पश्चिमी दिल्ली एक ऐसा इलाका जिसने 1977 से अब तक हर चुनाव में उसी पार्टी के उम्मीदवार को चुना जिसने केंद्र में सरकार बनाई, इस बार किसे चुनेगी?

नई दिल्ली, N.I.T. : 17वीं लोकसभा के चुनावों का पहला चरण शुरू होने में महज़ दो हफ़्ते बाकी हैं. घरों और दफ़्तरों से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह चुनावी चर्चा चरम पर पहुंच रही है. यही वह वक्त भी है जब सभी जानना चाहते हैं कि देश का मतदाता क्या सोच रहा है. ऐसे में यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि पश्चिमी दिल्ली का मतदाता किसे चुनने का मन बना रहा है. और क्यों.

लेकिन क्यों? इसलिए कि गुजरात के वलसाड के साथ पश्चिमी दिल्ली एक ऐसा इलाका रहा है जिसने 1977 के आम चुनावों से लेकर 2014 तक उसी पार्टी के उम्मीदवार को चुना जिसने केंद्र में सरकार बनाई. हाल ही में आई वरिष्ठ पत्रकार प्रणय रॉय की किताब ‘वरडिक्ट’ में यह जानकारी दी गई है. ऐसी सीटों को ‘बैलवेदर कॉन्स्टीटुएंसीज’ कहा जाता है.

वैसे देखा जाए तो पश्चिम दिल्ली बहुत पुराना लोकसभा क्षेत्र नहीं है. 2002 में गठित हुए डीलिमिटेशन कमीशन की सिफ़ारिश के बाद 2008 में इस निर्वाचन क्षेत्र का गठन किया गया. इससे पहले इस सीट में आने वाले इलाक़े बाहरी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली में पड़ते थे. पहली बार लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र बनने के बाद 2009 के आम चुनावों में पश्चिम दिल्ली ने कांग्रेस को चुना. दूसरी बार यानी 2014 में इसने भाजपा को जिताया.

पश्चिमी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में द्वारका, जनकपुरी, राजौरी गार्डन, नजफगढ़ और नांगलोई जाट जैसे विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं. सवाल उठता है कि पश्चिमी दिल्ली में ऐसा क्या ख़ास है जो इसे बाकी निर्वाचन क्षेत्रों की अपेक्षा देशभर के जनमत का बेहतर प्रतिनिधि बना देता है. एक सीधा सा जवाब यहां की मिश्रित आबादी हो सकती है जो देश की विविध जनसांख्यिकी का प्रतिनिधित्व करती दिखती है. पश्चिमी दिल्ली में पंजाबियों के अलावा हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश से आकर बसे लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा है.

लेकिन विविध जनसंख्या वाली यह विशेषता तो दिल्ली के अन्य निर्वाचन क्षेत्रों पर भी लागू होती है! तो दूसरा जवाब यह हो सकता है कि पश्चिमी दिल्ली उतना समृद्ध निर्वाचन क्षेत्र नहीं है जितना दिल्ली के बाकी इलाके. पिछले तमाम सालों के चुनावों के अंकगणित पर नज़र रखने वाले जानते हैं कि मतदान करने जाने वालों में सबसे बड़ी संख्या समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके से होती है.

सत्याग्रह ने पश्चिमी दिल्ली में पंजाबी बाग, मादीपुर और नांगलोई इलाक़े के लोगों से बातचीत की. राजधानी दिल्ली का यह इलाक़ा बिलकुल वैसा चमाचम नहीं दिखता जैसा हम लुटियन या दक्षिणी दिल्ली में देखते हैं. न ही यहां पुरानी दिल्ली जैसी ऐतिहासिक बसावट है. यह इलाक़ा बंटवारे के बाद के पिछले 70 सालों में बसा इलाक़ा है. कहने की ज़रूरत नहीं कि यह किसी योजना के तहत बसा इलाक़ा न होकर ज़रूरत पर फैला शहर का टुकड़ा है.

मेट्रो या बस से पंजाबी बाग़ पहुंचने के बाद आपको किसी दूसरे दर्ज़े के शहर जैसा बाज़ार दिखाई देता है. इन बाज़ारों में ज़्यादातर पंजाबी खत्रियों की दुकानें हैं. बाकी छोटी-मोटी दुकानें हरियाणा, उत्तर प्रदेश या बिहार से रोज़गार के लिए आए प्रवासियों की हैं. पंजाबियों के पास बेशक दिल्ली में मतदान का अधिकार है पर बाकी प्रदेशों से आए अधिकतर दुकानदारों के पास अपने पुराने गांवों या शहरों के ही मतदाता पहचान पत्र हैं.

आप अपना वोट किसे देंगे? इस सवाल पर लोग तीन तरह के जवाब देते हैं – भाजपा, केजरीवाल और कांग्रेस. जवाब पर ग़ौर किया जाए. भाजपा, केजरीवाल और कांग्रेस. यानी पार्टी के ऊपर चेहरे को महत्व सिर्फ़ एक मामले में है. शायद इसलिए भी कि आम आदमी पार्टी शायद अभी उतनी पुरानी पार्टी नहीं हुई है जिसकी अपनी पहचान कांग्रेस या भाजपा जितनी मज़बूत हो.

