क्या वाकई अब महेंद्र सिंह धोनी के संन्यास का वक्त आ गया है..?

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नई दिल्ली, N.I.T. : सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हार कर भारत की टीम क्रिकेट विश्व कप से बाहर हो गई है. इस हार के बाद चर्चा के केंद्र बिंदु महेंद्र सिंह धोनी हैं. सोशल मीडिया उनके पक्ष-विपक्ष से भरा पड़ा है. चर्चायें कुछ इस कदर गंभीर हो गईं हैं कि ऐसा लग रहा है कि महेंद्र सिंह धोनी कभी भी अपने संन्यास की घोषणा कर सकते हैं. सोशल मीडिया से चलकर यह चर्चा मुख्यधारा के मीडिया में भी फैल चुकी है. सचिन तेंदुलकर तक से महेंद्र सिंह धोनी के रिटायरमेंट के बारे में सवाल पूछे जाने लगे हैं. महान गायिका और क्रिकेट प्रेमी लता मंगेशकर ने धोनी से अपील की है कि वे अभी अपने संन्यास के बारे में न सोचें, देश को उनकी जरूरत है.

भारत कोई बहुत खेल प्रेमी या खेल-संस्कृति में जीने वाला देश नहीं है. लेकिन, क्रिकेटरों के संन्यास की चर्चाओं में यहां जबरदस्त आकर्षण है. इस समय महेंद्र धोनी के रिटायरमेंट की चर्चा सुर्खियों में है. लेकिन रिटायरमेंट की इस मौजूदा चर्चा के बहाने अतीत के बहुत से पन्ने भी खुलते हैं

अगर हम भारत के बड़े क्रिकेट खिलाड़ियों के रिटायरमेंट को पीछे मुड़कर देखें तो यह भी नजर आता है कि कैसे कभी देश के लिए उम्मीद का सबब रहे खिलाड़ियों का रिटायरमेंट उनकी या उनके चाहने वालों की उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा. हाल ही की बात करें तो कभी टीम की जान रहे युवराज सिंह को बहुत फीके तरीके से अपने रिटायरमेंट की घोषणा करनी पड़ी. और अगर कुछ साल पहले जाएं तो कभी देश की धड़कन रहे वीरेंद्र सहवाग को भी अपने रिटायरमेंट की घोषणा करने के लिए वह मैदान नहीं मिला, जिस पर उन्होंने ‘नजफगढ़ का नवाब’ और ‘मुल्तान का सुल्तान’ जैसी उपलब्धियां हासिल की थीं.

थोड़ा और पीछे चलें तो कपिल देव को याद किया जा सकता है जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को एक ऐसा देशज और नैसर्गिक अंदाज दिया जिस पर आज भारत क्रिकेट की शक्तिपीठ टिकी है. लेकिन, अपने क्रिकेटिंग करियर के आखिरी वक्त में रिचर्ड हेडली के 431 विकेटों का रिकार्ड तोड़ने में लगे कपिल को अपने शहर मोहाली तक में हूटिंग का सामना करना पड़ा. छोटे शहरों की गलियों में जिन्होंने क्रिकेट की चर्चायें सुनी हैं, उन्हें पता है कि कैसे वनडे मैचों में राहुल द्रविड़ जैसे महान बल्लेबाज के आउट होने की प्रार्थनायें की जाती थीं क्योंकि द्रविड़ हवा में शॉट खेल कर तेजी से रन बटोरने वाले बल्लेबाज नहीं थे. यह क्रिकेट में लोकप्रियता की ऐसी आमद थी जहां, खेल के सौंदर्य से ज्यादा जीत जरूरी थी, भले ही आपका खेल कितना ही विद्रूप क्यों न हो? यह एक ऐसी प्रवृत्ति थी जो दुनिया भर में पनपी और सभी टीमों में हिटर खास अहमियत रखने लगे. अंततः जीत ही महत्वपूर्ण होती है, इसलिए हर टीम ने इसे स्वीकारा भी.

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सचिन तेंदुलकर उस समय इस प्रवृत्ति की चपेट में आए जब दुनिया भर में उन्हें ‘क्रिकेट का भगवान’ मान लिया गया था. सचिन तकनीक रूप से दक्ष बल्लेबाज थे और एकदिवसीय क्रिकेट की जरूरतों को भी समझते थे. लेकिन, उनके भी करियर में एक समय ऐसा आया जब उनसे रिटायरमेंट की मांग करने वालों की बाढ़ आ गई. ‘एंडुलकर’ जैसे शीर्षक वाली खबरें लगने लगीं. इस बात को भुलाया जाना लगा कि सचिन तेंदुलकर की कितनी पारियों के कारण भारत आराम से जीता. लेकिन मैच हारने पर पूरे देश में चर्चा शुरु हो जाती थी कि सचिन अपने लिए खेलते हैं, टीम के लिए नहीं. आप जितने बड़े नायक होते हैं, उतना आपमें प्रति नायकत्व खोजा जाने लगता है.

