क्या तेज़ी से तबाही के रास्ते पर बढ़ रही है इंसानी सभ्यता ?

नई दिल्‍ली, N.I.T. : दुनिया इस वक़्त कई नई चुनौतियों से वाबस्ता है. जलवायु परिवर्तन की वजह से धरती का तापमान बढ़ रहा है.
समंदर का पानी गर्म होने से मछलियों की तादाद घट रही है. बर्फ़ पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है. बढ़ती आबादी, तमाम मोर्चों पर छिड़े युद्ध, प्रदूषण, नई बीमारियां, खाने और पानी की कमी. ये ऐसी चुनौतियां हैं, जिनसे जूझते हुए एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ है.
सवाल ये है कि क्या मौजूदा इंसानी सभ्यता तबाही के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ रही है? भारत आबादी के लिहाज़ से एक विशाल देश है और इन सारी त्रासदियों से जूझ रहा है.
दुनिया में बहुत सी सभ्यताएं फली फूलीं और फिर ख़ुद ही उजड़ भी गईं. कभी प्राकृतिक वजह से तो कभी अपनी कमियों और ग़लतियों की वजह से.
मिसाल के लिए रोमन साम्राज्य के ख़ात्मे की बड़ी वजह थी ख़राब नेतृत्व, साम्राज्य का बेपनाह विस्तार और जलवायु परिवर्तन.
ऐसा नहीं है कि ये विशाल साम्राज्य रातों-रात समाप्त हो गया था बल्कि धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ा था. इसी तरह और भी बहुत सी सभ्यताएं ख़त्म हुईं.
ब्रिटिश इतिहासकार आर्नोल्ड टॉनीबी ने दुनिया की लगभग 28 सभ्यताओं के उत्थान औऱ पतन का अध्ययन कर किताब लिखी है- ‘अ स्टडी ऑफ़ हिस्ट्री’.
आर्नोल्ड का कहना है कि किसी सभ्यता की उम्र का सही-सही आंकलन कर पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि उनके बनने और मिटने का व्यापक डेटाबेस नहीं है.
उन्होंने कुछ ग्राफिक्स के माध्यम से सभ्यता औऱ साम्राज्य में अंतर बताने की कोशिश की है. उन्होंने बहुत सी सभ्यताओं की उम्र का तुलनात्मक अधय्यन किया है. इसमें हरेक सभ्यता के बहुत से शहर, खेती-बाड़ी, शहरों में रहने वाली सेना औऱ सभ्यताओं के सियासी हालात शामिल हैं.
इस आधार पर सभी साम्राज्य, सभ्यता की श्रेणी में तो आते हैं लेकिन सभी सभ्यताएं साम्राज्य की फ़ेहरिस्त में शामिल नहीं की जा सकतीं.
बर्बादी के बाद उबरने वाली सभ्यताएं
ऐसा नहीं है कि जो सभ्यताएं ख़त्म हुई हैं वो दोबारा उबर नहीं पाईं. चीन और मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं ने ख़ुद को बर्बाद होने के बाद फिर से संभाला.
कुछ शहर ऐसे भी हैं, जिनकी बर्बादी के निशान आने वाली नस्लों के लिए निशानी के तौर पर छोड़ दिए जाते हैं. इसकी मिसाल माया सभ्यता के खंडहरों में देखने को मिलती है. प्राचीन सभ्यताओं का आधार खेती थी.
लेकिन आज की सभ्यताएं खेती से ज़्यादा तकनीक पर आधारित हैं. तो क्या जो फॉर्मूला पुरानी सभ्यताओं को बचाने के लिए लागू हो सकता था वो मौजूदा सभ्यता के लिए भी उपयोगी होगा.
आर्नोल्ड के मुताबिक़ प्राचीन औऱ मौजूदा दोनों ही समाज तकनीक औऱ अलग-अलग तरह के लोगों के तालमेल का नतीजा रही हैं.
