साहित्य अपने समय की गवाही तो देता है

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sahityaसलमान खान, नई डिल्ली, N.I.T. :  इस पर लंबी चर्चा होती रही है कि साहित्य अपने समय और समाज की गवाही देता है. कई बार इसे एक पैमाने के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है: अगर साहित्य या कोई कृति अपने समय की सीधे-सीधे गवाही न देता दीखे तो उस पर मानवीय स्थिति और संकटों के प्रति उदासीन होने का लांछन भी लगाया जा सकता है. गवाही को शुद्ध अभिधा में (सीधे-सीधे) देखने-पढ़ने की आदत सामान्य है. तर्क या कुतर्क यह है कि जो सीधे-सीधे समझ में आये वह गवाही कैसे और किस काम की ?

अनेक क्लैसिक याद किये जा सकते हैं जो ऐसी सीधी गवाही नहीं देते. लेकिन इनमें मनुष्य की स्थिति की, उसकी नैतिक और आध्यात्मिक बेचैनियों की गवाही खोजी जा सकती है. पर इन दिनों पढ़ने में खोजने की मात्रा इतनी कम हो गयी है और सब कुछ सीधा और स्पष्ट मिल जाये, बिना अपनी ओर से कोई कोशिश किये, इस पर इसरार बढ़ता जाता है.

यह सवाल उठ सकता है कि गवाही देना साहित्य की ज़िम्मेदारी क्यों है? चूंकि एक दूसरे अर्थ में साहित्य अपने समय-समाज-आत्म का सच खोजने-कहने की कोशिश करता है, गवाही देना या गवाह होना उसका सहज धर्म हो जाता है: धर्म मगर कर्तव्य नहीं. इसमें थोड़ा पेंच इस सचाई से निकलता है कि साहित्य सच कहकर भी उस पर लगातार संदेह करता है. उसके पास निश्चय का चकाचौंधी प्रकाश कम, अनिश्चय और विभ्रम का कोहरा अधिक होता है. यह स्थिति उसकी गवाही को थोड़ा संदिग्ध बनाती है. कम से कम धुंधला तो ज़रूर ही.

यह धुंधलका साहित्य की अनेक कालजयी कृतियों में देखा जा सकता है: परंपरा में देखें तो व्यास, कबीर, तुलसीदास, मीर, ग़ालिब, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, रेणु, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वेद, श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय आदि में यह धुंधलका है. क्या यह धुंधलका ही दरअसल साहित्य की असली और सच्ची गवाही है? यह वह गवाही है जो स्याह और सफ़ेद में सचाई को देखने-बांटने का प्रतिरोध करती है. साहित्य की गवाही, इसलिए, हर समय विडंबनाग्रस्त है. हम उस गवाही के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते, न ही उसे सज़ा दे सकते हैं.

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बहुत लोगों को, इसलिए, साहित्य अकारथ लग सकता है. अपनी इस तरह की अकारथता से ही साहित्य अपना अर्थ रचता और अर्जित करता है. वह फ़ैसला देने से आपको रोकने, ठिठककर सोचने पर विवश करने वाली विधा है. वह दूसरों पर नहीं अपने पर प्रश्नचिह्न लगानेवाली विधा है. साहित्य हमेशा ही आत्माभियोगी होता है: उसमें आप दूसरों को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते, आप ही कठघरे में खड़े होकर हलफ़ उठा सकते हैं.

कई बार लगता है कि इन दिनों जिस तरह की हड़बड़ी और आत्मरति से साहित्य लिखा जा रहा है उसमें इन बारीकियों के लिए कोई जगह नहीं है. मुक्तिबोध ने आत्मा के गुप्तचर की बात की थी. आज आत्मा के गवाह कितने कम और बिरले नज़र आते हैं! हो सकता है कि हम गवाह न हों पर एक कठिन-जटिल समय में हमने खुली आंखों देखने और बखान करने की हिमाक़त और हिम्मत तो की है.