वोट के सवाल के सिलसिले में सबसे पहले एक किराने की दुकान चलाने वाले मोहन शर्मा के जवाब का ज़िक्र करना दिलचस्प होगा. ये पहले शख़्स हैं जिनसे हमने बात की. अचानक पूछे गए इस निजी सवाल से कुछ हैरान और कुछ परेशान हुए मोहन ने जिस तेज़ी से जवाब में सत्तारूढ़ पार्टी का नाम लेते हैं, वह ध्यान देने लायक़ है. उनकी घबराहट बता रही थी कि बहुत मुमकिन है कि वे ‘सुरक्षित खेलने’ की कोशिश में हैं, अपने प्रतिनिधि के चुनाव को लेकर वे एक अनजान व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहते.

इस सुरक्षित खेलने की इच्छा पर नांगलोई के जेजे मुहल्ले की ममता रानी थोड़ी और रोशनी डालती हैं. गली में बैठकर बात करतीं और निम्न आय वर्ग में आने वाले इस मुहल्ले की औरतों के एक समूह के बारे में ममता सीधे कहती हैं, ‘ये लोग आपको सही बात थोड़े ही बताएंगी. यहां आपको कुछ और बोलेंगी, वोट किसी और को देंगी.’

यानी लोगों से सच जान पाना आसान नहीं है कि वे किसे चुनने जा रहे हैं. यहां हमें देखना होगा कि लोग आखिर वोट क्यों करते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की प्रोफ़ेसर डॉ मधुलिका बनर्जी हाल ही में आई किताब द ग्रेट मार्च ऑफ़ डेमोक्रेसी में अपने निबंध ‘व्हाइ डज़ इंडिया वोट?’ में लिखती हैं, ‘मतदाता उसे चुनते हैं जो उनके अनुसार उनके हितों, जाति और समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं. …काम न करने वाले सत्तारूढ़ प्रतिनिधियों को सबक़ सिखाया जाता है, और नए राजनेताओं को मौक़ा देकर देखने के लिए मतदाताओं में ठीक-ठाक इच्छा देखी गई है.’

वे आगे लिखती हैं,

‘इसके अलावा, विडंबना यह है कि बाकी देशों की तुलना में भारत के ऊंचे आर्थिक विकास के आंकड़ों और अर्थव्यवस्था के बढ़ते आकार के बावजूद शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में आम मतदाता की मांग अब भी बिजली, पानी, सड़क, सफ़ाई, घर, बेहतर सरकारी स्कूल और अस्पताल ही बनी हुई है.’

प्रोफ़ेसर बनर्जी की इस टिप्पणी की सार्थकता को पश्चिमी दिल्ली की महिलाओं के जवाब में महसूस किया जा सकता है. ये महिलाएं – चाहे वे आर्थिक रूप से बेहद निचले तबके की हों या फिर उच्च मध्यमवर्गीय, अरविंद केजरीवाल की तारीफ़ में कहती हैं कि उन्होंने कम से कम बिजली़, पानी की सुविधा तो दी है. ऐसी ही एक महिला कहती हैं, ‘अब अनाप-शनाप बिल नहीं आते. नालियां भी साफ़ होती हैं. और स्कूल भी पहले से बेहतर हुए हैं. मेरे पति चाहे किसी को भी वोट दें, मैं तो केजरीवाल को ही दूगी.’ इस तरह की बात एक नहीं, कई महिलाओं से सुनने को मिलती है.

फ़िलहाल सिर्फ़ आम आदमी पार्टी ने ही पश्चिमी दिल्ली से अपने उम्मीदवार की घोषणा की है. कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन की स्थिति अभी साफ़ नहीं है. मौजूदा भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा का ज़िक्र किसी मतदाता से सुनने को नहीं मिलता. ग़रीब तबके में एक और अहम मुद्दा रोज़गार का है. लोगों में नाराज़गी दिखती है कि दो साल पहले तक काम कर रहा उनका बी कॉम पास लड़का अब घर पर ख़ाली बैठा है. महिलाएं यह भी बताती हैं कि नोटबंदी के बाद से चोरी और छिनैती की घटनाओं में तेज़ी आई है. वे केंद्र सरकार को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराती हैं.

जो लोग भाजपा को वोट देने की बात कहते हैं, वे ऐसा क्यों करेंगे के जवाब में उनके पास टीवी पर सुनी-सुनाई बातों के पास ज़्यादा कुछ कहने को नहीं है. वे कहते हैं कि मोदी रौबदार नेता हैं. पर जब उनसे पूछा जाता है कि उनके रौब के कारण आपके जीवन में क्या तब्दीली आई है, तो वे कुछ नहीं बता पाते. महिलाएं नोटबंदी के दौरान ज़ब्त हुई अपनी नक़दी को लेकर अब भी उस फ़ैसले को कोसती हैं.

पश्चिमी दिल्ली का अपने नेता पर फ़ैसला 12 मई को ईवीएम में दर्ज होगा. लेकिन फ़िलहाल स्थितियां केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में नहीं दिखतीं. और बिजली-पानी से संतुष्ट जनता अगर ‘केजरीवाल’ को वोट देती है तो अगली बार पश्चिमी दिल्ली शायद देश के चुनाव का प्रतिनिधित्व करने वाली ‘बैलवेदर कॉन्स्टीटुएंसी’ शायद ही रहे. यह इसलिए कि इस पार्टी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनने के आसार हाल-फिलहाल तो नहीं ही दिख रहे हैं. हां, लेकिन यह जरूर हो सकता है कि ‘आप’ केंद्र के किसी सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा बन जाए.

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