नॉर्मल एक्सिडेंट थ्योरी के मुताबिक़ जटिल तकनीकी सिस्टम भी नाकामी की ओर ले जाता है. लिहाज़ा सभ्यताओं का बनना और बिगड़ना एक सामान्य घटना है.
आर्नोल्ड के मुताबिक़ आज हम तकनीकी तौर पर कहीं ज़्यादा आगे हैं. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम बर्बादी से बच सकते हैं बल्कि नई तकनीक हमारे सामने नई तरह की चुनौतियां लाती हैं जिससे बर्बादी की संभावना भी ज़्यादा हो जाती है.
आज आर्थिक और सियासी रूप से सारी दुनिया एक है. एक दूसरे से जुड़ी है. लिहाज़ा किसी एक देश की तबाही, आस-पास के देशों को ही नहीं, पूरी दुनिया पर असर डालेगी.
जलवायु परिवर्तन कितना बड़ा कारण?
किसी भी सभ्यता की बर्बादी को लेकर जितनी भी थिअरी दी गई हैं, उनमें चंद को छोड़कर किसी ना किसी थिअरी पर असहमति बनी रही है.
फिर भी जलयावु परिवर्तन, माहौल की ख़राबी, असमानता और अन्य सामाजिक जटिलताओं जैसी वजहों पर ज़्यादातर जानकार रज़ामंदी रखते हैं.
जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा असर फसलों पर पड़ता है. फसलें बर्बाद होती हैं तो भुखमरी बढ़ती है और सभ्यताएं ख़ात्मे की ओर बढ़ जाती है.
जैसा कि हम माया सभ्यता, अनासाज़ी, तिवानाकु, अक्काडियंस और रोमन सभ्यता के संदर्भ में देखते हैं. इनके उजड़ने की एक बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन थी.
इसके अलावा इकोलॉजिकल सिस्टम ठप होने की वजह से भी सभ्यताओं का पतन होता है. इसमें ज़रूरत से ज़्यादा जंगलों का कटान, मिट्टी का कटान और प्रदूषण शामिल हैं.
समाज में फैली असमानता और सत्ता का मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमटना भी सभ्यताओं के पतन की वजह है.
गुज़रे समाज की परिस्थितियों के मूल्यांकन के आधार पर कहा जा सकता है कि मज़दूर और शासक वर्ग के बीच दूरी बहुत ज़्यादा दूरी बर्बादी की बड़ी वजह बनती है.
ब्यूरोक्रेसी और जटिलताएं
इतिहासकार जॉसेफ़ टेन्टर का कहना है कि ब्यूरोक्रेसी और जटिलताओं के चलते भी सभ्यताएं ख़ुद को ख़त्म करती हैं. पतन की एक और वजह है एनर्जी रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट यानी (EROI).
इसका मतलब है किसी संसाधन से प्राकृतिक ऊर्जा का पैदा होना और उसी अनुपात में खपत होना. जब ये अनुपात बिगड़ता है तो पतन की ओर ले जाता है.
राजनीतिक वैज्ञानिक थॉमस होमर डिक्सन ने अपनी किताब ‘द अप साइड ऑफ़ डाउन’ में लिखा है कि पर्यावरण में प्राकृतिक संसाधनों का बिगड़ता अनुपात ही रोमन साम्राज्य को EROI की ओर ले गया और उसका पतन हो गया. माया सभ्यता के पतन के लिए भी टेन्टर EROI को ही ज़िम्मेदार मानते हैं.
प्राकृतिक आपदाएं तो किसी भी सभ्यता के पतन की बड़ी वजह होती ही हैं. साथ ही महामारियां और साम्राज्य विस्तार के लिए होने वाले युद्ध भी सभ्यताओं को ख़त्म करते हैं. जैसा कि हम एज़्टेक सभ्यता के साथ होता हुआ देख चुके हैं. इसे स्पेनिश आक्रमणकारियों ने तबाह किया था.