क्या हमारा साहित्य अब कुछ कम मानवीय हो रहा है?

यह सामान्यीकरण किया जाता रहा है कि साहित्य में मानवीय संबंधों की जगह बहुत बढ़ी-फैली है: उनकी कई विडंबनाएं, अंतर्विरोध, बारीकियां आधुनिक साहित्य खोजता-बखानता है. चूंकि आधुनिकता काफ़ी समय से सक्रिय है, उसकी अब एक परंपरा ही बन गयी है. इस आधुनिक परंपरा में अपने से पहले की परंपरा की विस्मृति और अस्वीकार से लेकर उसका आधुनिक अभिप्रायों के लिए विनियोजन और पुनराविष्कार और उनके बीच आने वाली कई तहें शामिल हैं.

भारतीय परिस्थिति में व्यक्तिगत जीवन और समाज में परिवार एक बड़ी और सुखद-दुखद दोनों ही भूमिकाएं निभाता है. उसकी उपस्थिति और विघटन का हमारे साहित्य में विशेष स्थान रहा है. हमारे समय की एक विडंबना यह है कि समाज में तो पारिवारिकता एक शिथिल प्रवृत्ति है लेकिन सक्रिय राजनीति में वंशवाद बढ़ती लोकतांत्रिकता के साथ-साथ बढ़ता गया है. याद नहीं आता कि हमारे साहित्य में इस अंतर्विरोध की मानवीय उपस्थिति और नियति का बखान, अपनी मार्मिकता में, कहां है.

कई बार लगता है कि अनेक मानवीय संबंध साहित्य में प्रासंगिकता के भूगोल से बाहर हो गये हैं. उनमें मित्रता-शत्रुता, सहयोग और सहकार, ईर्ष्या और स्पर्धा आदि शामिल हैं. यह तो कहा जा सकता है कि इधर साहित्य में स्त्रियों के संसार, स्त्री-पुरुष संबंधों, दलित वर्ग की निमर्म यंत्रणा और कष्ट का गहरा अहसास और उपस्थिति बढ़े हैं. याद करें तो हमारी पारिवारिकता का एक बड़ा हिस्सा अनेक संबंधों को, पश्चिम की तुलना में, विशिष्ट नाम देने और उन्हें किसी न किसी अर्थ में जब-तब संबोधित करने का रहा है: बुआ-फूफा, मामा-मामी, भांजी-भतीजी, मौसी-मौसा आदि. अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में यजमानों द्वारा पिछली पांच पीढ़ियों के पुरखों को नाम से याद करने की प्रथा है. पितृपक्ष आदि भी है.

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परिवार निरे मनुष्यों से नहीं आस-पास मौजूद प्राकृतिक तत्वों से भी बना होता है – रश्मि और मैंने 1966 में अपने ब्याह के बाद पीपल के वृक्ष और मुहल्ले के एक कुएं की पूजा भी की थी. इसमें से बहुत सारा आधुनिकीकरण के प्रवाह में ग़ायब हो गया. पर उसकी स्मृति या पीड़ा कहां नज़र आती है? ज़ाहिर है कि इनमें से कुछ का स्थान नई चीजों और रिश्तों ने ले लिया है. क्या उनसे हमारा भावात्मक लगाव उतना ही गहरा हो पाया जितना पहले था?

क्या चीज़ों की बहुतायत के साथ उनसे हमारे बढ़ते अलगाव का कोई सर्जनात्मक अन्वेषण हमने किया है? क्या बहुत सारी चीज़ें जैसे पेड़-पक्षी आदि पहले हमारे आदर के पात्र थे, उन्हें हमने सिर्फ़ उपकरण मानना शुरू कर दिया है और अब हम उनके साथ उदासीनता या निर्ममता से पेश आने लगे हैं? क्या इस ट्रेजेडी की कोई अभिव्यक्ति हमारी कहानियों और कविताओं में है?