खैर, सचिन के महानायकत्व और उनका खामोश-विनम्र प्रतिरोध भारी पड़ा. उनका रिटायरमेंट त्रासदी में नहीं बदला बल्कि भारतीय खेल जगत का एक ऐसा उत्सव बना जो लंबे समय तक याद किया जाएगा. लेकिन, सबकी किस्मत शायद ऐसी नहीं होती. कुछ रिटायरमेंट अंबाती रायडू जैसे भी होते हैं जो तमाम सवालों को जन्म देते हैं.

महेंद्र सिंह धोनी के करियर में भी मैदान से आती लगातार धोनी-धोनी की आवाजों ने उन्हें लोकप्रियता के उसी शिखर पर खड़ा किया है जिस पर सचिन तेंदुलकर, कपिल और गावस्कर जैसे लोग हैं. 2013 में धोनी के बारे में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अपने पहले अंतरराष्ट्रीय मैच में उन्होंने आकाश चोपड़ा के साथ कमरा साझा किया था. आकाश चोपड़ा ने धोनी ने उनके सोने के वक्त के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि जब आप बत्ती बुझा देंगे तो मैं सो जाऊंगा और जब आप सुबह खिड़की खोल देंगे तो मैं जग जाऊंगा. महेंद्र सिंह धोनी वाकई मध्यमवर्गीय समायोजन वाली इसी प्रवृत्ति के साथ भारतीय टीम में आए. उस समय बड़े-बड़े बालों वाले धोनी टीम के लिए योगदान करने वाले खिलाड़ी की तरह पूरे भारत के चहेते बन गए. वे जिस कस्बाई जुनून और लगन के साथ खेलते थे, वह लोकप्रियता के मामले में तमाम जमे-जमाए खिलाड़ियों पर भारी पड़ने लगा.

अपने पदार्पण के कुछ सालों के बाद ही महेंद्र सिंह धोनी को भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी मिल गई और वे अपने नैसर्गिक जज्बे और जुनून से टीम में योगदान करने वाले खिलाड़ी से ‘नेतृत्वकर्ता’ बन गए. अब धोनी को उस टीम का नेतृत्व करना था जिसमें सचिन, राहुल द्रविड़ और लक्ष्मण जैसे वरिष्ठ खिलाड़ी थे. एक अल्हड़ खिलाड़ी से परिपक्व छवि में आ गए महेंद्र सिंह धोनी टीम का अपने तरीके से नवीनीकरण करने लगे. धीरे-धीरे पुराने खिलाड़ी टीम से गए और धोनी ने भी अपने भीतर के फाइटर स्पोर्ट्समैन को ‘प्रबंधकीय’ स्वरूप देना शुरू कर दिया.

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महेंद्र धोनी उगता हुआ सूरज थे और भारतीय क्रिकेट प्रबंधन में स्टार कल्चर की आमद हो चुकी थी. वे इस स्टार कल्चर में छोटे शहर और मध्यमवर्गीय प्रवृत्ति के प्रतिनिधि थे, लेकिन धोनी इससे असहज नहीं हुए बल्कि इसमें भी उन्होंने खुद को समायोजित किया और कई बारगी तो ऐसा लगने लगा जैसे वह अब खेल से ज्यादा खेल की सत्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. इस बात पर तमाम सवाल उठे कि रविंद्र जड़ेजा और सुरेश रैना जैसे खिलाड़ी टीम में लगातार केवल धोनी की कृपा के चलते बने हुए हैं. लेकिन, महेंद्र सिंह धोनी सफल कप्तान थे सो इन बातों की किसी ने परवाह नहीं की. मैदान से उठती धोनी-धोनी की आवाजों ने सवाल उठाने वालों को खामोश कर दिया.

2011 में विश्व कप जीतने के बाद महेंद्र सिंह धोनी की लोकप्रियता ने चरम छू लिया. वे टी-20 विश्व कप और चैपियंस ट्राफी जैसे महत्वपूर्ण टूर्नामेंट भी बतौर कप्तान जीत चुके थे. महेंद्र सिंह धोनी ने वनडे क्रिकेट खेलने की भारतीय टीम की शैली को योजनागत बना दिया. इस योजना के वे मुख्य प्लानर होते थे और अक्सर अंतिम ओवरों में आकर मैच फिनिश करते थे. उन्होंने अपना बल्लेबाजी क्रम ऊपर नहीं किया. इसकी क्या वजह थी? क्या वे अपनी सीमाओं को जानते थे कि वे एक स्वाभाविक स्ट्रोक खेलने वाले खिलाड़ी नहीं हैं या आखिरी के ओवरों में वे मैच का नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहते थे.

