किसानों की नाराजगी बनी BJP की मुसीबत, कांग्रेस ने किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया

सीकर(राजस्थान), N.I.T. : दांता रोड पर मुंडवारा के पास बरगद के एक पेड़ पर लटकता हंसिया-हथौड़े के निशाना वाला लाल झंडा यहां वामपंथी झुकाव की एकमात्र निशानी है. वहीं पास में ही एक चाय की दुकान पर चल रही सियासी बहस स्थानीय राजनीति की थोड़ी बहुत थाह दे रही है. यह बहस दूसरी तमाम बातों और मुद्दों के होते हुए ले-देकर एक ही अहम बिन्दु पर आकर अटकती थी कि क्या सीकर जिले के धोड़ के जाट कॉमरेड पेमा राम या कांग्रेस प्रत्याशी परसाराम मोरडिया को वोट देंगे.

करीब 4000 की आबादी वाला यह गांव दो पूर्व सीपीएम विधायकों का घर रहा है. पेमा राम और अमरा राम, जो कि दांता रामगढ़ से इस बार चुनाव लड़ रहे हैं. 2013 के विधानसभा चुनाव में दोनों तो हार झेलनी पड़ी थी. हालांकि अब उन्हें उम्मीद है कि 2007 में किसानों की आवाज़ बुलंद कर जिस तरह उन्होंने राज्य सरकार को उनकी मांगें मानने पर मजबूर किया था, उसका इस चुनाव में उन्हें फायदा मिलेगा.

राजस्थान जैसे चुनावी राज्य में ग्रामीणों के बढ़ते असंतोष को देखते हुए ही संभवत: केंद्र की बीजेपी सरकार ने बाजरा का न्यूनतम समर्थन मूल्य 525 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ा दिया था. केंद्रीय कैबिनेट की तरफ से बेहद धूमधड़ाके के साथ ऐलान की गई यह चुनावी रेवड़ी मोटे आनाज उगाने वाले इस सूखे प्रदेश के किसानों को अपने पाले में करने की कोशिश का ही एक हिस्सा थी.

केंद्र सरकार ने भले ही बाजरे का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर अब 1950 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है, लेकिन मांग कम होने के कारण उन्हें 30-40 फीसदी कम दाम पर ही अपनी पैदावार बेचनी पड़ रही है.

मुंडवारा के एक किसान कहते हैं, ‘छोटे किसान आज कर्ज पर जी रहे हैं. फसल तैयार हो जाने पर सभी उम्मीद करते हैं कि हम जल्द से जल्द उनका कर्ज चुकता कर देंगे. खेतिहर मजदूर से लेकर दुकानदार तक वे हमसे बार-बार तकादा करते हैं. अगर सरकारी खरीद प्रकिया धीमी और पेचीदा होती है, तो हमें अपना फसल खुले बाजार में ही बेचना पड़ जाता है.’

सीकर में सीपीएम से जुड़ी किसान सभा से के सागर कछारिया कहते हैं, ‘फसल खरीद राज्य और केंद्रीय एजेंसियों की ही जिम्मेदारी है. ऐसा देखा जाता है कि किसान अपनी फसल बेचने के लिए खुले बाजार ही जाना पसंद करते हैं. सरकारी मंडी में आपको रजिस्ट्रेशन कराना होता और फिर आपको अपनी पैदावार लाने की तारीख दी जाती है. अगर किसी कारण आप उस दिन अपनी फसल नहीं ला पाए, तो फिर से सारी प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है.’

राजस्थान के किसानों की मुसीबत खुले घूमते मवेशियों खासकर गायों ने और बढ़ा दी है. अपनी फसल को इन मवेशियों से बचाने के लिए खेत में बाड़ लगाने से उनका खर्च ही बढ़ा है. ऐसे में किसानों की परेशानी भांप कर कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की तरह यहां भी किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया है.पिछले साल सीपीएम और उसकी सभा द्वारा शेखावटी और बीकानेर जिले के कुछ हिस्सों में नाराज़ किसानों का उग्र आंदोलन हुआ था और कांग्रेस यहां किसानों के इस गुस्से में अपनी जीत के ख्वाब हकीकत में तब्दील होती देख रही है.

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