इसमें शक नहीं कि हम बेहद हिंसक और हत्यारे समय में रह रहे हैं. धर्म, जाति, संप्रदाय, विचारधारा आदि के नाम पर हिंसा बढ़ती जाती है. इसकी कितनी गवाही, कितना प्रश्नांकन हमारे साहित्य में है? शायद हमें थोड़ा ठिठककर इस पर विचार करना चाहिये कि क्या हम साहित्य में कुछ कम मानवीय हो रहे हैं!

विभूति कष्ट की यह दुर्लभ है हम जिसके रखवारे हैं

30 दिसंबर 2016 को रघुवीर सहाय के देहावसान को 26 वर्ष हो जायेंगे. उनका पहला कविता संग्रह ‘सीढ़ियों पर धूप में’ अज्ञेय के संपादन में 1960 में प्रकाशित हुआ था. मुझे खूब याद है कि लगभग उसी वर्ष मैंने ‘कृति’ में उसकी समीक्षा, उल्लसित होकर, ‘जीने के कर्म की परिभाषा’ शीर्षक से की थी. मेरी अब भी यह राय है कि वह संग्रह हिंदी के श्रेष्ठ पहले कविता-संग्रहों में से एक है. हाल में उसे एक बार फिर पलट रहा था.

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इस ओर ध्यान गया कि जैसे मुक्तिबोध ने अपनी लंबी कविता ‘अंधेरे में’ हमारे आज के दारूण समय का पूर्वाभास कर लिया था वैसे ही रघुवीर सहाय ने भी आज हमें हो रहे दुखों का बखान कर दिया था: ‘यह क्या है जो इस जूते में गड़ता है/यह कील कहां से रोज़ निकल आती है/इस दुख को रोज़ समझना क्यों पड़ता है’ जैसी पंक्तियां जितनी सच तब थीं उतनी ही सच आज हैं.

इसी कविता में आगे यह अंश है: ‘हम ही क्यों यह तकलीफ़ उठाते जायें/दुख देनेवाले दुख दें और हमारे/उस दुख के गौरव की कविताएं गायें/ यह है अभिजात क़िस्म की मक्कारी/इसमें सब दुख हैं केवल यही नहीं है/अपमान, अकेलापन, फ़ाका, बीमारी.’ और आगे है: ‘हम सहते हैं इसलिए कि हम सच्चे है/हम जो करते हैं वह ले जाते हैं वे/वे झूठे हैं लेकिन सबसे अच्छे हैं.’

इस अनोखे ढंग से इस समय प्रासंगिक हो गयी कविता का समापन होता है इस इसरार से: ‘हमको तो अपने हक़ सब मिलने चाहिए/हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन/ ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए’. नोटबंदी के बाद जो हालत हो रही है उस पर यह कविता एक सटीक टिप्पणी बन गयी है. वह इस अर्थ में प्रासंगिक और नागरिक कविता है.

एक ओर नागरिक पद है:

आप में और हम में संबंध एक ही है

यदि आप चढ़ें कोठे तो हम खड़े दुवारे हैं

अपने दुवारे हैं आप के दुवारे नहीं

हैं तो हैं, आप की बला से दुखियारे हैं

दुख से हैं दीन, क्या इसी से हैं हीन

थके हारे हैं क्या हम इसी से बिचारे हैं?

आप की सहानुभूति सुलभ है, विभूति कष्ट

की यह दुर्लभ है हम जिसके रखवारे हैं

एक ऐसे माहौल में जिसमें दुखी होना भी द्रोही कहलाना है, रघुवीर सहाय एक बड़े कवि की तरह हमें याद दिलाते हैं कि हम कष्ट की विभूति (दौलत) के रखवारे हैं और यह विभूति दुर्लभ है. कवि इससे अधिक और क्या कर सकता है कि वह आपके दुखियारे होने और रखवारे होने की साथ-साथ याद दिलाये?

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