Allahabad University अतीत का गौरव, पढ़े वर्तमान कैसा दिखता है ?

नई दिल्ली, N.I.T. : देश में करीब 200 वर्षों के ब्रिटिश शासन को याद करते हुए हमारे ज्यादातर जनप्रतिनिधि अक्सर ही अंग्रेजों को कोसते हैं. काफी हद तक यह जायज़ भी है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उस दौर में अंग्रेज हुकूमत ने देश की संपत्ति को जमकर लूटा-खसोटा. लेकिन इसके साथ ही कई ऐसे कदम भी उठाए गए जो आजाद भारत की मजबूत बुनियाद बने. औपनिवेशक भारत के अलग-अलग कोनों में शिक्षा की मजबूत इमारत यानी विश्वविद्यालय स्थापित करना ब्रिटिश हुकूमत की ऐसी ही एक बेहद अहम पहल थी. 23 सितंबर, 1887 में खोले गए ‘पूर्व के ऑक्सफोर्ड’ यानी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आकर इस बात को भली-भांति समझा सकता है. इससे पहले 1857 में कलकत्ता, मुंबई और मद्रास विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई थी.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय को आजाद भारत की एक बुनियाद कहना इसलिए जायज दिखता है क्योंकि इसकी इमारतों से कई नामी-गिरामी शख्सियत निकली हैं. इनमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) का सपना देखने वाले पंडित मदन मोहन मालवीय और स्वतंत्रता सेनानी पंडित गोविंद बल्लभ पंत और आचार्य नरेंद्र देव भी शामिल हैं.

साथ ही, इसके पूर्व छात्रों की सूची में पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा और तीन प्रधानमंत्री- गुलजारी लाल नंदा, वीपी सिंह और चंद्रशेखर भी हैं. वहीं, सुप्रीम कोर्ट में भी इसके कई पूर्व छात्र मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. इनके अलावा सूर्य बहादुर थापा नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. ये सभी नाम ‘पूर्व के ऑक्सफोर्ड’ नाम से विख्यात इस विश्वविद्यालय के ध्येय वाक्य ‘Quote Rami Tot Arbores’ (लैटिन भाषा) यानी ‘जितनी शाखाएं उतने अधिक पेड़’ को बल देते हुए दिखते हैं.

इतनी समृद्ध विरासत होने के बाद भी शायद पहली नजर में आपको इसकी झलक विश्वविद्यालय के द्वार पर न दिखे. दरअसल बीएचयू और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की तरह इसका कोई एक मुख्य दरवाजा नहीं है! बताया जाता है कि मेन गेट बनाने का मुद्दा छात्र संघ के चुनावों में भी उठता है, लेकिन चुनावी गरमाहट खत्म होने के साथ ही इसकी मांग भी ठंडे बस्ते में चली जाती है. हालांकि, 1916 में स्थापित केंद्रीय पुस्तकालय के करीब स्थित गेट से परिसर में आगे बढ़ने पर आपको विश्वविद्यालय के गौरवशाली अतीत और इसकी विशालता का आभास मिलता है. वहीं, इस गेट के बायीं ओर विशाल इमारत ‘सीनेट भवन’ है. इसके आगे अपनी बाहें पसारे एक बड़ा सा पार्क दिखता है.

सीनेट भवन के सामने छात्रों के लिए और छात्रों के द्वारा बनाया गया डस्टबिन
सीनेट भवन के सामने छात्रों के लिए और छात्रों के द्वारा बनाया गया डस्टबिन

जब हमने विश्वविद्यालय परिसर में अपने कदम रखे तो उस वक्त घड़ी के घंटे वाली सुई नौ से थोड़ी आगे खिसक चुकी थी. साथ ही, परिसर के अंदर का वातावरण इलाहाबाद शहर की तरह अलसाया हुआ सा दिख रहा था. हालांकि, सर्दियों के इस मौसम में गुनगुनी धूप के साथ पढ़ाई का आनंद लेते हुए इक्के-दुक्के छात्र-छात्रा पार्क में मौजूद थे. इनमें से एक प्रभात मिश्रा से हमारी बातचीत हुई.