नीचे के बल्लेबाजी क्रम के चलते उनका औसत भले ही बहुत अच्छा न हो, लेकिन महेंद्र सिंह धोनी शायद जानते थे कि महान बल्लेबाज से ज्यादा मैच जिताने वाला बल्लेबाज याद किया जाता है. यह हुआ भी. वे दुनिया के बेहतरीन फिनिशर और कैप्टन कूल हो गए. हालांकि, इस रणनीति में भारत कई बार हारा भी, लेकिन महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी फिनिशर औऱ कूल छवि बरकरार रखी. धीरे-धीरे वे इस कैप्टन कूल की छवि में ऐसा जकड़े कि उनके नैसर्गिक व्यक्तिव ने उनका साथ छोड़ दिया. क्रिकेट की सत्ता में शायद वे वाकई कूल नहीं रह गए, बल्कि कई बार उनकी गंभीरता ओढ़ी हुई लगती तो कई बार वह उदासीनता में तब्दील होने लगी. लेकिन अब खुद की इस छवि से निकलना उनके लिए भी आसान न था. उन्होंने कप्तानी भले ही छोड़ दी, लेकिन वे कूल छवि वाले अपने कप्तानी मोड को न छोड़ सके.

धोनी के करियर ग्राफ में दो बिंदु सबसे महत्वपूर्ण हैं. एक लंबे बालों वह अल्हड़ लड़का जो करीब-करीब यार्कर गेंद को भी छक्के के लिए उछाल सकता था और दूसरी उनकी कैप्टन कूल वाली फिनिशर छवि. लेकिन, वक्त एक सा नहीं रहता. महेंद्र सिंह धोनी की बढ़ती उम्र और खेल की बढ़ती गति ने उनके सामने भी वही समस्या रख दी जो उन्हें अपने कप्तान बनने के समय टीम के वरिष्ठ खिलाड़ियों से थी. महेंद्र सिंह धोनी अब उन हालात में बल्लेबाजी करना चाहते थे जब टीम के ऊपरी क्रम ने रन जोड़े हों और आखिरी के कुछ ओवर में तेज रन बनाकर मैच जिताना हो. जल्दी विकेट गिरने पर उनकी बल्लेबाजी सवालों के घेरे में आने लगी. वे अपनी रणनीतिकार छवि के ऐसे कैदी से दिखे, जिसमें उनका मौलिक खेल औऱ मैदान पर संघर्ष करने का जज्बा गायब था.

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अफगानिस्तान के खिलाफ उनकी बल्लेबाजी पर सचिन तेंदुलकर ने सवाल उठाए तो न्यूजीलैंड के खिलाफ ऊपरी क्रम के लड़खड़ाने के बाद भी वे ऊपर बल्लेबाजी करने नहीं आए. यह कप्तान विराट कोहली का फैसला था या धोनी की सलाह थी, यह तो नहीं पता, लेकिन क्रिकेट के जानकारों ने इसे ठीक नहीं माना. उनके संन्यास की बातें उठीं तो कैप्टन कूल तल्ख भी हुए. उन्होंने कहा कि कुछ लोग चाहते हैं कि वे अगले मैच से पहले संन्यास ले लें.

न्यूजीलैंड के खिलाफ मैच में महेंद्र सिंह धोनी जब रन आउट हुए तो रुंआसे हो गए. बहुत दिनों के बाद वे उस लंबे बाल वाले धोनी की तरह दिखे जब वह टीम में नए-नए आए थे. वे जानते थे कि अगर उनके क्रीज पर रहते भारत जीतता तो वे उन पर सवाल करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दे सकते थे. पर अब देर हो चुकी थी.

लेकिन, खेल में ऐसा होता है. खेल लेखक लिखते रहे हैं कि दुनिया भर के महान खिलाड़ियों के लिए रिटायर होना कितना मुश्किल होता है. दुनिया के महान बॉक्सर मोहम्मद अली रिंग में फीके पड़ने लगे थे. उम्र के उस पड़ाव पर उन्हें बॉक्सिंग को अलविदा कह देना चाहिए था. पर दुनिया का इतना महान खिलाड़ी आसानी से यह नहीं कर पाया. एक और बॉक्सर होलीफील्ड 50 की उम्र में भी बॉक्सिंग रिंग में उतरना चाहते थे. खेल मनोविज्ञान से जुड़े लोग कहते हैं कि खिलाड़ी का खेल को छोड़ देने का फैसला उस राजनेता के रिटायरमेंट से भी मुश्किल होता है जो सत्ता के शीर्ष पर बैठा होता है.

एक सफल और सुपर स्टार खिलाड़ी के पास रुतबा, लोकप्रियता, पैसा सब कुछ होता है जो एक तरह की सत्ता ही है. लेकिन इन सबसे ज्यादा मुश्किल होता है उस खेल से नाता टूटना, जिससे वह भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. लेकिन, कभी न कभी खिलाड़ी को यह भावनात्मक फैसला लेना पड़ता है. महेंद्र सिंह धोनी को भी वक्त शायद यही इशारा कर रहा है.

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