बनाया जा सकता है

ताकि मां से बच्चे में न पहुंचे संक्रमण
एचआइवी पॉजिटिव गर्भवती महिला से शिशु में संक्रमण न फैले, इसके लिए गर्भवती महिला की एआरटी शुरू की जाती है। प्रसव के तुरंत बाद शिशु को नेविरेपिन सीरप .2 एमएल प्रति किलोग्राम वजन के हिसाब से दिया जाता है। एआरटी ले रही गर्भवती महिलाओं के शिशु को 45 दिन तक सीरप दिया जाता है।

इलाज और प्यार, पूरा जीवन जी सकता है बीमार
डॉ. तेजस्वी बताते हैं कि अगर एचआइवी संक्रमण का समय रहते पता चल जाए, सामाजिक सहयोग मिले तथा उचित इलाज हो तो 20 साल का युवा और 50 साल आराम से जी सकता है। अर्थात् एचआइवी संक्रमण में जीवन प्रत्याशा सामान्य रह सकती है। इस दौरान उसकी कार्यक्षमता भी सामान्य रह सकती है। यहां तक कि अगर सही इलाज हो तो संक्रमित मां भी स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है।

 

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