वे इलाहाबाद से करीब 100 किलोमीटर दूर सुल्तानपुर के रहने वाले हैं और विज्ञान से स्नातक अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे हैं. प्रभात को छात्रावास में कमरा मिला था लेकिन उस वक्त फीस के लिए पर्याप्त पैसे न होने की वजह से उन्हें यहां प्रवेश नहीं मिल पाया. ‘हॉलेंड हॉल हॉस्टल में कमरा मिला था लेकिन एक बार पैसा जमा करना था और उस वक्त पैसा था नहीं. 14,000 रुपये, एक साल का जमा करना होता है.’ उन्होंने हमें बताया. इसके बाद हमारे यह पूछने पर कि बाहर रहने पर कितने पैसे खर्च होते हैं, प्रभात का कहना था, ‘बाहर 1500 रुपये किराए (कमरे का) का देना होता है. खर्च के लिए 500 रुपये और बाकी का राशन-पानी घर से आ जाता है.’

प्रभात मिश्रा
प्रभात मिश्रा

इसके आगे उन्होंने हमें ऐसी जानकारी दी, जिससे हमें कुछ निराशा तो हुई लेकिन सुबह, दोपहर और शाम तक यह निराशा विश्वविद्यालय परिसर का चक्कर लगाने के दौरान गायब भी हो गई. दरअसल जब हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे थे तो उस वक्त वहां सर्दी की छुट्टियां चल रही थीं, इसलिए कक्षाएं बंद हो चुकी थीं. हालांकि प्रभात से बातचीत दौरान ही परिसर में छात्रों की संख्या बढ़ती हुई दिखी और साथ ही हमारी उम्मीद भी. प्रभात ने ही हमें जानकारी दी कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विश्वविद्यालय के पूर्व और अन्य बाहरी छात्र यहां पढ़ाई करने के लिए आते हैं. इस पर किसी तरह की रोक नहीं है.

इसी पार्क में हमसे कुछ दूरी पर ही दो लड़कियां गाना गाती हुई दिखीं. इनमें से एक दीपिका यादव मुंबई की रहने वाली हैं और यहां एक महीने से प्रतिदिन गाने की प्रैक्टिस करने के लिए आ रही हैं. गाने की प्रैक्टिस के लिए मुंबई जैसी जगह छोड़कर इलाहाबाद! इस प्रतिक्रिया पर दीपिका का कहना था, ‘पेरेंट्स मेरी शादी करवाना चाहते हैं, इसके लिए उनका मानना है कि अपने घर जाकर रिश्तेदारों से मिलना-जुलना जरूरी है. यहां का रहन-सहन सीखने के लिए मुझे इलाहाबाद भेजा गया है.’ दीपिका मूलत: इलाहाबाद की ही रहने वाली हैं और मुंबई में उनके पिता का कारोबार है. इसके आगे उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में आने की कई वजह बताईं. मसलन कि यह काफी शांत जगह है और सबसे बड़ी बात कि यहां लड़के आपके ऊपर कोई छींटाकसी नहीं करते.

दीपिका की तरह शाम तक यहां हमारी कई ऐसे छात्रों से बात हुई जो इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रह चुके हैं या फिर बाहरी हैं. ये सभी शांत वातावरण में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यहां पहुंचते हैं. ‘इलाहाबाद विश्वविद्यालय शिक्षा का गढ़ है. यहां से सबसे अधिक आईएएस-पीसीएस निकलते हैं. इसका सिलेबस ही ऐसा बनाया गया है.’ इस पार्क से आगे बढ़ने पर अर्थशास्त्र विभाग के पास स्थित एक बरामदे में पढ़ाई कर रहे इलाहाबाद के ही रहने वाले दिनेश सरोज ने ये बातें हमसे कहीं.

वे साल 2006 के पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) पासआउट हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. दिनेश की मानें तो इस विश्वविद्यालय में अलग-अलग कोर्सों के लिए सिलेबस ही ऐसा बनाया गया है कि यह प्रशासनिक सेवा के लिए कारखाना बन गया है. दिनेश के सामने वाली डेस्क पर 19 साल के अनुराग पटेल पढ़ाई करते हुए दिखे. वे स्नातक द्वितीय वर्ष के छात्र हैं और आगे प्रशासनिक सेवा में जाने की तैयारी में हैं. अनुराग का भी कहना था कि इस विश्वविद्यालय में कला (आर्ट्स) विभाग के अधिकांश छात्रों का सपना आईएस बनने का ही होता है.