पतन की ओर इंसानी समाज
इन बातों पर ग़ौर करने के बाद कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे मौजूदा इंसानी समाज पतन की तरफ़ बढ़ रहा है. जलवायु परिवर्तन के लिए बढ़ता तापमान ज़िम्मेदार है.
पिछले कई दशकों से हम देख रहे हैं की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तापमान में इज़ाफ़ा दर्ज किया जा रहा है. जीडीपी में उतार चढ़ाव भी लगातार बढ़ रहा है.
गिनी इंडेक्स के मुताबिक़ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर असमानता घटी है लेकिन अलग-अलग देशों में बढ़ भी रही है. हालांकि गिनी इंडेक्स के आंकड़ों को पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता.
लेकिन इतना ज़रूर है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों की आय में एक फ़ीसद का इज़ाफ़ा हुआ है. आय में एक फ़ीसदी का ये इज़ाफ़ा 1980 में 25 से 30 फ़ीसद बढ़ा और 2016 में लगभग 40 फ़ीसद बढ़ा.
इसके अलावा तेल और गैस का इस्तेमाल पहले के मुक़ाबले कम हुआ है. तकनीक के माध्यम से ऊर्जा के नए विकल्प खोज लिए गए हैं जिसके चलते EROI पर निर्भरता कम हुई है.
आज हम तकनीक की मदद से लगभग हरेक तरह की मुश्किल का सामना करना की क़ुव्वत रखते हैं.
आज हमारे पास हरेक चीज़ का विकल्प मौजूद है फिर भी हमें संतुष्ट होकर नहीं बैठना चाहिए. जिन आधार पर पिछली सभ्यताएं नष्ट हुई थीं वो आधार आज भी मौजूद हैं.
मसलन दुनिया भर में जटिलताएं बढ़ रही हैं. अमीर-ग़रीब का अंतर बढ़ रहा है. हरेक देश आज भी किसी ना किसी रूप में दूसरे देश को अपने मातहत करने की कोशिश में हैं और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ भी जारी है.
बड़े विनाश की तैयारी
लिहाज़ा हम सभी को सोचने की ज़रूरत है कि कहीं हम भी पिछली सभ्यताओं की तरह पतन की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं.
ये ख़ुशी की बात है कि आज हम तकनीकी रूप से सक्षम हैं लेकिन यही बात चिंता का विषय भी है. गुज़रे ज़माने में बुनियादी हथियारों से लड़ाई होती थी जिससे व्यापक पैमाने पर जानी नुक़सान नहीं होता था.
लेकिन आज हमारे पास न्यूक्लियर हथियार हैं. इनका इस्तेमाल कई पीढ़ियों को दुख देगा. इसकी मिसाल भी हम हिरोशिमा औऱ नागासाकी में देख चुके हैं.
इसके अलावा पिछली जितनी भी सभ्यताएं थीं, वो बर्बादी के बाद वापस खेती पर आकर ख़ुद को संभालने में सक्षम थीं. लेकिन पर्यावरण के साथ किया जा रहा खिलवाड़ वो विकल्प भी हमारे पास नहीं रहने देगा.
ये ज़रूरी नहीं है कि हमारा पतन भी दिखने में पिछली सभ्यताओं जैसा ही हो. लेकिन आशंका पूरी है. अच्छी बात ये है कि हमने ख़ुद को बचाने के उपाय सीख लिए हैं. लेकिन वो उपाय काफ़ी नहीं हैं.
क़ुदरत के साथ की गई दुश्मनी हमें भारी पड़ सकती है. छोटे-छोटे उपाय से भी हम बड़े नुक़सान से बच सकते हैं और ये कोई मुश्किल काम नहीं है.
लेकिन, इसके लिए जो इच्छाशक्ति चाहिए, उसकी भारी कमी है. इसके चलते हालात बिगड़ रहे हैं. अगर हम ऐसे ही आंख मूंदे रहे तो पतन निश्चित है और हम भी रोम, सिंधु या माया सभ्यता की तरह इतिहास बनकर रह जाएंगे.

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