हालांकि, ऐसा नहीं है कि यहां से केवल प्रशासनिक अधिकारी ही अधिक संख्या में निकलते हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गर्भ से कई बड़े नेता भी वक्त-वक्त पर पैदा हुए हैं. वैसे प्रत्येक साल होने वाले छात्र संघ चुनाव की वजह से कुछ दिनों के लिए छात्रों की पढ़ाई पर भी इसका असर पड़ता है. ‘करीब एक हफ्ते की पढ़ाई पूरी तरह बाधित रहती है. उम्मीदवार क्लास में अपना प्रचार करने के लिए पहुंच जाते हैं, इसकी वजह से शिक्षकों को पढ़ाई रोकनी पड़ती है.’ ये शब्द बीएससी के छात्र 19 वर्षीय दीपक पटेल के हैं. हालांकि, वे इससे नाराज नहीं दिखे और उनके मुताबिक ये छात्र नेता जरूरत पड़ने पर सभी की मदद करते हैं.

विश्वविद्यालय में पढ़ाई और इसकी गुणवत्ता के बारे में दीपक ने सत्याग्रह को बताया, ‘अगर प्रोफेसर नहीं होते हैं तो गेस्ट फैकल्टी क्लास लेती है. शिक्षकों की कमी की वजह से कभी क्लास बंद नहीं होती है, लेकिन गेस्ट फैकल्टी की क्वालिटी औसत है.’ इसके साथ ही कुछ प्रोफेसरों को लेकर वे अपनी नाराजगी भी जाहिर करते हैं. दीपक कहते हैं, ‘कुछ विभागों के प्रोफेसर ऐसे हैं जो क्लास नहीं लेते. अपने अंदर रिसर्च करने वाले छात्रों (स्कॉलर) को भेज देते हैं.’ इस तरह की शिकायत प्रभात ने भी हमसे की थी. उनका कहना था, ‘साइंस में पढ़ाई अच्छी है, लेकिन शुरू में दिक्कत हुई थी थोड़ी. यहां पर फर्स्ट ईयर और सेकेंड ईयर वालों को स्कॉलर पढ़ाते हैं, जिसकी वजह से हमारा बेस कमजोर हो जाता है. फिर आगे दिक्कत होती है.’

इन सभी से बातचीत के बाद फिर जब हम विश्वविद्यालय की सड़क पर निकले तो सूरज हमारे माथे के ऊपर आ चुका था. थोड़ी ही दूर आगे बढ़े तो हमारी आंखों के सामने भारतीय गुरुकुल परंपरा की एक छाया सी दिखी. इसके साथ संस्कृत के कुछ शब्द भी कानों में घुले.

अपने छात्रों के साथ डॉ बबलू पाल
अपने छात्रों के साथ डॉ बबलू पाल

हम संस्कृत विभाग के पास थे और यहीं पार्क में अपने छात्रों के साथ हमें डॉ बबलू पाल मिले. बीते दो वर्षों से वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य कर रहे हैं और छुट्टियों में भी प्रतिदिन क्लास लेते हैं. उनकी मानें तो बेरोजगारी के इस दौर में आपने किस विषय की पढ़ाई की, इसके कोई मायने नहीं हैं. साथ ही, पहले डॉ पाल और फिर इसके बाद उनके छात्रों ने हमें संस्कृत की महत्ता और करियर में इसकी अपार संभावनाओं के बारे में जानकारी दी, ‘हिस्ट्री-जियोग्राफी पढ़ने वाले घूम रहे हैं. हिंदी वाले भी और संस्कृत वाले भी घूम रहे हैं. लेकिन, यूपीएससी में आठवीं रैंक तक मिला है, संस्कृत वालों को.’

इस बीच यहां बैठे स्नातक के छात्र अनुराग त्रिपाठी दावा किया, ‘संस्कृत पढ़ने से पिट्यूटेरी ग्रंथि (दिमागी विकास से संबंधित ग्रंथि) का विकास होता है.’ वहीं उनके सहपाठी संग्राम सिंह के मुताबिक, ‘अब कई जगह आईआईटी में भी संस्कृत पढ़ाई जा रही है. इसरो में भी संस्कृत वालों के लिए सीटें हैं. संस्कृत में सॉफ्टवेयर और एप भी बन रहे हैं.’ नासा से लेकर इसरो तक में संस्कृत के छात्रों के लिए अपार संभावनाएं देख रहे डॉ पाल का यह भी कहना था कि ये गलत धारणा है कि इस विषय को पढ़ने वालों की संख्या में कमी आई है, बल्कि इसमें बढ़ोतरी ही हुई है.

तमाम बड़े विश्वविद्यालयों की तरह, यहां भी साफ-सफाई और निर्माण संबंधी काम लगातार चलते रहते हैं. और एक तरह से इनमें लगे कामगार भी इन संस्थानों का ही हिस्सा होते हैं. संस्कृत विभाग से आगे चलने पर हमारी मुलाकात ऐसे ही एक कामगार रामचंद्र से हुई. मिर्जापुर के रामचंद्र यहां एक सूखी नाली की सफाई के काम में लगे थे. उन्होंने हमें अपनी उम्र तीस साल बताई, हालांकि उनका थका-मांदा सा शरीर उन्हें कहीं ज्यादा उम्रदराज दिखा रहा था.

रामचंद्र 350 रुपये की दिहाड़ी पर मजदूरी का काम करते हैं. उनका घर मिर्जापुर से 30 किलोमीटर दूर पड़ता है. उस ग्रामीण इलाके में काम-धंधा न होने की वजह से अधिकांश लोगों को घर-परिवार छोड़ पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है. वहीं दूसरी तरफ शहरों में भी रामचंद्र जैसे अनगिनत लोगों को अपने परिवार को खिलाने और उनकी जरूरतों को पूरी करने के लिए पेट काटकर पैसे बचाने पड़ते हैं.

रामचंद्र अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए केवल दो वक्त यानी सुबह आठ-साढ़े आठ बजे और रात के नौ-दस बजे खाना खाते हैं. यानी दोनों वक्त के भोजन के बीच 12 घंटे से अधिक का अंतर रहता है. उन्होंने धीमी और बड़ी ही भावुक आवाज में अपनी तकलीफ हमारे सामने रखी, ‘केवल सुबह-रात खाते हैं. भूख लगती है तो क्या करें! अगर यहीं पर पूरा पैसा खर्चा कर देंगे, तो घर-बच्चों का क्या होगा? आखिर उनको भी तो देखना है न, इसलिए एक टाइम भूखा रहना पड़ता है.’

रामचंद्र
रामचंद्र

इसके बाद हम एक बार फिर सीनेट भवन के पास थे. यहां हमें एक खिड़की दिखाई दी. इस पर लिखा था- काउन्टर-5, अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए. इस बारे में काउन्टर के बगल में पढ़ाई कर रहे पुनीत सिंह ने बताया कि यहां पर स्कॉलरशिप के मद्देनजर आरक्षित वर्गों के लिए अलग-अलग काउन्टर बनाए गए हैं. बताया जाता है कि इससे प्रमाणपत्रों की छंटाई में कर्मचारियों को सुविधा होती है.

अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए बनाया गया काउन्टर
अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए बनाया गया काउन्टर

इस काउन्टर से आगे बढ़ने पर एक मैदान में विश्वविद्यालय के छात्र क्रिकेट खेलते हुए दिखे. इनमें से एक ने हंसते हुए बताया कि कमरे से निकलते वक्त वे किताबों के साथ निकलते हैं लेकिन यह तय नहीं होता कि विश्वविद्यालय में पहुंचने के बाद हाथ में किताबें होंगी या गेंद और बैट! यहां खेलने वालों में वर्तमान के साथ-साथ पूर्व छात्र भी शामिल होते हैं.

खेल के मैदान में छात्र
खेल के मैदान में छात्र

विश्वविद्यालय में अब शाम का धुंधलका छा रहा था. अंधेरा बढ़े इससे पहले ही हमारे सामने चल रहा क्रिकेट का खेल आज के लिए खत्म होने के कगार पर था. वहीं दूसरी तरफ हमारे साथ ही परिसर में मौजूद कई छात्र-छात्रा समूहों में या अपने साथियों के साथ विश्वविद्यालय से विदा लेते हुए दिखे. इस निश्चिंतता के साथ कि वे अगले दिन फिर यहीं मिलेंगे.

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